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Vartmaan Sahitya ::February, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner परमिंदरजीत की कविताएं अनुवाद ः
अनूप सेठी
नज्म का मुकद्दर है क्यों समय की आंख पथराई हुई क्यों सुना रही हैं हवाएं शोक की दास्तान यह कैसा जला हुआ है धरती की देह का लहू यह कैसा है आसमानों में सुलगता विलाप जैसा यह कौन चाहता है कि जलते न रहें रोशन चिराग यह किसने लिखी है जिंदगी के कोरे सफे पर अंधी आंख जैसी इबारत यह किस ने डुबो दी है ठंडे आंसुओं में मासूम चेहरों की जगमगाहट यह किसने तोड दी है सच से दिखते सपनों की ख्वाबगाह भरी जिंदगी ने गगन जैसी यह कैसी आह क्यों हैं गीत जलावतन हुए-क्यों हैं बांसुरी खामोश अंधा हुआ चांदनी की बातें करता आसमान देखते देखते हो गए कई उमरों के नुकसान यह कौन देस जाता है जख्मी सुरों का काफिला यह किसने मिटा दिया है महक और कफन के बीच का फासला यह किस उमर का है सोच का मर्सिया यह लोरियों के मौसम क्यों अचानक हो गए हैं लापता मेरी नज्ष्म को फिर से वो मौसम लौटा दो जब लोरी मां के बदन से न हो जुदा जब कोई बांसुरी न मनाए अपने गीत का मातम जब कोई कोख अपने दर्द से वंचित न रहे मेरी नज्ष्म आज अपना मुकद्दर मांगती है मेरी नज्ष्म मरे पास बैठने से झिझकती है। गीत सांवले सलोने पंछी तू जाना मत उस देस आग के बोल जहां बरस रहे तेरा सांसों जैसा वेश सांवले सलोने पंछी कब्रों में जा के रह न रातों को भर हुंकारा न भोर को कुछ कह सांवले सलोने पंछी तेरी आहें मेरा भोज तेरी सब राहें सुलगातीं तेरे साथ हो चलता शोक संावले सलोने पंछी अब उतरेगा किस खेत कभी मोती तेरा नसीब थे अब चुगनी पड गई रेत सांवले सलोने पंछी तेरी घायल हुई उडान तेरे वास्ते धरती मकबरा और सुलग रहा असमान सांवले सलोने पंछी लेकर दांत तले तू जीभ अब किस राह से जाएगा हर रस्ता बेतरतीब संावले सलोने पंछी अब कौन सुने तेरे बोल सोच के भरम में अपने तिडके अंग खंगाल सांवले सलोने पंछी यह कैसी बही हवा तेरे जख्मों के हर दोष की हो गई संगीन गवाह। गीत का नसीब गीत मेरे का यही नसीब क्या जीना क्या मरना। जो लहू के रंग सरीखी उसी दिन में तिरनाड्ड पहले तो हम पर धआ लिपटा फिर वक्त ने दिया गला। जिस भी रुत को जीना समझा उसने दिया झुला। हम न जिएंगे विधान पराए अपनी तपन निवाहेंगे। जो ऋतु तोडे अंग हमारे क्या उसका साथ निभाएंगेड्ड ख्वाब सफर का पैर में हंसता वक्तों ने बोल पहचाने। हमारे ही घर का दरवाजा पर हमें नहीं पहचानेड्ड मैं नहीं अब नज्ष्में लिखता, नज्ष्मों का विलाप लिखूं। वक्त ने हमारे सिर जो मढा, वही सुर्ख श्राप लिखूंड्ड कुछ शाहों की झोली में, कुछ दंगे कत्ल अंगारों में। धीरे-धीरे बीत रही है, रोज उमर अखबारों मेंड्ड परमिंदरजीत सुखन ग्राफिक्स, चौक हुसैनापुरा, अमृतसर-१ अनुवाद ः अनूप सेठी २/बी.-८०२ जी ई लिंक्स, राम मंदिर रोड, गोरेगांव (प.), मुंबई-४००१०४
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