|
Vartmaan Sahitya ::January, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner एक सामूहिक आकाश की तलाश ः अपना-अपना आकाश
अमरीक सिंह ’दीप‘
यथार्थवाद के नाम पर इधर की ज्यादातर कहानियां पलायन राग ही अलाप रही हैं जिसका भरपूर लाभ बाजारवादी व्यवस्था उठा रही है। वह आम आदमी को जिन्स में बदले जा रही है, गरीबों को जानवर से बद्तर जीवन प्रदान कर रही है और पलायनवादी साहित्य उनमें क्रान्ति का जज्बा न पैदा कर उन्ह सब कुछ चुपचाप सहते जाने के लिए प्रेरित कर रहा है। लेकिन पीडत मानवता को ढाढस बंधाने वाला एक उपन्यास प्रकाशित हुआ है, वह है महावीर रवांल्टा का नया उपन्यास-’’अपना अपना आकाश‘‘। उपन्यास में एक पर्वतीय क्षेत्रा में बसे गवाल गाँव की कहानी है। गाँव में दो तरह के लोग रहते हैं। वहाँ के मूल बाशिन्दे, जिसे उस क्षेत्रा की भाषा में ’’मौरसीदार‘‘ कहते हैं और दूसरे अन्य स्थानों से गाँव में आकर बस गये लोग जो ’’गैर मौरसीदार‘‘ कहलाते हैं। ’’गाँव के बीच बहने वाले पानी के नाले ने गाँव को दो भागों में बाँट डाला है। एक ओर के आधे गाँव को ’’आरी गाँव‘‘ तथा दूसरी ओर के घरों को ’’पारी गाँव‘‘ कहते हैं।‘‘ (पृ. ८) ....गाँव भौगोलिक दृष्टि से दो भागों में बंटा है लेकिन जात बिरादरी की दृष्टि से अनेक भागों में बंटा है। (पृ. ९) यह तस्वीर उपन्यास में वर्णित गवाल गाँव की ही नहीं देश के लगभग हर गाँव की है। ’फूट डालो, राज करो‘ के मूल मंत्रा का अंग्रेजों ने लाभ उठा कर देश को गुलाम बनाये रखा और अब अमेरिकी पूंजीवाद इस देश को बाजारवाद के माध्यम से अपना आर्थिक गुलाम बनाने की जुगत में हैं....ग्राम प्रधान के चुनाव की घोषणा होते ही प्राकृतिक रूप से दो भागों में विभाजित यह गाँव राजनैतिक रूप से भी दो धडों में बंट जाता है। एक ओर हैं बाहर से आकर गवाल गाँव में बस गये प्रगतिशील गैर मौरसीदार और दूसरी ओर हैं स्थानीय रूढवादी मौरसीदार। स्थानीय मौरसीदार गाँव को अपनी बपौती समझते हैं। वे गैर मौरसीदार को अपने बराबर का नहीं समझते। उनका प्रतिनिधि पहले भी ग्राम का प्रधान रह चुका है लेकिन उसके प्रधान काल में शासन द्वारा विकास के मद में मिली धनराशि प्रशासनिक अधिकारियों, उसके सहयोगियों में बंट गई थी। उसका मानना है कि-’सरकारी ढंाचा सिवा दूधिया भैंस के कुछ नहीं, जो पुचकार कर जितना दाना पानी डालेगा उतना ही दूध दुह सकता है।‘ (पृ. १३) चुनाव की सरगर्मी तीव्र होते ही दोनों ओर से अपने पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए सरगर्मियां तेज हो जाती हैं। मुरली अपनी पूरी बिरादरी को अपनी बैठक में बुलाकर पूरी बिरादरी से ’’लूण लोटा‘‘ का संकल्प करवाता है। उधर प्रगतिशील गैर मौरसीदार पोस्टरों, बैनरों और नाटकों द्वारा जन-समर्थन जुटाने में जुट जाते हैं। तत्पश्चात् चुनाव के दौरान जो कुछ देश में होता है वही सब इस गाँव में भी घटित होने लगता है। शराब, जातिवाद, वर्गवाद, प्रार्थना, मनुहार और दबंगई। उपन्यास में भरपूर आशावाद के साथ-साथ आदर्शवाद भी है लेकिन यह आशावाद उपन्यास की आत्मा में विकसित न होकर उस पर आरोपित महसूस होता है। उपन्यास का अन्त बिल्कुल फिल्मी ढंग का है। उपन्यास के अन्त में जो मारपीट और खून खराबा उसका प्रत्यक्ष कारण चुनावी रंजिश न दिखाकर अप्रत्यक्ष बसंत और सुली के प्रेम प्रसंग को बनाया जाता तो उपन्यास का अन्त ज्यादा यथार्थवादी हो सकता था। उपन्यास में स्थानीय बोली के शब्द उपन्यास की भाषा में घुले हुए महसूस नहीं होते। भाषा के प्रवाह में भी लयात्मकता नहीं है। बावजूद इसके यह उपन्यास अंधेरे में रोशनी की एक नन्हीं किरण का काम तो करता ही है।
Discuss this topic on KhabarExpress Forum
|
|
October, 2006 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | January, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | February, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | March, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | April, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | May, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | June, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | |
|