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किसी भी शहर की संस्कृति जानने के लिये उस शहर के भूगोल, इतिहास और नागरिक शास्त्रा को संक्षेप में जानना जरूरी लगता है। इसके बाद ही उस शहर के मिजाजष् का सही जायजष लिया जा सकता है। म.प्र. में मुंबई-हावडा रेल लाइन पर जबलपुर-इलाहाबाद के बीच स्थित सतना तत्कालीन विन्ध्य प्रदेश का प्रदेश द्वार कहा जाता था अर्थात् रीवा, सीधी, पन्ना या छतरपुर आने वाले लोग सतना स्टेशन पर उतरते थे। इसके अलावा प्रसिद्ध तीर्थ चित्राकूट और मैहर भी इसी जिले में स्थित हैं। विश्व-प्रसिद्ध पर्यटन स्थल खजुराहो आने के लिये भी अधिकांश पर्यटक सतना होकर ही आते हैं। इस जिले में रामवन, बिरसिंहपुर, भरजुना आदि स्थान भी लोगों के आकर्षण का केन्द्र है। सतना का नामकरण कैसे हुआ इस संबंध में भी विभिन्न प्रकार के मत हैं। विन्ध्य-प्रदेश विधान-सभा के पूर्व अध्यक्ष एवं तत्कालीन प्रजामंडल के अध्यक्ष और बाद में बघेलखण्ड कांग्रेस कमेटी के सदस्य श्री शिवानन्द के अनुसार सतना नगर का नाम सतना नदी के नाम से है। उनका मत है कि यह नाम सुतीक्ष्ण मुनि के कारण भी माना जाता है। जो पहले ’सुतिक्षणा‘ था और बाद में परिवर्तित होकर सतना हो गया। जबकि वरिष्ठ पत्राकार चिन्तामणि मिश्र का मत है कि नाम पहले ’सुतना‘ के रूप में जाना जाता था जो बाद में सतना हुआ। बहरहाल सही तथ्य जो भी हो आज यह सतना के रूप में जाना जाता है और वैसे भी नाम में क्या रखा है? तत्कालीन बघेलखण्ड की राजधानी रीवां थी जिसके अंर्तगत सतना था। इस कारण राजघराने के जमाने का प्रभाव कमोबेश आज भी सतना में देखने को मिलता है। रीवां राज्य के कई पुराने भवन आज किसी न किसी रूप में उपयोग हो रहे हैं और अपनी ऐतिहासिकता को प्रमाणित करते हैं। यहां के राजनैतिक इतिहास की नींव के पत्थरों में बाबूलाल बिहारी, शारदा प्रसाद, विश्वासराव पेन्टर, गनपत प्रसाद मारवाडी, पं. अवधबिहारी लाल, हुकुमचंद नारद, पं. रामस्वरूप, मोहनलाल मिश्र, शिवानन्द लाल, पद्मधर सिंह आदि है। यह सूची तो बहुत लंबी है पर सतना के राजनैतिक इतिहास में ये ऐसे नाम है जिनके द्वारा यहां राजनैतिक चेतना जाग्रत हुई। बाद में यहां गोविन्द नारायण सिंह (प्रदेश की संविद सरकार के मुख्यमंत्राी), बैरिस्टर गुलशेर अहमद (विधान सभा अध्यक्ष तथा विधि मंत्राी) डॉ. लालता प्रसाद खरे (नगर पालिका के सबसे लंबे समय तक चेयरमैन और बाद में राज्य मंत्राी) सक्रिय हुये। सतना का राजनैतिक इतिहास गुटबाजी और आपसी उछाड-पछाड का दस्तावेज है। राजनीति का खेल ब्राह्मण, ठाकुर और दलितों के बीच चलता रहता है। इसका परिणाम यह है कि कभी अर्जुन सिंह जैसे मंजे राजनीति के खिलाडी भी सतना से चुनाव हार जाते हैं। कांग्रेस का एकगुट शिवानन्द जी से इस कारण नाराज रहता था कि वे ईमानदार है। इसी तरह डॉ. लालता प्रसाद खरे भी अपनी ईमानदार छवि के कारण धीरे-धीरे हाशिये पर ढकेल दिये गये किन्तु डॉ. खरे ने अपने जीवन भर की कमाई और पैतृक निवास बेचकर समीप के नीमी ग्राम में अनाथ बच्चों तथा वृद्धों के लिये एक विशाल आश्रम बनावाया। उनका यह सुकृत सतना के इतिहास में स्वर्णक्षरों में लिखा जायेगा। सतना अब एक औद्योगिक शहर के रूप में जाना जाता है। बिरला घराने की सीमेन्ट की दो फैक्ट्रीयां सतना सीमेन्ट फैक्ट्री तथा मैहर सीमेन्ट और यूनिवर्सल केबिल्स फैक्ट्री हैं। एक और प्रिज्म सीमेन्ट है। इनके अलावा चूना उद्योग के कई छोटे-बडे संस्थान स्थापित है। बीडी उत्पादकों के कई संस्थान हैं। यहां के बाजार पर सिंधी, मारवाडी और गुजराती व्यापारियों का वर्चस्व है। यहां के औद्योगिक घराने और बडे व्यापारी, नेताओं या दादा टाइप के लोगों को खुले दिल से चंदा देते हैं पर यदि कोई साहित्यकार या समाजसेवी अपने आयोजनों के लिये चंदा या विज्ञापन मांगने आता है तो उसे टाल दिया जाता है। वास्तव में यहां बाजार पूरी तरह ’बाजारवाद‘ की गिरफ्त में है। नगर में पर्याप्त संख्या में मंदिर और मस्जिद हैं और जब कोई ’चतुर‘ व्यक्ति शासकीय भूमि पर कब्जा करना चाहता है, आनन-फानन में एक छोटा सा मंदिर बनवा लेता है जो देखते ही देखते बडे मन्दिर में तब्दील हो जाता है। पूरे वर्ष श्रीमद् भागवत की विशाल स्तर पर कथायें होती हैं। अक्सर कोई न कोई धार्मिक प्रवचनकर्ता प्रवचन करते हैं जिन्हें सुनने के लिये भारी भीड इकट्ठी होती है। दशहरा विशेष धूमधाम से मनाया जाता है। इसके पहले नवदुर्गा उत्सव समितियों के द्वारा पूरे शहर में दुर्गा की प्रतिया स्थापित होती है। रात्रिा, जागरण, कवि सम्मेलन, गरबा और डांडिया की धूम मची रहती है और इन आयोजनों में अनुमानतः एक करोड रुपये तक खर्च किये जाते हैं। मेरा आशय किसी की धार्मिक आस्था या विश्वास को ठेस पहुंचाना नहीं। यद्यपि इन आयोजनों में फिल्मी गानों की धुन पर देवी-गीत, भौंडे और अश्लीलता की सीमा तक होने वाले नृत्य और सामूहिक गरबा या डांडिया नृत्यों में इनके भागीदारों के मन में कितनी धार्मिक भावनायें होती है यह उनके प्रदर्शनों को देखकर आसानी से जाना जा सकता है। इस बेशुमार खर्च का उल्लेख केवल इस विसंगति को बताने के लिये किया गया है कि नगर के तालाब के किनारे रहने वाले भिखारी यदि इन आयोजनों के कर्त्ता-धर्त्ताओं के पास भीख मांगने पहुंचते है तो उन्हें दुत्कार कर भगा दिया जाता है। इसी तरह झुग्गी-झोपडी में निवास करने वाले श्रमिकों के लिये रोटी, कपडा और मकान की व्यवस्था आदि के संबंध में यहां के धनाढ्य शायद ही कभी कुछ सोचते हों। इन अभागे लोगों को बस दुर्गा पूजा के अंतिम दिन आयोजित होने वाले ’विशाल भंडारे‘ में मिलने वाली पूडी-सब्जी और बूंदी खाने को मिल जाती है बशर्ते कि वे समय से पहुंच जायें। नगर के धार्मिक (?) लोग जो वर्ष भर मिलावट, टैक्स चोरी और अन्य अवैध व्यापार करते हैं वर्ष में ऐसे ही एक-दो भंडारे कर पुण्य अर्जित करने और मुक्ति का मार्ग पा जाने की आशा में संतुष्ट हो जाते है। अपनी धार्मिकता की रही कसर वे वर्ष में दो तीन बार चित्राकूट या मैहर जाकर पूरी कर लेते हैं। बाजारवाद के पश्चात इसी तरह की ’धार्मिकता‘ शहर पर हावी है। यह शहर कई नामी गिरामी हस्तियों के कारण जाना जाता है। न्याय के क्षेत्रा में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रह चुके जस्टिस जे.एस. वर्मा यहीं के रहने वाले हैं। उन्होंने शुरू में यहां वकालत की फिर म.प्र. उच्च न्यायालय, राजस्थान उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के पदों में रहने के बाद वे सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचे। चित्राकूट में नानाजी देशमुख ने दीनदयाल शोध संस्थान, ग्रामोदय विश्वविद्यालय तथा अन्य शिक्षा संस्थान प्रारंभ कर समाज सेवा का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया। मैहर के विश्वप्रसिद्ध सरोद वादक उस्ताद अलाउद्दीन खां ऐसे महामानव थे जो मैहर की शारदा देवी के उपासक थे। उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम धर्म की एकता का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया। पद्म श्री स्वामी रामभद्राचार्य जो स्वयं अंधे हैं, ने चित्राकूट में अंधों के लिये विद्यालय प्रारंभ किया जो सुचारू ढंग से चल रहा है। इसी संदर्भ में यह उल्लेख भी असंगत नहीं होगा कि सतना में साम्प्रदायिक दंगे नहीं हुये और शुरू हुये भी तो स्थानीय सच्चे समाज सेवियों के प्रयास से नियंत्रिात कर लिये गये। सतना में पत्राकारिता का इतिहास अधिक पुराना नहीं। सन् १९४३ में देवीशंकर खण्डेलवाल ने राजकिशोर शुक्ला के साथ पहला ’भास्कर‘ नामक साप्ताहिक शुरू किया जो एक वर्ष तक प्रकाशित हुआ। सन् १९४८ में रामगरीब पाण्डेय ने ’बांधवीय‘ नामक साप्ताहिक का प्रकाशन किया यह भी एक वर्ष ही प्रकाशित हो सका। सन् १९५० में अब्दुल खालिक बच्चा, शक्ति प्रसाद पाण्डेय और ललित किशोर टण्डन ने मिलकर ’भरहुत समाचार‘ नामक साप्ताहिक शुरू किया। इसका विमोचन डॉ. राममनोहर लोहिया ने किया था। यह शहर का प्रथम समाजवादी विचारधारा का साप्ताहिक था जो डेढ वर्ष तक ही प्रकाशित हो सका। इस बीच सुदामा प्रसाद चौबे के संपादन में संतोष जैन तोतला ने ’खजुराहो टाइम्स‘ शुरू किया जिसका विमोचन विनोवा भावे ने किया जो ग्याहर अंकों तक ही प्रकाशित हुआ। इसी दौरान बेनी प्रसाद ने ’हमारी हुकूमत‘ भवानी पाण्डेय ने ’नगर भारती‘, चन्द्रकान्त पाण्डेय ने ’दिव्या‘, रामभरोसा मिश्र ने ’सतना टाइम्स‘, इंदल सिंह ने ’मयूर पंख‘ साप्ताहिक प्रकाशित हुये किन्तु इन अखबारों का जीवन तीन अंकों तक ही रह सका। सन् १९६० में रामखिलावन शर्मा ने ’सतना मेल‘ पाक्षिक शुरू किया पर यह भी अधिक नहीं चल सका। सन् १९६२ मे यहां का प्रथम दैनिक समाचार पत्रा ’सनसनी‘ जिसके संपादक चिन्तामणि मिश्र थे, सवा साल तक चल पाया। इसके बाद ’सतना समाचार‘ नामक दैनिक छकौडीलाल अग्रवाल ने शुरू किया जो काफी दिनों तक प्रकाशित हुआ। रज्जन श्रीवास्तव का ’सतना-संदेश‘ दैनिक चार माहो तक प्रकाशित हुआ, और एस.पी. शाही का ’दैनिक किरण‘ आठ माहों तक। सन् १९७१ में आनन्द अग्रवाल ने ’जवान भारत‘ नामक आठ पृष्ठीय साप्ताहिक शुरू किया जो दो वर्षों बाद सोलह पृष्ठों का हो गया। आपात्काल में इसके संपादक को गिरफ्तार कर लिया गया और इस साप्ताहिक का प्रकाशन भी बंद हो गया। जेल से लौटने के बाद ’जवान भारत‘ की आफसेट प्रेस पर प्रकाशित करने की तैयारी अपने अंतिम चरण में थी, किन्तु कतिपय असामाजिक तत्वों ने कायरतापूर्ण ढंग से आनन्द अग्रवाल की हत्या कर दी तथा पुत्रा विवेक को घायल कर दिया। लालचंद बसंताणी ने ’राष्ट्र चिन्तन‘ साप्ताहिक प्रारंभ किया जो आपात्काल के पूर्व तक प्रकाशित होता रहा। आपात्काल के दौरान और उसके विरोध में ’बिच्छू‘ शीर्षक से चार पृष्ठ का एक गुप्त समाचार पत्रा ’जवान भारत‘ प्रेस में छपता था और रातों-रात उसे देवीशंकर खण्डेलवाल के यहां चिन्तामणि मिश्रा के द्वारा भिजवा दिया जाता था। इस समाचार पत्रा की मात्रा १०० प्रतियां छपती थीं। सन् १९७४ के छकौडीलाल पाण्डेय ने ’नुकीला पत्थर‘ नामक साप्ताहिक शुरू किया जो अभी भी निकल रहा है। सन् १९८४ में यहां मायाराम सुरजन ने ’देशबंधु‘ दैनिक शुरू किया जो यहां का पहला आफसेट मुद्रण वाला आठ पृष्ठीय दैनिक था। जिसके स्थानीय संपादक श्यामसुंदर शर्मा थे। यह समाचार पत्रा इस नगर का प्रथम स्तरीय पत्रा कहा जा सकता है। इसी बीच ’नेशनल टुडे न्यूज‘ नामक एक और दैनिक प्रारंभ हुआ। जिसके संपादक के.जी. गुप्ता थे। किन्तु एक वर्ष तक ही वह चल सका तथा एक और सांध्य दैनिक आयोग निकला जो पांच माह तक ही चल सका इसके बाद सतना से नव-स्वदेश, नवभारत और फिर दैनिक भास्कर प्रकाशित होने लगे जो आज भी प्रकाशित हो रहे है। इनके अलावा बाहर से प्रकाशित होने वाले अखबारों के प्रतिनिधियों के रूप में रामकृष्ण वर्मा ’युगधर्म‘ जबलपुर, सुधीर जैन ’नई दुनिया‘ इंदौर, रामगोपाल श्रीवास्तव ’दैनिक जागरण‘ रीवा और संतोष खरे ’नव-भारत‘ जबलपुर तथा ’बान्धवीय समाचार‘ रीवा के नाम उल्लेखनीय है। इन्हीं दिनों श्री कुमार कपूर, आचार्य गिरिजा प्रसाद, हजारीलाल अवस्थी, जिया अहमद राज, शंकरलाल तिवारी, ईश्वर चन्द्र त्रिापाठी, इल्यास सिद्दिकी, निरंजन शर्मा, मिथलेश तिवारी आदि ने समय-समय पर छोटे-छोटे अखबार प्रकाशित किये किन्तु वे निरंतर प्रकाशित नहीं हो सके। वर्तमान में रामनिवास शर्मा ’पंचायत मेल‘ शरद औदीच्य ’समेरिया एक्सप्रेस‘ अनूप पाण्डेय ’व्यापार किरण‘ आदि साप्ताहिक प्रकाशित कर रहे हैं। यह कहा जा सकता है कि इस नगर में प्रकाशित होने वाले दैनिक और साप्ताहिक पत्राों की एक बडी संख्या है किन्तु सभी को स्तरीय समाचार पत्रा नहीं कहा जा सकता। समाचार एजेन्सियों के प्रतिनिधि के रूप में श्यामचरण शर्मा ’पी.टी.आई.‘ हर्ष नायक ’भाषा‘ दयाशंकर मिश्रा ’वार्ता‘ कार्यरत है। प्रेस फोटोग्राफी सन् १९७० से प्रारंभ हुई और कृष्णचंद गुप्ता प्रथम प्रेस फोटो ग्राफर कहे जा सकते हैं इसके बाद बैकुण्ठ तिवारी, मो. अकरम, विनोद यादव, वीरेन्द्र तिवारी, मोहम्मद हनीफ, रतन नाग, अशरफ अली बाबा आदि प्रेस फोटोग्राफी में सक्रिय है और अब तो सहारा समय मध्यप्रदेश तथा आई.टी.वी. मध्य प्रदेश के प्रतिनिधि और प्रेस फोटोग्राफर भी सक्रिय हैं। इस नगर की एक श्रेष्ठ साहित्यिक परंपरा रही है जो नई गढी के जागीरदार कवि गोपालशरण सिंह से प्रारंभ होकर वी.पी. श्रीखण्डे, भैरो प्रसाद मिश्र, रामसिया, लखन प्रताप सिंह, राजीवलोचन अग्निहोत्राी, भगवानदास, सपडया, बाबू वरदाचरण, रामाश्रय पयाबी ’रत्नकंाठ‘ सीताराम नेपाली से लेकर डॉ. कमला प्रसाद जो वर्तमान में राष्ट्रीय प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव हैं और सतना नगर के साहित्यकारों पर जिनका अप्रत्यक्ष प्रभाव देखा जा सकता है, नवगीतकार अनूप अशेष एवं हरीश निगम, कहानी लेखिका सुषमा मुनीन्द्र, कवि एवं कथाकार देवीशरण ग्रामीण बघेली कविता के सशक्त हस्ताक्षर बाबूलाल दाहिया, हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष कवि रामनारायण सिंह राना, गीतकार डॉ. सुमेर सिंह शैलेष एवं डॉ. सत्येन्द्र शर्मा, लेखक जो इन दिनों फिल्मी लेखन में व्यस्त हैं, प्रहलाद अग्रवाल कवि एवं प्रखर वक्ता, हनुमंत किशोर शर्मा व्यंगकार प्रदीप मिश्र, कवि विनोद पयासी, कवि संजय गुप्त लेखक ऋषिवंश, विष्णुस्वरूप श्रीवास्तव, मोहन लाल रैकवार तथा इन पंक्तियों के लेखक तक आती हैं। डॉ. कमला प्रसाद पाण्डेय के प्रयासों से म.प्र. प्रगतिशील लेखक संघ के दो सम्मेलन सफलता पूर्वक सम्पन्न हो चुके हैं। जिनमें हरिशंकर परसाई, नागार्जुन, डॉ. शिवमंगल सिंह सुमन, ज्ञानरंजन, विश्वनाथ प्रसाद त्रिापाठी, राजेश जोशी, डॉ. मधुमास चंद्र जैसे प्रसिद्ध साहित्यकारों ने भाग लिया। इसके अलावा सतना में प्रलेस की गतिविधियां लगातार चलती रहती ह। और यहां संगठन स्तर पर सक्रियता दिखाई देती है वर्तमान में सम्भागीय प्रलेस के अध्यक्ष संतोष खरे हैं। समय-समय पर कवि सम्मेलन और मुशायरे होते रहते हैं जिनमें देश के प्रसिद्ध कवि और शायर भाग लेते हैं स्थानीय कवियों में स्व. रामगोपाल शर्मा रत्नेश, गौरीशंकर पथिक, विमल अहिल्यापन, डॉ. परमलाल गुप्ता, शालिगराम शर्मा, भू देव शर्मा, आग्नेय शाडिल्य, डॉ. राजेन्द्र चौरसिया, प्रकाश सिंह, रामशैल गर्ग, छोटे लाल पाण्डेय, रामयश बागरी, हरिहर प्रसाद तिवारी, गोरखनाथ अग्रवाल, रमेश प्रताप ंसह, राजीव खरे, रविशंकर चतुर्वेदी, डॉ. बांकेबिहारी चतुर्वेदी, मोहनलाल वर्मा मुकुट, अनिल श्रीवास्तव आदि प्रमुख हैं जो विभिन्न विधाओं में लेखन कार्य में सम्पन्न है। नाटक के क्षेत्रा में शुरू में शिव मिश्रा, अशोक मिश्रा, तपन मुखर्जी, नरेश जैसवाल, अजय जैन आदि सक्रिय रहे। और कुछ समय इन्होंने अपनी नाट्य संस्था के माध्यम से अच्छे नाटक प्रस्तुत किये। इप्टा के शशिधर मिश्रा, सुनील विश्वकर्मा, हरि चौरसिया, सुनील मिश्र, पुष्पेन्द्र श्रीवास्तव, मनोरमा त्रिापाठी आदि सक्रिय है जो समय-समय पर प्रगतिशील नाटकों का मंचन करते रहते है। यूं तो सतना में संस्कार भारती जैसी संस्थायें भी है किन्तु इनके द्वारा कोई विशेष साहित्यिक अवदान इस शहर को नहीं दिया गया संगीत के स्तर पर मैहर के अलाउद्दीन खां को छोड दिया जाये तो सतना में यद्यपि संगीत भारती, गीतम, संगीत समाज स्वरांगन संस्थायें कार्यरत हैं जो कभी-कभी संगीत के कार्यक्रम आयोजित करती हैं किन्तु गीतम को छोडकर अन्य कोई संस्था अधिक सक्रिय नहीं है। इन संस्थाओं के द्वारा अभी तक अब्दुल हलीम जाफर, पं. शान्ता प्रसाद, वागेश्वरी देवी, उस्ताद जाकिर हुसैन, मधुमिता सारंग, राजन साजन मिश्र आदि को बुलाया जा चुका है। वर्ष १९८८ में रामानन्द सागर, मन्ना डे, रवीन्द्र जैन, कविता कृष्णमूर्ति और फिल्म अभिनेत्राी टुनटुन भी आ चुकी है। समय-समय पर जादूगर आनंद, सरकार और राणा भी यहां अपना प्रदर्शन कर चुके हैं किन्तु ऐसे प्रदर्शन अब अपवाद स्वरूप ही रह गये हैं। म.प्र. साहित्य अकादमी के द्वारा संचालित पाठक मंच की मासिक गोष्ठियां नियमित रूप से संचालित होती है। जिनमें प्रत्येक गोष्ठी में लगभग बीस से पच्चीस साहित्यकार भाग लेते हैं और भेजी गई पुस्तकों पर अपनी बेबाक राय प्रस्तुत करते हैं। इन गोष्ठियों के संदर्भ में यह लिखना असंगत नही होगा कि इनमें स्नातक या स्नात्कोत्तर महाविद्यालयों के हिन्दी अथवा अन्य विषयों के प्राध्यापक शामिल होना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं किन्तु इनकी अनुपस्थिति में भी पाठक मंच की गोष्ठियां नियमित एवं सुचारू ढंग से संचालित हो रही हैं और इस पाठक मंच के उद्देश्यों को पूरा कर रही हैं। यहां के पाठक मंच ने यदा-कदा समीक्षित पुस्तकों के लेखकों को गोष्ठीयों में बुला कर उनकी उपस्थिति में आयोजित की हैं। गोविन्द मिश्र (हुजूर दरबार) कमलेश्वर (कितने पाकिस्तान) ऐसी ही गोष्ठियों में सम्मिलित हो चुके हैं। इनके अलावा विशिष्ट अतिथि के रूप में ज्ञान रंजन, अमर गोस्वामी, सुबोध कुमार श्रीवास्तव, महावीर अग्रवाल, डॉ. सेवाराम त्रिापाठी, सुषमा मुनीद्र आदि शामिल हुऐ हैं। साहित्य एकादमी के निदेशक डॉ. देवेन्द्र दीपक ने चित्राकूट में पाठक मंच की कार्यशाला आयोजित की थी जिसमें पूरे प्रदेश के पाठक मंचों के संयोजक सम्मिलित हुऐ थे और इस कार्यशाला में डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिाय, गोविन्द मिश्र, डॉ. श्रीराम परिहार आदि साहित्यकार उपस्थित हुऐ थे साहित्य एकादमी के द्वारा मैहर में सोमदत्त पर तथा सतना में सुभद्रा कुमारी चौहान पर विशेष आयोजन किये इन आयोजनों में सतना और बाहर के साहित्यकारों ने बडी संख्या में भाग लिया था। म.प्र. की साहित्य अकादमी ने इस तरह के आयोजनों के माध्यम से अच्छा साहित्यिक वातावरण बनाया है। सतना नगर के साहित्यिक माहौल की स्थिति कुछ इस प्रकार की है कि अन्य स्थानों की तरह यहां के साहित्यकार भी विभिन्न गुटों में बंटे हुये हैं और एक गुट के आयोजनों में बुलाये जाने पर भी शामिल नहीं होता। पीठ पीछे निन्दा और सामने पडने पर प्रशंसा यहां के गुटबाजों की प्रवृत्ति बन चुकी है। कवि सम्मेलनों में अपनी गिनी चुनी दस पांच कविताओं को कवि सम्मेलनीय कवि वर्षों से पढ रहे हैं और इसी में अपने कवि होने की सार्थकता अनुभव करते हैं। कवि सम्मेलन वाले कवि गोष्ठियों वाले लेखकों से तालमेल नहीं बैठा पाते। इसी तरह अखबारों और पत्रा-पत्रिाकाओं में प्रकाशित होने वाले लेखक या कवि गोष्ठियों या कवि सम्मेलनीय कवियों से तालमेल नहीं बैठा पाते। इन्हीं विसंगतियों के बीच सतना का साहित्यिक माहौल बनता बिगडता रहता है यहां के व्यंग्य लेखक प्रदीप मिश्र ने एक दैनिक समाचार पत्रा में इस संबंध में लिखते हुये एक महत्वपूर्ण बात कहीं थी कि जब साहित्यिक आयोजनों/ गोष्ठियों की लंबी रपट अखबारों में छपती है तो उन्हें तपती दोपहरी में शीलतवृक्ष की छाया प्राप्त होने का आभास होता है। जो पूरे अखबार में चोरी, डकैती, तस्करी, बलात्कार, ढोंग पाखण्ड जैसे समाचारों के बीच साहित्यकारों के द्वारा कही गई सार्थक बातों के रूप में दिखाई देता है। इन सबके बावजूद सतना के साहित्यिक वातावरण को निराशाजनक नहीं कहा जा सकता। ७, राजेन्द्र नगर, सतना (म.प्र.)
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