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Vartmaan Sahitya ::February, 2007
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ट्राँसप्लाण्टेशन संजीव ठाकुर
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इस बार फिर दीप्ति की राखी देर से आई। पिछली प्रत्येक बार की तरह एक-दो दिन नहीं, करीब पन्द्रह दिन देर से। उसने पत्रा में लिखा था-’’देर से राखी भेज रही हूं लेकिन उम्मीद है आप मेरी भावना को समझेंगे।‘‘ सच बात तो यह है कि मैंने इस बार उसकी राखी की उम्मीद ही नहीं की थी। पांच साल पहले जब नौकरी के सिलसिले में पटना से पांडिचेरी आ गया था, डाक से पहली बार दीप्ति की राखी आई थी। उसने लिखा था-’’मुझे मम्मी ने बताया है, मैं बहुत छोटी थी तभी से आपको राखी बांध रही हूं। अब मैं कुछ बडी तो हो ही गई हूं, खुद आफा राखी भेजा करूंगी। मम्मी ने बताया है कि एक बार दीवाली में आपने मुझे जलने से भी बचाया है।‘‘ पटना में रहते हुए रक्षाबंधन के दिन बुआ के घर जष्रूर जाया करता था। अपनी बुआ न होते हुए भी इतने बडे शहर में वही अपनी थीं और पर्व-त्योहार के दिन अगर गांव नहीं गया होता तो उन्हीं के यहां जाना नियम-सा बन गया था। महेन्द्रू से साइकिल उठायी, रक्षा-बंधन का दिन रहा तो बीच में यथा सामर्थ्य आधा किलो लड्डू या गुलाब जामुन या बरफी ली और पहुंच जाता था लेकिन खाना कभी नहीं खाता था। कोई न कोई बहाना करके निकल लेता था। पर्व-त्योहार के दिन ही उनके यहां खाता था। शहर में गांव-जवार से आने वाले लोगों से होने वाली परेशानियों से मैं वाकिफश् था और बुआ को और परेशान नहीं करता चाहता था। बुआ भी मेरी इस बात को जानती थीं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से किडनी ने बुआ को परेशान कर रखा था। पांडिचेरी में ही खबर मिली थी कि एकदिन वह बेहोश हो गई थीं। डॉक्टर के पास ले जाने पर कई तरह की शंका जताई गईं और तरह-तरह के टेस्ट के बाद पता चला किडनी फेल्योर। यह किडनी का फेल हो जाना कम्बख्त किसी कैंसर से कम नहीं। इलाज शुरू हुआ। पटना में नहीं हुआ तो दिल्ली। दिल्ली में एक किडनी ट्राॅसप्लांट कर दी गई। बुआ जीने लायक हो गईं। इसी बीच अपने सर्टिफिकेट लाने के सिलसिले में मैं पटना गया तो उनसे मिलने गया। उनके सूजे शरीर को देखकर मैं समझ नहीं सका कि वह ठीक हो रही हैं या....। उन्होंने शायद मेरे हाव-भाव को महसूस कर लिया। उन्होंने बताया-’’दवाई का साइड इफश्ैक्ट है।‘‘ डॉक्टर ने कहा है कुछ दिन में सब नॉर्मल हो जाएगा।‘‘ मैं भी उनको तसल्ली देता रहा-’’हां, अब सब ठीक हो जाएगा।‘‘ लेकिन बुआ कह रही थीं-’’पांच-छः साल वर्ष का भी समय मिल जाए तो दीप्ति की शादी देख लूं।‘‘ बुआ ने मृत्यु को इतने पास से देखा था कि पांच-छः साल वर्ष का जीवन भी उन्हें बहुत बडा लग रहा था। बुआ ने आगामी मृत्यु को भी जैसे स्वीकार कर लिया था। ’’दीप्ति ने चाय-वाय बनाना सीखा या नहीं?‘‘ मैं वातावरण के बोझ को थोडा कम करना चाहता था। ’’हां, हां, अब तो कभी-कभार रोटी भी बना लेती है। अब तो सीखना ही पडेगा इसे?‘‘ दीप्ति चाय बनाने चली गई थी। बुआ मेरा हाल-चाल पूछने लगी थीं-’’नौकरी कैसी चल रही है? शादी कब करोगे? गांव जाते हो या नहीं?.... हरि भैया कैसे हैं? भाभी का पूजा पाठ कम हुआ या नहीं? पहले भी जब गांव से लौटा करता था, बुआ ढेर सारी जिज्ञासाओं के साथ उपस्थित मिलती थीं। उनकेा गांव के समाचार में दिलचस्पी थी। अभी भी....? जब दीप्ति चाय लेकर आ गई तो मैंने कहा-’’दीप्ति। इस बार से राखी की तुम्हारी दक्षिणा बढाकर मैं सौ कर दूंगा। अब नौकरी करने लगा हूं न?‘‘ दस साल पहले से दस रुपये की दक्षिणा देनी जो मैंने शुरू की थी, पटना छोडने के एक साल पहले पंद्रह तक बढी थी-वो भी दीप्ति की फरमाइश पर। बुआ ने ही दीप्ति के हवाले से कहा था-’’अब मैं बडी हो गई हूं, कुछ बढना चाहिए।‘‘ मैंने पांच रुपये की बढोत्तरी की थी। औकात ही नहीं थी तब ज्यादा की। ’’अब जमा रखो। एक मुश्त इसकी शादी में ही दक्षिणा दे देना।‘‘ बुआ ने कहा था। ’’ठीक है, मैं तैयार हूं।‘‘ ’’तैयार हो न?‘‘ ’’हां, बिल्कुल। चिंता मत करो। अब मुझे कोई दिक्कत नहीं है।‘‘ मैं कह गया था। ’’अच्छा भैया। दीवाली के दिन आपने मुझे जलने से कैसे बचाया था?‘‘ दीप्ति शायद अपनी शादी के प्रसंग से झेंप गई थी और बात को दूसरी दिशा में ले जाना चाहती थी। ’’अरे। इस बार मैं गांव नहीं जा पाया था तो तुम्हारे यहां ही आ गया। कुछ नहीं, तुम बालकोनी में चकरी चला रही थीं। मैं बालकोनी में खडा बाहर देख रहा था। अचानक मैंने देखा-तुम्हारी फॉक में आग!.... मैंने तुम्हें चुपचाप बैठी रहने को कहा और हाथ से ही फ्राक को रगडने लगा। फिर पैर लगाया और इस तरह आग बुझ गई।‘‘ ’’लेकिन मम्मी को इनके भैया ने कहां बचाया? दीप्ति का किशोर मन बेझिझक बोल पडा था। मैं समझ गया था कि दीप्ति क्या कहना चाह रही थी? बुआ की बीमारी, इलाज, पैसों और किडनी के इंतजाम की खबरें इधर-उधर से मुझ तक पहुंच ही रही थीं लेकिन मैं पूरी कहानी बुआ की जुबानी सुनना चाह रहा था इसलिए मैंने उन्हें छेड दिया-’’पैसे तो बहुत खर्च हुए होंगे? इंतजाम हो गया था?‘‘ ’’अरे, वो तो समझो तुम्हारे फूफा सरकारी नौकरी में हैं। काफी पैसे मिल गए, नहीं तो दिक्कत आती। वैसे उन्होंने सोच रखा था कि जो प्लॉट खरीद रखा है, बेच देंगे लेकिन उसकी नौबत नहीं आई। लेकिन पैसा ही तो सबसे बडी समस्या नहीं थी न?.... सबसे बडी समस्या थी किडनी की। डॉक्टर ने कहा था, भाई या बहन की किडनी सबसे ज्यादा सूट करती है लेकिन मेरे छः भाई-बहनों में से किसी ने किडनी नहीं दी।‘‘ ’’लेकिन मैंने सुना था कि चाचा लोग दिल्ली गए थे किडनी देने?‘‘ ’’सुनो तो! तुम पूरी कहानी कहां जानते हो? और न कभी जान पाओगे, क्योंकि ये लोग तो तुम्हें अपनी कहानी सुनाएंगे न?‘‘ बुआ ने लंबी संास ली थी और आगे कहा था- ’’असल में हुआ यह था कि मां किडनी देने आई थीं। वो तो समझो, डॉक्टर ने मना कर दिया। कहा कि पहत्तर साल की बूढी की किडनी लगाने से भी कोई फायदा नहीं है। और मां ने यहां आने से पहले ही कहा था कि दिलीप तो सबसे छोटा है उसे मैं किडनी नहीं देने दूंगी। बडे-भैया या बडी दीदी दे दें तो कोई बात नहीं। बडे भैया ने साफश् इनकार कर दिया। कहा-’फिर मेरा घर कौन चलाएगा?‘‘.... अब देखो, पचपन साल की उम्र उनकी। एक किडनी से भी काम चल सकता है शरीर का। हम लोग ढाई लाख देने को भी तैयार थे और यह गारंटी लेने को भी अगर कोई बीमारी होगी तो इलाज भी करवाएंगे। लेकिन नहीं....।‘‘ ’’फिर आए इंजीनियर साहब! उनका तो ब्लडग्रुप ही मैच नहीं किया।‘‘ ’’कहीं ऐसा तो नहीं कि वो ब्लडग्रुप टेस्ट करवा कर ही आए हों? जहां तक मैं उनको जानता हूं, वो ऐसा कर सकते हैं।‘‘ मैंने हंसकर कहा था। ’’क्या पता? बता नहीं सकती।.... फिर बडी दीदी को तैयार किया गया। अस्पताल भी आईं। ब्लडग्रुप मैच कर गया। टिश्यु भी मैच कर गया। लेकिन फिर न जाने क्या हआ? जीजा जी और दीदी में खुसुर-पुसुर हुई और फिर वो मुकर गईं। उन्हें भी हम ढाई लाख देने को तैयार थे।‘‘ ’’फिर खोज शुरू हुई किडनी बेचने वालों की। कई नर्सिंग होम के पते भी मिले। मगर वहां से खरीदी किडनी को सरकारी अस्पताल में नहीं लगवाया जा सकता था। इसके लिए प्राइवेट नर्सिंग होम में ही इलाज करवाना पडता और तब सरकार से मिलने वाले पैसे हमें नहीं मिलते। मान जो जमीन बेचकर पैसों को इंतजाम हो भी जाता लेकिन तभी किडनी बेचने वाले नर्सिंग होम की खबरें अखबारों में आने लगीं थीं। सबने उस समय यह काम बंद कर रखा था। आखिर तय हुआ कि दीप्ति के पापा ही किडनी देंगे। ब्लडग्रुप तो हमारा मिलता ही था, टिश्यु मैचिंग का रिजल्ट भी अच्छा ही था। डॉक्टरों ने कहा किडनी के सूट करने का चांस है। दीप्ति के पापा ने चांस लिया। कोई दूसरा उपाय भी तो नहीं रह गया था?‘‘ ’’ठीक ही तो है? अब क्या चिंता करती हो?‘‘ मैंने मरहम लगाने की कोशिश की। ’’चिंता नहीं है। लेकिन एक तो यह है कि भाई-बहन की किडनी के सूट करने का चांस ज्यादा होता है, दूसरे इस बात से परेशान हूं कि जिन भाई-बहनों को दुलारा, प्यार दिया, उन्हीं ने किडनी देने से इंकार कर दिया।‘‘ बुआ रुआंसी होने लगी थी। ’’मैंने तो अब भाइयों को राखी भेजनी भी बंद कर दी है। और बहनों से...., रुको दिखाती हूं, कितनी भावुक होकर चिट्टठी लिखती हैं बहनें। दीप्ति, ले आओ तो चिट्ठी?‘‘ दीप्ति चिट्ठी लाती है, मैं पढता हूं-असीम शुभकामानाएंं.... ईश्वर से प्रार्थनाएं.... उनके बीच अपनी किडनी न दे पाने की मजबूरी-मोनू की शादी, छोटू की पढाई, इनके पापा की सेवा....!! कहो तो पांच हजार भेज दूं....? मैंने कहा-देखो बुआ, इनकी बातों का बुरा नहीं मानो। शुक्र मनाओ कि फूफा जी की किडनी तुम्हारे शरीर में लगने लायक थी। नहीं तो क्या होता?‘‘ थोडी देर में में विदा लेकर मैं निकल पडा था। मेरे मन में एक सवाल गूंज रहा था, जो मैं बुआ से नहीं कर सका था। करने का यह वक्त ही नहीं था कि ’’बुआ। अगर तुम्हारे किसी भाई या बहन को किडनी की जरूरत होती तो क्या तुम दे देतीं? क्या तुम्हारे पास भी ये सब तर्क नहीं होते? और मान लो तुम देने को तैयार हो भी जातीं तो क्या फूफा जी उस वक्त तुम्हें देने से रोक नहीं देते ....? मैं अपना नंबर बुआ को दे आया था लेकिन वहां से फोन नहीं आता था। मैं ही कभी-कभार कर लिया करता था। उनकी हालत दिनानुदिन सुधर रही थी। एक दिन अचानक बुआ का फोन आया। दीप्ति ने बारहवीं पास कर ली थी और उसका एडमीशन किसी कंस्टीट्युएंट कालेज में नहीं हो पा रहा था। बुआ दुखी थी-’’घर पर बैठकर क्या करेगी? कॉलेज जाती तो थोडा मन बहल जाता। घर में दिन भर बीमारी की बातें, खाना बनाना.... तुम्हारी तो बहुत जान पहचान है यूनिवर्सिटी में। कुछ करो न?‘‘ मैंने अपने कुछ परिचित प्राध्यापकों के फोन नंबर बुआ को लिखवा दिए थे। बिना परेशानी के दीप्ति का एडमीशन हो गया था। धन्यवाद देने के लिए बुआ का फोन आया था-’’तुमने दीप्ति को राखी की दक्षिणा दे दी।‘‘ फिर बहुत दिनों तक कोई फोन नहीं आया। न मैं ही कर सका कि अचानक एक दिन गांव से आए पत्रा ने सदमें में डाल दिया। बुआ चली गई थीं। पचासी वर्ष के दादा जी मौजूद थे, चालीस वर्ष की बुआ चली गई थीं। सतहत्तर वर्ष की दादी मौजूद थीं, बुआ....। मैं फूफाजी और दीप्ति से बात करने की हिम्मत नहीं जुटा सका। ऐसे समय में क्या बात की जाय? कैसे बात की जाय? मैं भीतर ही भीतर घुटता रहा। बुआ को गए तीन-चार महीने ही हुए थे कि रक्षा-बंधन आया था और दीप्ति की राखी पंद्रह दिन विलंब से आई थी। मैं तो उम्मीद भी नहीं कर रहा था....। थोडे समय बाद जब दशहरे की छुट्टी में गांव गया तो अलग तरह के ’सत्य‘ से ही साक्षात्कार हुआ। वैसे यह सत्य नहीं था, बुआ के परिवार वालों के मनगढंत किस्से थे, गलत बयानी थी। कोई कह रहा था, ’’अरे! मेहमाान जी ने अपनी किडनी थोडे ही दी थी? वो तो किसी रिक्शा वाले से खरीद लाए थे।‘‘ ’’और क्या? अपनी किडनी देते तो सूट नहीं करती?‘‘ किसी ’किडनी-विशेषज्ञ‘ ने कहा था। कोई अति गोपनीय जानकारी लेकर आया था कि मेहमान जी ने शादी कर ली है। बात फुस-फुस की परिधि से निकलकर सार्वजनिक हो गई थी और खुलेआम लोग चर्चा करने लगे थे- ’’पहले से ही तय था कि वे शादी करेंगे। ममता को भी मेहमानजी ने बता दिया था। अब देखो, ममता को गए तीन महीने भी नहीं हुए कि....। ’’सी नंबर का बदमाश आदमी है....।‘‘ ’’यह भी नहीं देखा कि बेटी शादी के लायक है।‘‘ मैं इन झूठे लोगों का प्रतिवाद नहीं कर पा रहा था। मुझमें शक्ति ही नहीं थी। बस इतना था कि मैं सच्चाई जानता था। मेरे लिए गांव का वह आदमी भी सरासर झूठा था जिसने ’’मेहमान जी को किसी औरत के साथ ’गांधी-मैदान‘ के पास देख लिया था।‘‘.... अगर फूफा जी ने शादी की होती तो दीप्ति ने मुझे जरूर बताया होता। बस इतनी सी बात पर मैं दावा कर सकता था लेकिन करने का कोई फायदा ही नहीं था। ’’अच्छा, आप लोगों में से कोई किडनी नहीं दे सकता था?‘‘ मैंने बुआ के छोटे भाई-दिलीप चाचा से पूछा था। ’’क्यों नहीं? सब कोई देने को तैयार थे। मां तो गई ही थीं? इंजीनियर भैया भी गए थे। बडी दीदी भी गई थीं। मैं भी देना चाहता था, मगर सबने कहा-’’तुम छोटे हो।.... अरे, मैं, तो चाहता था कि ममता दीदी मेरे लिए तीन-चार लाख का इंतजाम कर देतीं ताकि भविष्य में कुछ हो जाने की स्थिति में मेरे बाल-बच्चे....। अरे, मंझली दीदी तो एक लाख भेजना चाहती थीं लेकिन ममता दीदी ने मना कर दिया। दिलीप चाचा एक पर एक झूठ दागे जा रहे थे। मैं जडवत सुनता जा रहा था। आखिर ये मेरे अपने चाचा भी तो नहीं थे, जिनसे बहस की जा सकती थी, जिन्हें रोका-टोका जा सकता था? बस, मैं इतना सोच रहा था कि अच्छा हुआ बुआ को इन भाई-बहनों की किडनी नहीं लगाई गई थी। इतनी सडी हुई किडनी लगाने से बेहतर था....। मुझे संतोष है तो बस इतना कि दीप्ति का एडमीशन करवा कर बुआ के हृदय का एक बोझ मैंने हल्का कर दिया था। अब अपना दूसरा वचन निभाना है-दीप्ति की शादी में एकमुश्त ’दक्षिणा‘ का। इसके लिए मैं थोडा-थोडा जमा करने लगा हूं।



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