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दावानल: जनसंघर्ष की सशक्त अभिव्यक्ति
दीवान नगरकोटी
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दावानल‘ जन-आन्दोलनों के बहाने पहाडी जनजीवन की मर्मान्तक पीडाओं और संघर्षों का जीवंत दस्तावेज भर नहीं वरन् सत्ता, राजनीति और व्यवसायियों के लालची गठबंधन के बीच दो जून की रोटी के लिए दिन-रात खटते गाँव और उनकी बेहतरी के लिए संघर्षशील ताकतों की अपनी व्यथा-कथा का सहज भाषा में साफगोई से किया गया जीवंत चित्राण भी है जो, भौगोलिक और राजनीतिक सीमाओं से परे देश और दुनिया में भटकाव के कगार पर खडी उन तमाम संघर्षशील ताकतों को आत्ममंथन कर, फिर एक बार नए संकल्प के साथ उठ खडे होने के लिए प्रेरित करता है। ये विचार नवीन जोशी के सद्यः प्रकाशित उपन्यास ’दावानल‘ पर हिन्दी साहित्य के उन साहित्यकारों के हैं, जो अल्मोडा में (२९ अक्टूबर को) ’दावानल‘ के विमोचन के बहाने ’कथा साहित्य और जन आन्दोलन‘ विषय पर की गई गहन चर्चा में सामने आए। मीडिया एक्शन ग्रुप अल्मोडा द्वारा आयोजित इस चर्चा में वरिष्ठ कहानीकार शेखर जोशी ने ’दावानल‘ की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि रवाँई के किसान आन्दोलन से लेकर चिपको, नशा नहीं रोजगार दो और पेड काटो जैसे जन-आन्दोलनों की पृष्ठभूमि पर लिखा गया यह उपन्यास प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद सत्ता और व्यवसायियों के लालच और भूस्खलन-बाढ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के बीच निश्चल पहाडी महिलाओं के संघर्ष के साथ ही प्रवास की पीडा, राजनीतिक दलों के छलावे में भटकती युवा पीढी और आन्दोलनकारी संगठनों के अंतरविरोधों को बखूबी उजागर करता है। तमाम क्षेत्राों में अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत जनता की भी यह आपबीती लगती है। हिमांशु जोशी के ’कगार की आग‘ के बाद ग्रामीण जीवन की मार्मिक पीडाओं की इतनी जीवंत और सशक्त अभिव्यक्ति का आना मेरे लिए एक और सुखद अनुभूति है। वरिष्ठ साहित्यकार हिमांशु जोशी ने कहा कि नवीन ने सहज और सरल भाषा में साफगोई से हमारे समाज के कटु यथार्थ को तो उजागर किया ही है, साथ ही सत्ता, राजनीति, जन-आन्दोलन और संघर्षशील ताकतों के अंतरविरोधों को जिस गूढता के साथ पिरोया है, ऐसा सामंजस्य कभी-कभार ही देखने को मिलता है। नवीन जोशी ने ’दावानल‘ के अपने अनुभवों से रू-ब-रू कराते हुए कहा कि ’दावानल‘ हजार कष्टों के बीच थोडी-सी खुशी की आस में संघर्षरत ईजा और दूर शहरों में आजीविका के लिए जूझ रहे बाबू की टीस की परिणति है। ’पहाड‘ के संपादक और सीनियर नेहरू फेलो प्रो. शेखर पाठक ने लेखक के जीवन संघर्ष और साहित्यिक सफर के कई अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डाला। प्रो. पाठक ने कहा कि नवीन जोशी के दो कथा-संग्रहों ’अपने-अपने मोर्चे पर‘ और ’राजधानी की शिकार कथा‘ के बाद आया ’दावानल‘ आजादी के बाद उत्तराखंड में जन-आन्दोलनों के अंतरसंबंधों की गहन पडताल करता है। ’नैनीताल समाचार‘ के सम्पादक राजीव लोचन शाह ने कहा कि जिस प्रकार इस उपन्यास का नायक राजनीतिक विचारधाराओं के टकराव-बिखराव के बावजूद सबकुछ त्यागकर अंततः वापस पहाड आता है और नई ऊर्जा के साथ सृजन की शुरुआत करता है, वह जन-आन्दोलनों की पृष्ठभूमि वाले तमाम पीडत समाजों और संघर्षशील ताकतों को उम्मीद भरी एक दिशा भी दिखाता है। कुमाऊँ वि.वि. परिसर, अल्मोडा में हिन्दी की उपाचार्य डॉ. दिवा भट्ट ने कहा कि ’दावानल‘ को पढते-पढते पाठक यथार्थ के इतने करीब पहुँचने लगता है कि इसमें वर्णित तमाम चरित्राों एवं घटनाओं को अपने आस-पास ढूँढने लगता है। यही विशेषता इसे आम उपन्यासों से अलग करती है। रंगकर्मी गिरीश तिवाडी ’गिर्दा‘, आन्दोलनकारी डॉ. शमशेर सिंह, पी.सी. तिवारी आदि ने इतिहास और साहित्य के फर्क को साफ करते हुए कहा कि ’दावानल‘ के चरित्राों या प्रसंगों को किसी एक व्यक्ति या घटना से इतर व्यापक सामाजिक संवेदनाओं और राजनीतिक संदर्भों की कसौटी पर देखा जाना चाहिए। समारोह के अध्यक्ष लक्ष्मण सिंह बिष्ट ’बटरोही‘ ने कहा कि उत्तराखंड में आजादी के बाद जन-आन्देालनों की पृष्ठभूमि पर लिखा गया अपनी तरह का यह अनूठा उपन्यास है। इसके चरित्राों को हम यथार्थ के बहुत करीब पाते हैं। चर्चा से पूर्व जाने-माने कथाकार शेखर जोशी ने ’दावानल‘ का विमोचन किया। इस मौके पर कथाकार शेखर जोशी, हिमांशु जोशी, नवीन जोशी और उनकी पत्नी श्रीमती लता जोशी को सम्मानित किया गया।
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