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Vartmaan Sahitya ::February, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner नाल
प्रताप राव कदम
श्रम से डरता है अपशकुन लोहार ने तपाया लोह टुकडा लालचट आकार दिया उसे फिर मिट्टी के चूल्हे सा तारकोल की सडक पर घोडे के पैर में यों चमकता यह टुकडा जैसे पसीना चमकता है भाल पर डरता है अपशकुन इस चमक से ठोकी जाती यह जो दरवज्जे बीच बिदकता शनि इससे करता दूर से सलाम हिनहिनाता है घोडा फडकती लोहार हाथ मछलियां श्रम से बिदकते मुए ये सब वरना इस लोह टुकडे में धरा क्या है। नर्स सफेद झक कपडों में कबूतर-सी फुदकती तुम क्या संदेश फैलाती हो पराये दर्द की रेखा झांकती है तुम्हारे चेहरे से विधवा आशंका निपूता अहसास असामयिक मौत से निरन्तर जूझते तुम थकती नहीं हो कैसे पहुंच जाती हो दर्द हांक लगाये पेश्तर उसे सहलाने पता है तुम्हें इस अस्पताल की चारदीवारी से बाहर दुनिया भी है एक और बीमार। ११, शकुन नगर, प्रफेसर कॉलोनी, खण्डवा (म.प्र.)
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