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Vartmaan Sahitya ::January, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner प्रेमचन्द ः हमारे इस दौर की समकालीनता
जषहिद खान
प्रेमचन्द ने सिर्फ किसानों की समस्याएँ ही नहीं उठाईं बल्कि उनकी जीवनशैली उनके अंतर्विरोधों का जिस तरह से चित्राण किया और गाँवों के किरदारों को जो भाषा दी वह अद्भुत है। प्रेमचन्द के साहित्य में किसानों की जो भाषा है वह हिन्दी साहित्य में उनका बडा योगदान है। हमारे समकालीन साहित्यकारों के साहित्य में गाँव तो हैं मगर किसान नहीं हैं। ग्रामीण परिवेश पर लिखने वाले सिर्फ गाँव में पैदा हुए हैं रहते शहर में हैं, कुछ स्मृतियाँ हैं, यादें है, उन्हीं के आधार पर कहानी लिख देते हैं। किसान समस्या पर सतही ढंग से लिखा जा रहा है। लेखन में किसानों का शोषण प्रतिबिम्बित नहीं हो रहा है। यह उद्गार थे प्रसिद्ध कथाकार डॉ. अब्दुल बिस्मिल्लाह के। मौकश था उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द की १२५वीं जयन्ती वर्ष के समापन समारोह का जो म. प्र. प्रगतिशील लेखक संघ की इकाई शिवपुरी द्वारा आयोजित ’प्रेमचन्द की समकालीनता‘ विषय पर बोल रहे थे। कार्यक्रम की शुरुआत में स्वागत भाषण में अतिथियों का स्वागत और परिचय देने के उपरांत प्रो. पुनीत कुमार ने कहा-’कबीर के बाद प्रेमचन्द दूसरे रचनाकार हैं जो धर्म और धन को शोषणकारी व्यवस्था का कारण मानते हैं।‘ लेखक समाजशास्त्राी पंकज बिष्ट ने कहा-प्रेमचन्द का दौर वह था जब भारत इंग्लैण्ड का उपनिवेश था और हमारा समाज मूलतः कृषि समाज था। उस समाज में जडता थी किसानों का शोषण हो रहा था। गोदान तत्कालीन समाज को समझने के लिए उस समाज को जो कृषिजन्य समाज था समझने के लिए सबसे बडी किताब है। जो समाज कृषि पर आधारित होता है तुलनात्मक रूप से परम्परागत समाज होता है। कथाकार प्रकाश कांत ने कहा कि सरकार की पूंजीवादी नीतियों ने किसानों का नुकसान किया है। सरकार हमारे किसानों से फसल समर्थन मूल्य पर खरीदती है मगर आस्ट्रेलिया से दो सौ रूपये प्रति क्विंटल ज्यादा मूल्य पर गेहूँ आयात किया जा रहा है। कम्यूनिष्ट नेता लेखक ई. एम. एस. नम्बूदिरीपाद ने कहा था बंगाल के सारे बुद्धिजीवी लेखक जो अपनी सोच और लेखन में महान थे, अपना दाना-पानी अपनी जमीदारियों से हासिल कर रहे थे वहीं प्रेमचन्द का सारा जीवन अपने संघर्षों से साहित्य के लिए पूंजी जुटाता रहा। कवि रामजीलाल चतुर्वेदी ने अपनी कविता के जषिरये किसानों की दुर्दशा का ख्ााका खींचा। उनकी कविता में किसानों की ऋण समस्या, बेदखली पूरी शिद्दत से महसूस की गयी। कथाकार पुन्नी सिंह ने कहा प्रेमचन्द का किसान, किसान नहीं बल्कि वह तो सर्वहारा है, बंधुआ मजदूर है। १९४८ में जमींदारी प्रथा खत्म हो जाने के बाद किसानों को मालिकाना हक मिला। आज महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश में किसान कर्ज के बोझ में दबकर आत्महत्या कर रहे हैं। कार्यक्रम के दूसरे सत्रा में प्रेमचन्द के कथा साहित्य में स्त्राी और दलित विषय पर बोलते हुए कवि अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा उपन्यास रंगभूमि, कहानी पूस की रात, कफश्न दलित विमर्श की पूर्व पीठिका है। लेखक जाहिद खान ने कहा, प्रेमचन्द ने आर्थिक समस्या के केन्द्र में किसान को तो सामाजिक समस्या के केन्द्र में स्त्राी को रखा। स्त्राी की स्वाधीनता की वकालत की। पुश्किन सम्मान से सम्मानित कवि पवन करण ने कहा कि हिन्दी साहित्य में स्त्राी के सशक्त चरित्रा-चित्राण की जब भी बात होती है तो उसमें निराला की वह तोडती पत्थर की नायिका और गोदान की धनिया की जरूर याद आती है। गीतकार विद्यानन्द ’राजीव‘ ने कहा प्रेमचन्द ही सर्व प्रथम दलित और स्त्राी को साहित्य के केन्द्र में लाये। सत्रा का संचालन डॉ. (श्रीमती) पद्मा शर्मा ने किया वहीं आभार प्रदर्शन प्रलेसं सचिव जाहिद खान ने किया।
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