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19 July 2008
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अम्मा
सूरजपाल चौहान

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इस जगत् में जो सबसे प्यारा है वह है मां। अपनी मां को कौन प्यार नहीं करता? मैं भी अपनी मां को बहुत प्यार करता था। मैं उसे अम्मा कहकर पुकारता था। बहुत दिनों से मन में विचार आ-जा रहे थे कि अम्मा के बारे में कुछ लिखूं। हरेक बार यह सोचकर कि उस सीधी-साधी, भोली और गांव की अनपढ के बारे में आखिर क्या लिखूं? बस, यही सोचकर हर बार कलम उठाकर अलग रख देता। लेकिन आज सोच ही लिया कि उसकी कहानी लिख ही डालूं। मेरी उम्र होगी उस समय दस-बारह वर्ष की। हमारा पूरा परिवार गांव में ही रहता था। हमारे पास दस-पन्द्रह भेड-बकरियां, दो भैंस और एक गाय थी। पिता और अम्मा ही उनकी देखभाल करते थे। हां, कभी-कभी मैं भी हाथ में खुरपी थामें अम्मा के साथ घास जुटाने चला जाता। हमारे मोहल्ले के दूसरे घरों के अधिकतर बडे लोग कलकत्ता (आज का कोलकाता) में नौकरी करते थे। उनके ठाट-बाट देखकर पिता के मन में शहर जाकर नौकरी करने का खयाल बार-बार आता। लेकिन उन्हें अपने पिता यानी मेरे दादाजी का बडा भारी भय था। दादाजी गांव छोडकर दूर शहर जाकर नौकरी करना बुरी बात समझते थे। वैसे ही जैसे वर्षों पहले हमारे देश के लोग समन्दर पार विदेश जाना पाप समझते थे। उन दिनों मोहल्ले के चैनूराम कोलकाता से गांव आए हुए थे। वह मेरे पिता के रिश्ते में चाचा लगते थे। एक दिन उन्होंने पिता से कहा-’’सगरे (सारा) जीवन भेड-बकरियां चरावे में बीत जायेगौ, या काम ते छुटकारौ पानो चाहतु (चाहता) है तो मेरे संग कलकत्ता चलो चल।‘‘ पिता जी ने दादाजी को बिना बताये चैनूराम के साथ कलकत्ता जाने की बात तय कर ली। दूसरी ओर दादाजी के डर से चैनूराम उन्हें अपने साथ ले जाने को तैयार न थे। यदि दादाजी को तनिक भी भान हो जाता तो वह चैनू का जीवन हराम कर देते। पिता के मन म कई दिनों तक उथल-पुथल मची रही। आखिर चैनूराम के साथ तय हुआ कि जंगल में भेड-बकरियां छोडकर वह उनके साथ अलीगढ से ट्रेन पकड कर कलकत्ता चलेंगे। पिता ने एक दिना ऐसा ही किया। घर में किसी को बिना बताए और भेड-बकरियां जंगल में चरती छोडकर वह सडक-सडक अलीगढ की ओर चल पडे। चैनूराम ने पिता का बहुत देर तक मुख्य सडक पर इंतजार किया। लेकिन जब पिता को वहां पहुंचने में देर हो गई तो वह अलीगढ वाली बस पकड कर चले गए। पिता ने उस समय सोचा कि उनके चाचा अलीगढ में इंतजार कर रहे होंगे। बस, यही सोचकर वह सडक-सडक अलीगढ की ओर चल दिए। जेब में इतने पैसे न थे कि बस पकड कर अलीगढ पहुंच जाएं। पिता ने अलीगढ तो दूर गांव की मुख्य सडक ही पहली बार देखी थी। वह सडक को देखकर हैरान थे। इतना लम्बा रास्ता और वह भी एकसर। वह अपनी धुन में लगातार आगे बढते जा रहे थे। उन्हें इतना भी ज्ञात न था कि गांव व अलीगढ की दूरी लगभग चालीस किलोमीटर है और उनके चाचा अलीगढ से कलकत्ता की ट्रेन पकड कर कब के जा चुके होंगे। सीधे-साधे ग्रामीण पिता अभी अलीगढ की ओर चले जा रहे थे। वह अब पनेठी तक आ पहुंचे। वहां से भी अलीगढ लगभग पांच किलोमीटर है। किसी से पूछा तो पता चला कि बस अब पास ही है। उनके कदम और शीघ्रता से आगे को पडने लगे। छर्रा-अड्डे के रेलवे फाटक पर पहुंचकर उन्होंने चैन की सांस ली। अब वह रेल की पटरियां देखकर भौंचक होकर रह गए। खडे-खडे सोचने लगे कि यह क्या बला है? किसी से पूछने पर चता चला कि ये रेल की पटरयिां हैं और इन पटरियों पर रेलगाडी चलती है। उस समय रेलवे फाटक बंद था और उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था। एक पल उन्होंने सोचा-’’रेलगाडी बैलगाडी की तरह ही होगी...., लेकिन इन पटरियों पर वह कैसे चलती होगी?‘‘ पिता यह सब सोच ही रहे थे कि इतने में अलीगढ रेलवे-स्टेशन की ओर से तीव्र गति से विशालकाय रेल-इंजन दैत्य की तरह रेल की पटरी पर दौडा आया। पिता उसे देखकर बुरी तरह डर गए थे। इंजन की तेज आवाज और उसके सीधे दनदनाते हुए चले आने से पिता को लगा कि वह उनकी ही ओर दौडा आ रहा है। उस समय उन्हें कुछ नहीं सूझा। पिता अब सिर पर पैर रखकर उल्टे भागे। भागते हुए उनकी पनही (जूते) पैरों से निकल गईं। उन्होंने पीछे मुडकर एक बार भी न देखा। पांच किलोमीटर लगातार भागने पर पनेठी आकर ही दम लिया। डर और थकावट के मारे उनका बुरा हाल था। उनकी कंफपी छूट गयी थी। मुंह से बोल नहीं निकल रहे थे। वहां इकट्ठे लोगों ने उन्हें तसल्ली देते हुए कहा कि घबराने की कोई बात नहीं है, वह इंजन यहां नहीं आएगा। थोडी देर सांस लेने के बाद और मिठाई की दुकान से एक आने की जलेबी साथ लेकर अब पिता ने गांव की राह पकडी। (मैं कहानी तो अम्मा की लिखने बैठा था, लेकिन लिखने बैठ गया पिता की, भटक गया ना पिता के किश्स्से को लेकर)। हां मैं बात कर रहा था अपनी अम्मा के बारे में। उन दिनों गांव की पाठशाला में मेरा जाना शुरू ही हुआ था। अम्मा मुझे पाठशाला जाने से हमेशा रोकती। इस बात को लेकर मेरे पिता और दादाजी उससे नाराज ही रहते। अम्मा को दादाजी डपटते हुए कहते-’’सुखदेई, तू जा छोराए नायं पढन देई, देा हरफ सीख जायेगौ तो जाई के काम आयेंगे।‘‘ लेकिन अम्मा को न जाने कहां से सच्ची बात पता चल गई थी कि गांव की पाठशाला में सवर्ण अध्यापक भंगी-चमारों के बच्चों को स्कूल में दूर बैठाते हैं और उनको बे-वजह पीटते रहते हैं। बस, फिर क्या था-वह एक ही रट लगाए रखतीं-’’मैं नाय भेजत पढवे कूं, कढी खाओ मास्टरू, बिना बात मातुए (मारता) है मेरे छोरा कूं।‘‘ पिता अम्मा को चुप करते हुए कहते-’’हमारो बालक मास्टन्नु (मास्टरों) की लात-घूंसा खाये के पढ-लिख जायेगौ, तोऊ (फिर भी) बाको कुछ भलो है जायेगौ।‘‘ मां पिता की बातें सुनकर चुप हो जाती और मेरा फिर से पाठशाला जाना शुरू हो जाता। कुछ महीने ही बीते होंगे कि मेरे दादाजी को एक दिन तेज बुखार आया और बुखार में ही वह चल बसे। अब पिता से कोई कहने-सुनने वाला नहीं रहा। इस बार चैनूराम जब गांव आए तो पिता उनके साथ कलकत्ता नौकरी करने चले गए। घर का सारा काम अम्मा के कंधों पर आ पडा। मैं बडे मजे में अम्मा के साथ जंगल में भेड-बकरियां चराता फिरता। पिता साल-भर बाद घर आए। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि मने स्कूल जाना छोड दिया है तो वह अम्मा पर बहुत बिगडे। अम्मा ने पिता को सफाई देते और मेरा पक्ष लेते हुए कहा कि छोरा सारे दिन गाय, भैंस, भेड-बकरियों की देखभाल करता है और घर के छोटे-मोटे काम भी करता है। पिता अम्मा की बातें सुनकर आग-बबूला हो गए थे। उन्होंने गुस्से में आकर सारी भेड-बकरियों को गांव के गडरियों को बेच दीं। अम्मा को हिदायत देते हुए बोले-’’छोरा कूं स्कूल भेज, कछु पढ-लिख जावेगो...., और तू भी अब घर में रह।‘‘ पिता ने भेड-बकरियां क्या बेचीं जैसे अम्मा का सब कुछ लुट गया। वह कई दिनों तक रोती रही और पिता को जी भरकर कोसती भी रही। पिता मुझे दोबारा गांव की पाठशाला में भर्ती करवा कर कलकत्ता चले गए। मैं जब भी स्कूल से झोला लटकाए घर लौटता, अम्मा घर में न होती। मैं उसे इधर-उधर खोजता। मोहल्ले के दूसरे लोगों से पता-चलता कि पेड के नीचे दूर खेत में बैठी है। मैं दौडा-दौडा जाता और पास जाकर उससे पूछता-’’अम्मा, यहां बैठी क्या कर रही है, चल घर चल।‘‘ आस-पास दूसरे लोगों के पशुओं को चरते देख हाथ उठाकर भोले मुख से वह कहती-’’लल्ला देख, जे सब हमारी हैं...., खेतन में चरतीं कितनी अच्छी लग रही हैं।‘‘ मैं उसे समझाता-’’जे हमारी नायं, दूसरन की हैं।‘‘ लेकिन अम्मा मेरी बात मानने को तैयार न होती और मुझे अनर्गल बकती। उसकी बातें सुनकर मैं झुंझलाकर रह जाता और सोचता-’’अम्मा पागल हो गई है।‘‘ कई बार अम्मा गडरिये को बेची गईं भेड-बकरियों को हांक कर घर ले आती और अपने आंगन में उन्हें खूंटों से बांध देती। मोहल्ले के सभी उसकी हरकतों से परेशान थे। पिता को तार देकर गांव बुलाया गया। पिता भी अम्मा के क्रियाकलापों से परेशान हो उठे। आखिर उन्होंने मुझे और अम्मा को अपने साथ कलकत्ता ले जाने का निर्णय लिया। अम्मा पिता के निर्णय से खुश न थी। उसने पिता से साफ-साफ का-’’मैं नायं जाऊंगी गाम छोडके परदेश में मरवे कूं...., मैं तो गाम में ही रहूंगी।‘‘ पिता की जिष्द के सामने अम्मा की एक न चली। गांव की मुख्य सडक से अलीगढ तक की बस यात्राा में अम्मा एक अजनबी ही बनी रही। वह पूरे रास्ते बस में आंखें-मीच कर ही बैठी रहीं। हर दो मिनट बाद खिडकी से सिर निकाल कर उबकती। अलीगढ आते-आते उसकी हालत बहुत बिगड गई थी। लगातार उबकते रहने से वह पस्त हो गई। बार-बार पिता पर चिल्लाकर पडती-’’अरे घूमनी आय रही हैं, मोय बचाओ।‘‘ ’’चुप है जा, कछु नाय होयगौ, पागलिया कहीं की...., काहे कूं हल्ला मचाय रही है?‘‘ पिता उसे डपटते हुए कहते। अम्मा बार-बार निढाल हो जाती और बडबडाती-’’अब न बचऊंगी।‘‘ मैं ही उसे संभाले हुए था। गिलास से उसके मुंह में पानी डालता। पानी की बूंदें गले में जाने से उसे कुछ राहत मिलती। ऐसा ही हाल उसका ट्रेन में था। पूरे रास्ते उसने न कुछ खाया और न पिया। बस, आंखें मूंदे ऊपर वाली सीट पर औंधे मुंह पडी रही। कलकत्ता पहुंच कर भी उसकी हालत ऐसी ही बनी रही। कई दिनों तक वह मुझसे कहती रही-’’लल्ला, मोय अबहू घूमनी आय रई है।‘‘ अम्मा दस-बारह रोजष् में सहज हो पाई। घर में छत पर लटके पंखे को वह तुरंत बंद कर देती। रात को वह न तो पिता को और न ही मुझे पंखे के हवा के नीचे सोने देती। पंखे को चलते देख वह घबराती और चिल्लाती-’’अरे जाये बंद करौ, टूट के गिर परेगौ ऊपर...., कोऊ जिंदो नां बचेगौ।‘‘ अम्मा घर में बनी लैट्रिन में शौच करने न जाती। वह रिरियाते हुए मुझसे कहती-’’बेटा, जाके भीतर मैं घुस गई और चटकनी लग लई, अन्दर मोय कछु है गयौ तो दरबज्जौ कौ खोलेगौ...., मैं तो भीतर ही मरी धरी रहूंगी।‘‘ माथा पीटते हुए वह पिता से भी कहती-’’अरे सत्यानासी, जा घर में रहो...., वहीं हंगो, मै जान दे दूंगी पर ऐसौ हरगिज नायं करूंगी।‘‘ पिता अम्मा को लेकर बहुत परेशान थे। वह गुस्से में आकर कहते-’’अच्छौ आयौ पगलिया कूं ले आयौ संग, याने तो जीनो ही मुश्किल कर दीनौ।‘‘ आखिर पिता को ही अंधेरे-अंधेरे में अम्मा के साथ हाथ में पानी का डिब्बा लिए पास की झाडयों में जाना पडता। ऐसा कब तक चलता, पिता नौकरी करते या मेरी भोली अम्मा का ध्यान रखते। अम्मा जितने दिन कलकत्ता में रहीं, गुसलखाने में कभी नहीं नहायीं। वह घर के अन्दर बाल्टी भर कर कर पानी रख लेतीं और चारों ओर चारपाईयां खडी करके उनकी ओट में नहाती। उसका गुसलखाने में दम घुटता था। एक रोज तो अम्मा ने कमाल कर दिया। घर के सामने पार्क में पानी की पाइप लाईन फट गई थी। नगर निगम के मजदूरों ने वहां ढाई-तीन मीटर गहरा गढ्ढा कर दिया था। पानी पिछले चार रोज से लगातार बह रहा था। पानी के लगातार बहने से मिट्टी निथर कर नीचे बैठ गई थी। पानी इतना साफ-सुथरा नजर आ रहा था कि अम्मा अपने को रोक न सकी। वह किसी की भी चिन्ता न करते हुए उस ओर बढ गई और दोनों हाथों से ओक बनाकर पानी पीए जा रही थी। उसे ऐसा करते देख आसपास खडे लोग मंद-मंद मुस्करा रहे थे। पिता ने टोकते हुए उससे ऐसा न करने को कहा। अम्मा उनकी बात अनसुनी करते हुए बोली-’’किसना के बाप, मोय आज रोको मत, जी भरके पी लैन देऔ...., बहुत दिनन (दिनों) बाद इतनो अच्छौ पानी पीबे कूं मिलौ है।‘‘ देखते ही देखते अम्मा छोटे बालकों की भांति उस बहते पानी में छप-छप करती नहाने लगी। उसके सारे कपडे पानी में सराबोर हो गए थे। पिता उसकी इस हरकत पर मुस्कुरा उठे थे। बनावटी गुस्सा दिखाते हुए वह बोले-’’सुखदेई, जे गाम नायं सहर है, तू तो गाम को बम्बा समझकै नहायबे घुस पडी।‘‘ अम्मा जब भी उचित अवसर देखती वह पिता से गिडगिडाते हुए कहती-’’गाम ले चलो मोय, वहीं छोड आओ...., यहां कछु है गयौ तो मेरी आत्मा भटकत डालैगी।‘‘ अम्मा ने एक रोज मेरे कंधे पर अपना सिर रखते हुए कहा-’’बेटा, मैं यहां मर गई तो अनरथु (अनर्थ) है जायगौ, सुनो है यहां एक मरे के ऊपर दूसरो मरो जरावतें, मैं किन-किन मरे भयेन से कहत फिरूंगी कि मेरो कोई दोस नायं...., मेरौ आदमी गाम ते मोय यहां ले आयौ।‘‘ मैं और पिता अम्मा की बातें सुन-सुनकर तंग आ गए थे। मुश्किल से दो माह भी नहीं हुए कि पिता मुझे साथ लेकर उसे गांव छोडने चले आए। गांव आकर अम्मा बहुत खुश थीं। वह कई दिनों तक छोटे-बडों को घेर कर बैठी रही और उन्हें पुलकित स्वर में शहर के किस्से सुनाती रह। अब उसकी सेहत भी पहले से अच्छी हो गई थी। दस-पन्द्रह दिनों बाद पिता अम्मा को गांव में छोडकर मुझे अपने साथ ले चलने के लिए तैयारी करने लगे तो उसने फिर रोना-पीटना शुरू कर दिया। अम्मा का कहना था कि वह मेरे बिना गांव में नहीं रह पाएगी। लेकिन पिता को मेरी पढाई की चिंता थी। उन्हें पता था कि गांव में रह कर मैं ठीक से पढ नहीं पाऊंगा। पिता अम्मा को कई दिनों तक समझाते रहे। अम्मा जान गई थी कि मेरे पिता अब मानने वाले नहीं हैं। तो उसने अनमने मन से हामी भर दी। जिस दिन पिता मुझे साथ लेकर गांव से चले उस दिन मां मुख्य सडक तक रोती आई। उसके लगातार रोने से मेरा मन भी भर आया और मैं उसके गले से लगकर खूब रोया। मां भर्राये गले से पिता से मेरी ओर देखते हुए बोली-’’अरे जाये इत्ती दूर काहे कूं ले जाय रहे हो, मैं जाकू (इसे) चिल्लायकै भी आवाज दुऊंगी तो मेरी अवाज जाके जोरे (समीप) तकऊ (भी) नायं पहंचैगी।‘‘ अम्मा के अन्तर्मन से निकले इन शब्दों को सुनकर पिता विचलित हो उठे थे और उनकी पलकें भीग गईं थीं।



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