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Vartmaan Sahitya ::February, 2007
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अभी पिछले दिनों विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वाधान में एक राष्ट्रीय सेमीनार का आयोजन हुआ जिसमें विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच सद्भावना और सौहार्द के वातावरण निर्माण की बरास्ता उच्च शिक्षा, योजना पर चर्चा की गयी। विभिन्न सम्प्रदाय और समुदायों के बीच शिक्षा संस्थानों में कैसे समरसता और भाईचारे का माहौल बने, यह सिद्धान्त रूप में सब स्वीकार तो करते हैं लेकिन जष्मीनी तौर पर कैसे व्यवहार में यह लागू हो, संभवतः यह उच्चस्थ, नीति नियामक वर्ग की परिकल्पना में स्पष्ट नहीं है। इसीलिये बात यहीं तक आकर अटक जाती है कि ’हमारे यहां तो हमेशा से हिन्दू मुस्लिम के बीच सद्भाव रहा है....कि सारे धर्म परस्पर भाईचारा और प्रेमभाव सिखाते हैं....कि कहां है भेदभाव? हम सब एक ही तो हैं!.... वगैरह-वगैरह। जबकि सच्चाई है कि भेदभाव है! राजनैतिक परिदृश्य में सब एक मंच पर बैठ सकते हैं लेकिन रोजमर्रा की जिन्दगियों में हमारी मानसिकता में सामाजिक और धार्मिक भेदभाव बहुत गहरे पैठा है। हमारे संस्कारों का हिस्सा बनकर हमारे व्यवहार, सामाजिकता और हमारी बोलचाल और भाषा में दिखाई देता रहता है। विशेष रूप से पिछले दो-तीन दशकों में जब से धर्म को सत्ता तक पहुंचने के लिये एक राजनैतिक एजेन्डे के रूप में शामिल कर लिया गया, तब से यह भेदभाव हमारी सामाजिक मानसिकता में और गहरा हो गया है। जाहिर है कि शिक्षा इस महत्वपूर्ण कार्ययोजना का सबसे आवश्यक अंग है। शिक्षा चाहे घर, समाज के बीच से ग्रहण की जा रही हो या स्कूल, विद्यालय और विश्वविद्यालय में हो, सामाजिक प्रश्नों पर वातावरण निर्माण पहली और अनिवार्य शर्त है। इसलिये इन पर व्यापक चर्चा होनी चाहिये। लेकिन इस कोशिश का पहला दरवाजा आरंभिक शिक्षा से खुलता है जो कदम-दर-कदम हमें उच्च शिक्षा के द्वार तक ले जाता है। विभिन्न समाजों के बीच सद्भाव और सौहार्द सिर्फ धार्मिक ही नहीं बल्कि जातिगत आधार पर भी उतना ही जरूरी है। नौजवानों के सोच, विचार और व्यवहार को एक खास शक्ल देने के लिये प्रायमरी शिक्षा से लेकर हायर सेकेन्ड्री तक की शिक्षा बेहद महत्वपूर्ण होती है। वे राजनीतिक दल जो परस्पर घृणा और सांप्रदायिक एजेण्डा के बलबूते पर अपना अस्तित्व बनाये रखते हैं, वे राजनीतिक तौर पर सत्ता पर तो काबिज हो सकते हैं, शासन की कुर्सी तो पा सकते हैं लेकिन देश को समग्र रूप से विकास के रास्ते पर नहंी ले जा सकते हैं। खास तौर पर आज के भूमंडलीकरण के इस युग में एक बहुत बडे समुदाय को विकास के एजेन्डे से काट देना या उसे सामाजिक और आर्थिक रूप से पंगु कर देना, उस बडे धार्मिक समुदाय के मानव संसाधन से हाथ धोना है, उसकी शारीरिक और मानसिक क्षमताओं को शून्य कर देना है। इसी के साथ देश के एक बडे भू-भाग की प्राकृतिक संपदाओं से भी हाथ धो बैठना है। किसी भी भू-भाग के संसाधनों का पूरा इस्तेमाल उस क्षेत्रा की जनता के सहयोग से ही हो सकता है, उस क्षेत्रा की जनता को विकास का हिस्सा बना कर हो सकता है। उच्च शिक्षा तक आते आते नौजवान लडके-लडकियां एक सीमा तक अपनी मानसिक बुनावट तैयार कर चुके होते ह। उनके सामने अब कैरियर का सवाल होता है। पूरे सामाजिक और पारिवारिक दबावों के चलते वह अपने भविष्य का रास्ता बनाने में जुटे होते हैं। उनके सामने संम्पन्नता और सफलता के अन्तर्राष्ट्रीय मानक होते हैं जो अक्सर उसे चारों ओर के वातावरण और गतिविधियों से काट कर सिर्फ अपने लक्ष्य तक सीमित कर देते हैं। मेडीकल, इंजीनियरिंग, कम्प्यूटर या विशाल इन्फॉरमेशन टैक्नोलॉजी.... ये आधुनिकता और सम्पन्नता की ऐसी चकाचौंध भरी खिडकियां हैं जो उसके सामाजिक दायरे को सीमित कर देती हैं। कुछ हद तक उसे आत्मकेन्दि्रत बना देती हैं। इसीलिये यह कहा जा रहा है कि यह नई वैश्विक व्यवस्था एक ओर तो आदमी को पूरे विश्व समुदाय का हिस्सा बना रही है लेकिन दूसरी ओर उसे बेहद स्वार्थी और आत्मकेन्दि्रत भी बना रही है, उसे बिल्कुल अकेला कर रही है। ऐसी वैश्विक मानसिकता के बीच बढते व्यक्तिवाद के विरुद्ध नौजवानों को सामाजिकता का पाठ पढाने की जरूरत है, उनके व्यापक सामाजिक आदान-प्रदान की जरूरत है। शुद्ध कैरियरवादी नौजवानों का समूह बहुत आसानी से सांप्रदायिक और अलगाव वादी राजनीति करने वालों के हाथों का खिलौना बन जाता है अगर उन्हें लगता है कि इस रास्ते से वह अपने कैरियर का मनचाहा प्राप्त कर सकते हैं। इसीलिये जरूरत है कि विभिन्न समुदायों के लोगों को शिक्षा का अवसर मिले। परस्पर मिल बैठने की आदत बने, आपसी सम्पर्क के ज्यादा से ज्यादा अवसर बने। विभिन्न धार्मिक और जातिगत समूह एक दूसरे के बारे में हों, उनके सामाजिक परिवेश से परिचित हों। परस्पर अजनवीपन दूर करके वे एक ही समाज का हिस्सा लगेंगे। पहली जरूरत विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में प्रवेश नीति की है। हमने अनुसूचित जाति/ जनजाति और पिछडों के लिये शिक्षा के क्षेत्रा में आरक्षण नीति को स्वीकार किया है। इसका स्वर राजनैतिक हो सकता है। इसमें कुछ संशोधन की गुंजाइश हो सकती है। इसमें विशेषकर पिछडा वर्ग की कुछ जातियों को शामिल करने पर विवाद की बात बन सकती है कि उनका समावेश राजनैतिक कारणों से है। अनुसूचित जाति/ जनजाति में क्रीमी लेयर को लेकर बहस की गुंजाइश हो सकती है.... उसके बावजूद यह सच है कि कम से कम अनुसूचित जाति / जनजाति के स्तर पर इसके लागू होने से उनकी स्थिति में बहुत फर्क पडा है। दलित समाज का एक बडा हिस्सा शिक्षित हुआ है। वहां पहली पीढी जब शिक्षित हुई तो उनकी सामाजिक स्थितियों में बहुत बदलाव आया है। आरक्षण और उसके साथ वजीफे के प्रावधान ने दलित समूह के एक बडे भाग को शिक्षा के दरवाजे पर ला खडा किया जहां होश संभालते ही कमाने-खाने की चिन्ता शुरू हो जाती है। कम से कम लडकियों के क्षेत्रा में इस आरक्षण नीति का असर प्रत्यक्ष दिखाई दिया है। हमारा मानना है कि दलित के समान ही मुस्लिमों (या ईसाई या अन्य धर्मावलम्बियों) के पिछडे समाज के लिये भी यह आरक्षण नीति प्रभावी ढंग से लागू की जाय। हाशिये के समाज जो अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते, चाहे वह दलित वर्ग हो या अल्पसंख्यक समाज हो, उसका मुख्य कारण आर्थिक है तथा शिक्षा के लिये सुविधाजनक परिस्थितियों का न होना है। आज की इस नयी बदलती दुनिया में ’’संस्कार‘‘ या ’’चेतना का न होना‘‘ जैसे शब्द ज्यादा कारगर नहीं हैं। मुख्य कारण गरीबी है और शिक्षा ग्रहण करने के लिये जरूरी वातावरण का न होना है, स्कूल में दोस्ताना वातावरण का न होना है। आरक्षण नीति को लागू करने के साथ ही कॉलेजों के वरिष्ठ अध्यापकों/अध्यक्ष/प्राचार्यों को लगातार संवेदनशील बनाया जाना चाहिये। दलित वर्ग और मुस्लिम समाज की लडकियां-लडके जो पहली पीढी के रूप में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं उनके प्रति प्राचार्य और अध्यापक वर्ग सहानुभूति का दृष्टिकेाण अपनाए। जष्रूरत पडने पर उन्हें सलाह मशविरा प्रदान करें जिसकी उनको हमेशा जरूरत रहती है। उन की समस्याओं पर अलग से ध्यान देना जरूरी है। उच्च शिक्षा के क्षेत्रा में भी ऐसा पाठ्यक्रम बनाया जाय, या उसमें शामिल अन्य गतिविधियों को इस तरह बनाया जाय कि उसमें हर छात्रा-छात्राा के लिये कुछ न कुछ करने के लिये जरूर हो। एन.एस.एस./एन.सी.सी./ युवा महोत्सव/ कॉलेजों के सांस्कृतिक कार्यक्रम/ शैक्षिक यात्राा आदि पर जोर देना चाहिये। हस्तकौशल/ कला/ पेंटिंग प्रदर्शनी/ संगीत प्रतियोगिता/ वाद विवाद/ लेखन प्रतियोगिता जैसे कार्यकलापों को अनिवार्य रूप से पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना चाहिये। स्नातक स्तर पर इन्हें पाठ्यक्रमों में शामिल किया जा सकता है। कॉलेजों में उत्सव और समागम जैसे कार्यक्रम कराये जाने चाहिये। हिन्दुस्तान के विभिन्न संप्रदायों का आपस में ज्यादा से ज्यादा समाजीकरण हो, ज्यादा से ज्यादा आपसी व्यवहार में मिलकर उठना बैठना हो, तभी हम अपने उद्देश्य को प्राप्त हो सकते हैं। हमारा अनुभव है कि अभी फिलहाल खेल की दुनिया, कला की दुनिया चाहे वह फिल्म हो, संगीत हो, या दूसरे कलारूप हों, वहां व्यक्ति और उसकी प्रतिभा सर्वोपरि है। अपना लक्ष्य सर्वोपरि है। वहां एक भाईचारा और परस्पर सौहार्द है। एक बिरादरी की भावना है। खेल, संगीत, अभिनय और विविध कलारूप सबको एकसूत्रा में बांधते हैं इसलिये सांस्कृतिक गतिविधियों को ज्यादा से ज्यादा आगे बढाना चाहिए। आज के समय में नयी तरह की धार्मिकतायें सर उठा रही हैं। एक ओर विज्ञान और टैक्नालॉजी नई ऊंचाइयां छू रही है, दूसरी ओर इसी के साथ धार्मिक पाखण्ड और संकीर्णता का विस्तार भी हो रहा है। नौजवान भी इससे अछूता नहीं हैं। अच्छा होगा कि उच्च शिक्षा संस्थान इस संकीर्णता का मुकाबला करें और प्रमुख धार्मिक त्योहारों को एक मिली-जुली संस्कृति का रूप देने की कोशिश करें। वसन्त पंचमी, होली, दीवाली, ईद, क्रिसमस तथा नया वर्ष जैसे त्योहारों को सांस्कृतिक पर्व के रूप में कैंपस में मनाया जाय। कालेजों में छात्रा-छात्रााओं के बीच सांस्कृतिक कार्यक्रम हो सकते हैं। दीवाली, होली या ईद मिलन जैसे कार्यक्रम तो हमने सिर्फ राजनीतिक नेताओं के हिस्से में डाल दिये हैं। उन्हें छात्रा-छात्रााओं के बीच में आयोजित करने चाहिये। एक महत्वपूर्ण मसला अध्यापकों की भर्ती का है। शिक्षक वर्ग में जब अल्प संख्यक वर्ग तथा आरक्षित वर्ग के लोगों की संख्या बढेगी तो उनके बीच सहज वातावरण बनेगा। आधारभूत बात यही है कि सभी वर्ग, समुदाय और संप्रदाय के छात्रा-छात्रााओं के बीच ज्यादा से ज्यादा आपसी मेलजोल के तरीके निकाले जायं। पढाई के लिये सहानुभूतिपूर्ण, दोस्ताना माहौल मिले और भेदभाव का वातावरण न हो।



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