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Vartmaan Sahitya ::January, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner आखिर अन्त में...
राजेन्द्र सिंह गहलौत
दंगे फिर दंगों के प्रतिशोध में दंगे और दंगों में लगातार मरता रहा आदमी मरती रही आदमीयत। धीरे-धीरे आखिर अन्त में सब मर गये शायद अन्त में शेष बचा अकेला आदमी अकेलेपन से घबरा कर मर गया। नगर, कश्स्बे, ग्राम में शेष रहे बस मुर्दे ही मुर्दे, खण्डहर ही खण्डहर, और हैवानियत पर आँसू बहाती चुपचाप सिसकती वीरानियत। पूरा देश मुर्दाघर होकर रह गया। लावारिस पडे मुर्दे कफश्न और दफश्न के लिए तरस गये। अनाथ शवों की निर्जीव आँखें अन्तिम संस्कार की राह तकती हुई पथरा गयीं। आखिर अन्त में मुर्दे खुद ही उठकर कब्रिस्तान में अपनी-अपनी कब्र खोदकर खुद ही दफश्न हो गये। शव स्वयं चलकर श्मशान घाट पहुँचे लकडयां चुनकर चिता बनाई और उसमें आग लगाकर स्वयं ही उसपर लेट गये और स्वयं अपनी दाहक्रिया कर पंचतत्व में विलीन हो गये। उनके गष्म में सूने पडे खण्डहर मकानों ने विलाप किया सिसके रोये और स्वयं ही ध्वस्त हो गये। पूजा, इबादत के बिना वीरान पडे मन्दिर, मस्जिद ने अपनी भयावह वीरानियत से घबराकर आखिर अन्त में एक दिन स्वयं अपनी पूजा, इबादत की। मन्दिर ने स्वयं घंटे बजाये, आरती उतारी, भजन गाये। मस्जिद ने अजषन दी, नमाजष् अदा की, और स्वयं अपनी इबादत की। फिर एकाएक दोनों ने ही अपने अन्दर झांक कर देखा तो आश्चर्य चकित रह गये। मन्दिर से भगवान और मस्जिद से खुदा तो कई युगों से लापता थे इस हकीकत का पता उन्हें आज चला और एकाएक मन्दिर मस्जिद एक दूसरे के गले से लिपट कर सिसक पडे।
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