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Vartmaan Sahitya ::January, 2007
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प्रेमचन्द जयन्ती सन्तोष खरे
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म. प्र. प्रगतिशील लेखक संघ की सतना ईकाई के द्वारा ’’प्रेमचन्द जयन्ती‘‘ का आयोजन एक गोष्ठी के माध्यम से किया गया। गोष्ठी की अध्यक्षता डॉ. मधुमास चन्द्र (ग्वालियर) ने की तथा संचालन हनुमंत किशोर ने किया। अपना आलेख प्रस्तुत करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्राकार चिंतामणि मिश्र ने कहा कि प्रेमचन्द हिन्दुस्तान की आत्मा, धडकन और मिट्टी के लेखक थे। उनका मूल्यांकन कई विद्वानों ने कई तरह से किया है किन्तु मुझे लगता है कि उनके कृतित्व को लेकर पुनर्विचार का काम अभी शुरू नहीं हुआ। कई प्रश्न हैं जिनके उत्तर खोजने होंगे। इस परम्परा को जाने बिना प्रेमचन्द का वास्तविक मूल्यांकन करना सम्भव नहीं है। चर्चा में भाग लेते हुए देवीशरण ग्रामीण ने कहा कि प्रेमचन्द ने अपने वर्तमान को यथार्थवादी दृष्टिकोण से सामाजिक परिवर्तन के लिए लिखा है। जो साहित्य सामाजिक परिवर्तन नहीं करता वह साहित्य सार्थक नहीं माना जा सकता। जब तक पूंजीवाद रहेगा सच्चाई समाप्त होती रहेगी। विनोद पयासी ने कहा कि यदि एन्जिल्स का माक्र्स को साथ न मिला होता तो माक्र्स विचारक के रूप में सामने न आता। समाज में भ्रष्टाचार और पाखण्ड के विरूद्ध प्रेमचन्द ने कलम चलाई थी। भूखा आदमी संवेदना शून्य हो जाता है। इन मानवीय स्थितियों को प्रेमचन्द ने अपनी रचनाओं में प्रस्तुत किया है तथापि उनकी रचनओं की पुर्नपाठ की आवश्यकता है। मोहनलाल वर्मा मुकुट ने कहा कि ग्रामीण जीवन का यथार्थ देखना हो तो प्रेमचन्द को पढना चाहिए। वे अपने समय के प्रतिनिधि लेखक हैं किन्तु उनके साहित्य के शोध की आवश्यकता है। ऋषिवश ने कहा कि प्रेमचन्द दृष्टा लेखक हैं उन्होंने सरल-सहज ढंग से लिखा है और कहीं-कहीं उनका गद्य काव्य जैसा लगता है। उन्होंने देखकर लिखा है न कि सोचकर। कुटियों से लेकर राजमहलों तक वे एक लोकप्रिय साहित्यकार हैं। उनकी रचनाओं में पुनरावृत्ति देखने को नहीं मिलती। वे अतुलनीय हैं। बाबूलाल दाहिया ने कहा कि प्रेमचन्द की रचनाओं में एक आग जलती दिखाई देती है जैसे ’’पूस की रात‘‘ में उनपर आर्य समाज, रूस की क्रान्ति और गँाधी का प्रभाव था। गाँव का पाठक स्वयं को उनकी रचनाओं में उपस्थित पाता है। पर लोग उन्हें समझ नहीं पाते जो लोग उनका विरोध करते हैं वे या तो नादान हैं या कुटिल। रामनारायण सिंह राना ने कहा कि प्रेमचन्द की हिन्दी भाषा में उर्दू भी शामिल थी। वे दोआब के रचनाकार थे और उन्होंने हिन्दुस्तानी भाषा का प्रयोग किया। प्रह्लाद अग्रवाल ने कहा कि प्रेमचन्द का सादा जीवन जीने का ढंग उनका लेखन था। किन्तु आज लिखे हुए शब्द अप्रासंगिक हो गये हैं। बाजषर में लोगों को स्थगित कर दिया है। पचास वर्षों से प्रेमचन्द को खारिज करने की साजिष्श चलती रही है किन्तु प्रेमचन्द और अधिक स्थापित होते गये। वे मानवमन के कथाकार थे किसी वाद या विचारधारा के नहीं। प्रेमचन्द अभिधा में जंग करते हैं। गोष्ठी के संचालक हनुमंत किशोर ने इस अवसर पर कहा कि कोई भी रचना विचार के बिना सार्थक नहीं हो सकती। प्रेमचन्द साधारण प्रतिभा के असाधारण लेखक हैं। गोष्ठी म गोरखनाथ अग्रवाल ने प्रस्ताव रखा कि नगर के किसी चौराहे अथवा अन्य स्थान पर प्रेमचन्द की मूर्ति स्थापित की जानी चाहिए ताकि आगे आने वाली पीढयाँ उनके महत्त्व को समझ सकें। विष्णु स्वरूप श्रीवास्तव ने उनके संबंध में एक लघुकथा उपहार का पाठ किया। गोष्ठी के अध्यक्ष डा . मधुमास चन्द्र ने कहा कि प्रेमचन्द का चाक्षुष प्रभाव जबरदस्त है जिसका उदाहरण उनकी कहानियों ’’शतरंज के खिलाडी, सद्गति, दो बैलों की कथा, हीरा मोती गुल्ली-डण्डा, ईदगाह, बडे भाई साहब आदि हैं। मूर्ति लगाने के प्रस्ताव पर उन्होंने कहा कि आप मूर्ति अवश्य लगायें पर उसका अनावरण किसी नेता से नहीं बल्कि किसी साहित्यकार, मूर्तिकार अथवा संगीकार से करायें। उन्होंने कहा कि यदि साहित्य का कोई सामाजिक सरोकार है तो वह जीवित रहेगा और प्रेमचन्द यहाँ पैदा होते रहेंगे। गोष्ठी में बद्रीप्रसाद दीक्षित, भरत कुमार जैन, रामशैल गर्ग, छोटेलाल पाण्डे, डॉ. बांके बिहारी द्विवेदी, अनिल श्रीवास्तव, मोहनलाल रैकवार ने भी संक्षेप में अपने विचार व्यक्त किये। गोष्ठी में उपरोक्त के अलावा उमेश साहनी, ठाकुर खिलवानी उपस्थित रहे। गोष्ठी के अन्त में समभागीय प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष संतोष खरे ने आभार व्यक्त किया।



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