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Vartmaan Sahitya ::February, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner दो गजल
शहरयार
१.
दुश्मन-दोस्त सभी कहते हैं, बदला नहीं हूं मैं। तुझसे बिछड के क्यों लगता है, तनहा नहीं हूं मैं। उम्र-सफश्र में कब सोचा था, मोड ये आयेगा। दरिया पार खडा हूं गरचे प्यासा नहीं हूं मैं। पहले बहुत नादिम१ था लेकिन आज बहुत खुश हूं। दुनिया-राय थी अब तक जैसी वैसा नहीं हूं मैं। तेरा लासानी२ होना तस्लीम किया जाए। जिसको देखो ये कहता है तुझसा नहीं हूं मैं। ख्वाबतही३ कुछ लोग यहां पहले भी आये थे। नींद-सराय तेरा मुसाफिश्र पहला नहीं हूं मैं।
२.
(पाकिस्तान के प्रसिद्ध उर्दू शायर मुनीर नियाजषी की मौत पर) ऐ शहर-ए-सुख्ान! तुझ होने की जो एक निशानी बाकशी थी आवाजष्-ए-मुनीर थी, सुन वो भी एक लम्बी चुप की नज्र हुई ऐ शहर-ए-सुख्ान। तुझसे मेरा क्या अब भी कोई रिश्ता है! इस लम्बी चुप से आगे भी कोई जादा४ है, कोई रस्ता है!
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