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माँ का शताब्दी वर्ष

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गोर्की का ’माँ‘ उपन्यास एक ऐसी विश्वव्यापी रचना है जिसने कई पीढयों के परिवर्तनकारी आंदोलनों में मदद की है। यह विश्व के सबसे अधिक पढे जाने वाले उपन्यासों में से है। इसका विश्व की लगभग हर भाषा में अनुवाद हो चुका है। हिन्दी के अनेक रचनाकारों पर भी गोर्की का बहुत गहरा प्रभाव पडा है। पुरानी पीढी के प्रेमचंद और यशपाल इसके प्रमुख उदाहरण हैं। ’माँ‘ १९०६ की गर्मियों में संयुक्त राज्य अमेरिका में लिखा गया, यद्यपि गोर्की ने १९०५ की पहली रूसी क्रान्ति के पहले ही इसे लिखने की तैयारी आरम्भ कर दी थी। १९०२ में सोर्मोवो बस्ती में मजदूरों का जारशाही के विरुद्ध आंदोलन हुआ। इस समय गोर्की ’नीज्नी‘ में ही थे और उन्होंने स्वयं यह देखा था। उस बस्ती के मजदूरों के जीवन से भी गोर्की भली-भांति परिचित थे। उस बस्ती में रहने वाले ’प्योत्रा जालोमोव‘ तथा उसकी माँ ’अन्ना किरीलोव्ना‘ को भी खूब जानते थे। प्योत्रा जालोमोव उस आंदेालन में सबसे आगे-आगे रहता था। उसी प्योत्रा जालोमोव को गोर्की ने ’माँ‘ उपन्यास का मुख्य पात्रा ’पावेल बलासोव‘ तथा प्योत्रा की माँ अन्ना किरीलोव्ना को ’पेलागेया निलोवना‘ बनाकर पेश कर दिया। गोर्की के इस उपन्यास का मूल संदेश है कि समाज और सत्ता में बिना सामूहिक प्रयास के परिवर्तन नहीं हो सकता है तथा स्वतंत्राता प्राप्ति का रास्ता बहुत कठिन है। इसके लिए त्याग और बलिदान की भी आवश्यकता है। देश की साधारण जनता स्वतंत्राता के लिए जो संघर्ष करती है ’माँ‘ उसका पहला उदाहरण है। ’माँ‘ उपन्यास यह स्थापित करने का प्रयास भी करता है कि सबसे बडी परिवर्तनकारी शक्तियां नौजवानों तथा स्त्रिायों के पास होती हैं। एक अन्य समाज में धर्म की भूमिका की व्याख्या उद्देश्य है। समय आने पर साधारण तथा दबे-कुचले लोग भी ऐसे विद्रोह कर देते हैं जिनका दूसरा उदाहरण खोजे से नहीं मिलता है। सत्ता धर्म का दुरूपयोग कर जनता की भावना को आहत करती है जबकि साधारणजन के लिए धर्म एक व्यक्तिगत प्रश्न है जिसका एक नैतिक आधार होता है-’’उसने ईसा मसीह के जो चित्रा देखे थे और उनके बारे में जो कहानियां सुनी थीं उनसे वह जानती थीं कि वह बहुत साधारण कपडे पहनते थे और गरीबों के मित्रा थे। पर गिरजाघरों में वह उनकी मूर्ति को चमकदार सोने और रेशम में सजा हुआ देखती थी और जब गरीब लोग अपना दुखडा लेकर उनके पास आते थे तो मानो उन्हें देखते ही घृणा से इस रेशम में सरसराहट होने लगती थी।‘‘ (पृष्ठ संख्या-२६६) हमारे देश में तो आज हालत इससे भी बदतर हैं। पिछले दिनों सिरडी वाले सांई बाबा के भक्तों ने उनका २४ लाख का सिंहासन बनाने की बात की थी जबकि सच्चाई यह है कि सिरडी वाले बाबा साधारण कपडे पहनकर घूम-घूम कर लोगों की सेवा करते थे। यहाँ मंदिरों, मस्जिदों तथा गुरुद्वारों की संख्या अनंत है। इनकी भव्यता को देखकर भगवान भी आश्चर्यचकित रह जाते होंगे। एक सर्वे के मुताबिक देश की १८ प्रतिशत संपत्ति इन धार्मिक संस्थानों के पास है। इस संबंध में ’माँ‘ की यह उक्ति सटीक है कि उन्होंने हमें ईश्वर के मामले में भी बेवकूफ बना दिया है। ’माँ‘ गोर्की की अन्य रचनाओं से भिन्न क्यों हैं? इसलिए कि इसमें क्रान्तिकारी आह्वान है। मजदूरों को समाज का निर्माणकर्ता दिखाया गया है। इसमें सक्रिय क्रान्तिकारी मानवतावाद दिखायी देता है तथा यह सीख देता है कि यदि कोई महान उद्देश्य या लक्ष्य जब एकबारगी समझ में आ जाता है तो अत्यंत साधारण पिछडे, दबे-कुचले लोग भी असाधारण कार्य कर बैठते हैं। ’माँ‘ की कहानी भी लक्ष्य के प्रति विश्वास तथा आस्था की ऐसी ही कहानी है। जिसमें ’पेलागोया निकोवना‘ असाधारण कार्य कर बैठती है। दबी-कुचली, अपढ-रूढवादी धार्मिक स्त्राी की चेतना का स्वाभाविक विकास किस प्रकार होता है इस उपन्यास की आधारशिला है। उपन्यास में समाजवादी विचारों, मजदूरों की क्रांति, गरीब किसानों और बुद्धिजीवियों की एकजुटता उनके साझे मोर्चे आदि के प्रश्नों को गोर्की ने बहुत अच्छे ढंग से उठाया है। गोर्की ने मजदूरों का समर्थन किस सुन्दर ढंग से किया है यह द्रष्टव्य है-’’उनमें एक महान शक्ति छुपी हुई है। वे कुछ भी कर सकते हैं। हमें बस उन्हें यह जता देना है कि उनका असली मूल्य क्या है ताकि वे आजादी से आगे बढ सकं।‘‘ (पृष्ठ संख्या-२३५) निलोवना जैसी अपढ स्त्राी जब इस सत्य को समझ लेती है तो उसके अंतर्नेत्रा खुल जाते हैं और उसे वह शक्ति मिलती है जिससे वह किसी भी ताकत से टकरा सकती थी। इसीलिए लेनिन ने कहा कि बहुत से मजदूर, क्रांतिकारी आंदोलन में चेतना के बिना स्वतः स्फूर्त ढंग से हिस्सा लेते थे और अब ’माँ‘ पढकर उन्हें लाभ होगा। स्त्राी-कितनी संघर्षशील होती है यह भी इस उपन्यास से उद्घाटित होता है। निकोवना, साशा, नताशा, मारिया, सोफिया जैसे किरदारों को देख कर आश्चर्य होता है। स्त्राी-विमर्श का डंका पीटने वाले यदि इन स्त्रिायों के चरित्रा का अध्ययन करें तो उन्हें उनकी वास्तविक दुनिया का पता चलेगा-’’औरत होना ही मुसीबत है। सब की सब गई बीती हैं इस धरती पर। अकेली रहे-तो बुरी, मरद करे-तो मरी।‘‘ मारिया के इन शब्दों की पीडा को देखा एवं समझा जा सकता है। साथ ही यह उपन्यास शासक वर्ग के लिए चुनौती है। शासक का अत्याचार जब अपने चरम पर पहुंच जाता है तो जनता उठ खडी होती है और दुगुनी शक्ति से प्रहार करती है। अतः में निकोवना जषर के सैनिकों से कहती है-’’अरे बेवकूफों, तुम जितना अत्याचार करोगे, हमारी नफरत उतनी ही बढेगी। और एक दिन यह सब तुम्हारे सिर पर पहाड बनकर टूट पडेगा।‘‘ (पृष्ठ संख्या-४३१) गोर्की का ’माँ‘ आज भी इसलिए सार्थक है कि उसमें अक्टूबर क्रान्ति से पूर्व के रूस की वास्वविकता का यथार्थवादी चिन्तन मिलता है। उस उपन्यास से यह भी सिद्ध होता है कि राजनीतिक उपन्यास बहुत श्रेष्ठ हो सकते हैं यदि वो मानवीय संवेदना से भरपूर हो, उसमें यथार्थ परिस्थितियों को कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया हो और कलात्मक सौन्दर्य की भी माँग करता हो। ’माँ‘ का महत्व इसलिए भी है कि इससे केवल रूस की क्रान्ति का ही पता नहीं चलता अपितु तीसरी दुनिया के देशों के लिए क्रान्ति के महत्व को भी प्रतिपादित करता है। महानगर के नारी-विमर्शवादियों के लिए यह उपन्यास एक सीख हो सकती है कि नारी की अस्मिता, देह-दर्शन से नहीं बल्कि संघर्ष करके परिस्थितियों को बदलने में है। उपभोक्तावाद हमें समाज से काटता है और साथ ही साथ विचारहीन भी बनाता है। सौ साल बाद भी ’माँ‘ को याद करना इसलिए भी आवश्यक है कि हम श्रेष्ठ मनुष्य बन सकें। इसके लिए आवश्यक है कि हम श्रेष्ठ राष्ट्र का निर्माण करें। हमारा अपने पाठकों से अनुरोध है कि वह इसे नये संदर्भ के साथ पढें क्योंकि ’माँ‘ के साथ भगत सिंह की सौवीं तथा १८५७ की १५०वीं जयंती पर उन्हें नये सिरे से समझने तथा सार्थकता तलाश करने की आवश्यकता है।



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