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Vartmaan Sahitya ::February, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner अरुण काले की कविताएं रूपांतर ः
ओमप्रकाश वाल्मीकि
टंगी हुई वास्तविकता के संबंध में शहर का संतुलन बिगड जाता है कभी भी नामर्दी को भी चढता है युद्ध ज्वर सिर वाले, घुटनों वाले भेडयों घूमने लगते हैं आग के खेत में पेट की होती है एक तीसरी दुनिया और यही होती है युद्ध भूमि विज्ञान को लग जाती है धुन यंत्रा बनते हैं नौकर शून्य प्रहर में रखे जाते हैं कल सुबह किये जाने वाले कार्य जैसे ही दुनिया सिमट गर आयी पास-पास वैसे ही युद्ध भूमि पहुंच गयी दरवाजे तक दुम दबाके भाग गया मौसम गायब हुआ आकाश डेढ पैसे के राज में कौडयों के भी बढ जाते हैं दाम और बिगड जाता है संतुलन शहर का किसी भी वक्त....। स गैंगवार गिरोह ः युद्ध पिपासुओं की मलनिस्सारण की मार्गिका गिरोह ः अरोग्य पर सतत् आक्रमण पैर से बूट या बूट में पैर गिरोह ः विषमता के आहिम वैर और प्रतिरोध का संवाहक गिरोह ः समाज-संस्कृति-टोलियां शिथिल क्षम तटस्थ नपुंसकता खुली मारधाड के अनुकूल तत्व गिरोह ः आदमी के इतिहास का पुनर्लेखन करने का धागा शांति की गाय के लटकते थन प्रसूति वेदना का नहीं नामो निशान गिरोह ः एक रिमोट कन्ट्रोल शैतानों के हाथों में शहरों की पीठ पर बैठा हुआ डर की नोंक चुभाकर झुण्ड हांकने वाला। स ....और बुद्ध का हंसना अपने छोटे बेटे को मैं कल एक शवयात्राा में ले गया ताजे फूलों से सजी लाश देखकर वह खुश हुआ रास्ते में एक सुन्दर बूढे ने कमजोर सा हैलो कहा लडका बहुत खुश हुआ आगे एक मधुर खुशबू वाला कोढी मिला टूंडे हाथ से उसने सलाम किया लडके ने भी उसे सलाम किया लाश, बूढा और कोढी देखकर दुःखी हुआ था सिद्धार्थ मेरा बेटा खुश हुआ उसे अकालिक बुद्धत्व प्राप्त नहीं होगा, क्योंकि, हजषरों बुद्ध यहां व्यर्थ हो गये हजषरों बुद्ध नौकरी के विषय हुए हजषरों वर्षों से बुद्ध विरोधी युद्ध के धमाके हो रहे हैं। अणु-परमाणु भटक रहे हैं जन्म-मृत्यू के ट्रैफिक में पीढयों की मेहनत से बनी यह संस्कृति अब कभी भी नष्ट हो सकती है महात्मा बुद्ध, गांधी और सरहद गांधी हंसे थे या रोये थे, कौन देखेगा? अब यहां नया कोई बुद्ध व्यर्थ नहीं जायेगा मेरा बेटा खुश हुआ मैं निश्चिंत हो गया हूं। सी-५/२, आर्डनैंस फैक्टरी इस्टेट देहरादून-२४८००८
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