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’वर्तमान साहित्य‘ का १८५७ जन प्रतिरोध अंक एक जष्रूरी अंक है। हमें साहित्य के साथ अपनी पहचान के बिन्दुओं को भी सामने लाना चाहिए। नहीं तो हाल यही होगा जो नमिता जी ने संपादकीय में इशारतन कहा है। हम अपनी पहचान ’वाया‘ ही जानें तो जानें। नहीं तो यही सोचेंगे कि जानने को और चीजें क्या कम है जो इन फोस्लाइज्ड चीजों को जानते घूमें। आगे भी चलें तो पीछे भी देखें तभी रास्ता चलने का मतलब है। वरना घर में बैठे रहना कौन बुरा है। बधाई। गिरिराज किशोर, संपादक ’अकार‘, कानपुर व ’वर्तमान साहित्य‘ का १८५७ पर विशेषांक मिला। रांगेय राघव, सुभद्रा कुमारी चौहान, यशपाल के विशेषांकों की परंपरा में एक नई कडी। बहुत अच्छी तरह से समेटा है आपने इतिहास के उस उज्जवल अध्याय को। कुंवरपाल जी ने जो लिखा-वह बहुत अच्छा लगा। लेख भी अच्छे हैं। उन तमाम लोगों की स्मृतियां सजीव हुईं जो इतिहास के पन्नों में नहीं परंतु लोगों के मन में जीवित हैं। मेरी बधाईयां-सहयोग ऐसे प्रयासों को। शिव कुमार मिश्र, गुजरात व १८५७ पर आपकी पत्रिाका का अंक बहुत ही सार्थक और उपयोगी है। अधिक से अधिक जरूरी सामग्री है इसमें। शाहजहांपुर में विद्रोह ३१ मई १८५७ को प्रारम्भ हुआ था। यहां तैनात ब्रिटिश फौज के कुछ सिपाहियों ने चर्च में प्रार्थना के लिए एकत्रिात अंग्रेजों की हत्या की थी जिसमें डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के साथ और कई बडे अधिकारी मारे गये थे। पूरे रूहेलखंड में विद्रोहियों की समानांतर सत्ता रही थी और सबसे अंत में ही अंग्रेज इस ओर से बागियों को अपदस्थ कर सके। मौलवी अहमदउल्लाशाह यहां के ही पुवायां कस्बे के राजा की गद्दारी के कारण मारा गया था। पांच वर्ष पूर्व मेरा विचार रूहेलखंड में हुए विद्रोह को लेकर उपन्यास लिखने का था। एक तो विश्वसनीय सामग्री का अभाव था दूसरे मुस्लिम तहजीब से जितनी वकफियत होनी चाहिए, उतनी नहीं थी। इसलिए वह विचार त्यागना पडा। इस पृष्ठभूमि में आपका यह अंक देखकर विशेष प्रसन्नता हुई। हृदयेश, शाहजहांपुर व १८५७ के जनप्रतिरोध पर अंक को केन्दि्रत करके एक जरूरी काम कर डाला है। इस अंक के संपादकीय मे १८५७ के साधारणजन के विवेक को रेखांकित किया गया है। अनेक लेखों में इस विवेक को विस्तृत रूप में सोदाहरण समझाया गया है। इरफान हबीब, विभूतिनारायण राय, कंवल भारती, सत्यदेव त्रिापाठी आदि के आलेख बहुत गंभीर विचार वाले हैं। दलितों की भागीदारी की बात रेखांकित करके लेखकों ने बहुत सारे भ्रमों का भंजन किया है। अनेक स्थानीय नायकों का परिचय देकर लेखकों ने उनके योगदान को रेखांकित किया है। किसानों, कारीगरों, स्त्रिायों और इस रूप में साधारण भारतीयजन की भागीदारी को पहलीबार आप लोगों ने इतनी अच्छी तहर प्रस्तुत किया है। इसके लिए बधाई। प्रो. रामदेव शुक्ल, गोरखपुर व वर्तमान साहित्य सम्पादक ने ’१८५७ जनप्रतिरोध अंक‘ के ’समय संवाद‘ के अन्तर्गत ’१८५७ पर यह अंक क्यों!‘ शीर्षक से कुछ साहित्यक मित्राों के उसको निकालने की जरूरत पर प्रश्न चिन्ह लगाने का उल्लेख लिया है। उन मित्राों की अंक निकालने के विषय में विमति को जानकर अत्यंत खेद मिश्रित आश्चर्य हुआ है। यदि देश, समाज और जनता के अपनी नियति बदलने के लिये किये गये ऐतिहासिक संघर्षों के विषय में किसी साहित्यिक पत्रिाका का अंक निकालना गैर जरूरी है तो उनसे पूछा जा सकता है कि आखिर साहित्य का प्रयोजन क्या है और उसके लिये क्या जरूरी है। क्या कल्पना पर आधारित उपन्यासों-कहानियों आदि के द्वारा मनोरंजन ही साहित्य का प्रयोजन है। हिन्दी साहित्य के इतिहास के आदिकाल से अब तक जो भी साहित्य लेखन हुआ है जिस पर गर्व किया जा सकता है वह सम्बद्ध कालों में परिस्थितियों के अनुसार जन समाज को जीवित-जागृत रखने के लिए विभिन्न रूपों में संघर्षों के अलावा और क्या है? आज के परिदृश्य में तो जब जन विरोधी शक्तियां हावी होती जा रही हैं और जीवन की कटु वास्तविकताओं और जनता के दुखदर्द से ध्यान हटाने के प्रयत्न में संलग्न हैं, तब १८५७ के जन प्रतिरोध की स्मृति को ताजा करने के लिये इस अंक का निकाला जाना और अधिक आवश्यक था। वर्तमान साहित्य के सम्पादक मण्डल ने उसे निकालकर एक निहायत जरूरी काम किया है जिसके लिये हमें उनका अनुग्रहीत होना चाहिए। वास्तव में १८५७ के जन विद्रोह को सामंतवादी शक्तियों का अपनी सत्ता कायम रखने के लिये विद्रोह बताना एकांगी, सीमित और सतही दृष्टि का परिचायक है और लम्बे समय से चले आ रहे अंग्रेजी शासन की दुर्नीतियों के खिलाफ किसानों और जनता में भीतर ही भीतर पनपने वाले गहरे असंतोष की तरफ से आंख मूंद लेना है। १८५७ के विद्रोह या क्रांति के कई कारण थे, कुछ तात्कालिक और कुछ पूर्वकालिक। एकांगी और सतही दृष्टि वाले लेखकों की उसके तात्कालिक कारणों पर ही दृष्टि जाती है, जो प्रथमतः सेना के सिपाहियों में कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी के होने के समाचार से विस्फोटक बन गया। इसके अतिरिक्त अंगज शासकों की देशी रजवाडों के लिये लागू की गयी विलय की नीति से उपजा असंतोष दूसरा कारण उसमें मिल गया। इस प्रकार ये दोनों ही तात्कालिक कारण थे। सेना के सिपाहियों और सामंतों के सहयोग के परिणाम स्वरूप वे जन असंतोष का नेतृत्व करने की स्थिति में आ गये। लेकिन विद्रोह की वास्तविक शक्ति किसानों और जनता में व्याप्त पूर्व असंतोष ही था जिससे वह उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, पंजाब आदि प्रदेशों में तीव्र गति से फैल गया और बहुत बडी संख्या में गांवों के गांव उसमें शामिल होकर देश से अंग्रेजी राज को समाप्त करने के लिये कटिबद्ध हो गये। डॉ. रामविलास शर्मा ने उस काल में जनता की मनोदशा और ऐतिहासिक तथ्यों का गहरायी से अध्ययन कर जो निष्कर्ष निकाला है कि वह जन विद्रोह भारत का पहला स्वतंत्राता संग्राम था जो क्रांति का रूप लेता जा रहा था, वह वास्तविकताओं पर आधारित और सही है। यदि वह प्रथम स्वतंत्राता संग्राम या विद्रोह सफल हो गया होता तो यह कहना कि उसके परिणाम स्वरूप देश में राजाओं-महाराजाओं का सामंती शासन ही कायम रहता और हम वर्तमान काल के लोकतंत्रावादी शासन और आधुनिक विचारों से वंचित हो गये होते, सम्बद्ध विचारकों-लेखकों की अपनी व्यक्तिगत गलत सोच है। इसके विपरीत यदि यह विद्रोह सफल हो गया होता तो देश की विद्रोही जनता जो उसकी वास्तविक शक्ति थी राजाओं-महाराजाओं और सामंतों के शासन का पुराना ढांचा बदलने के लिये उन्हें मजबूर कर देती और तब जो शासन व्यवस्था कायम होती वह जनता के प्रति अधिक उत्तरदायी होती। यह आश्चर्य की बात है कि ये विचारक यह सोचते हैं कि उस दशा में भारत में समय और इतिहास अपनी पूर्व स्थिति में ही रूक कर स्थिर हो गया होता जब कि योरुप-एशिया के कई देशों में उसके बाद अनेक परिवर्तन हुए, परिवर्तन ही नहीं क्रांतियां भी हुईं। क्या सोवियत संघ और चीन में हुई क्रांतियों का भारत पर किसी प्रकार का कोई प्रभाव न पडता। क्या सामंतवादी शासन व्यवस्था के विरोध में किसी प्रकार का असंतोष या आन्दोलन न पनपा होता और जनता ने सिर झुका कर उसको स्वीकार कर लिया होता। भारत में ही अंग्रेजी शासन के अन्तर्गत जो जन आन्दोलन हुए क्या उनसे मिलते-जुलते आन्दोलन तब नहीं हुए होते। ये विचारक ये क्यों नहीं सोचते कि यदि भारत में सामंतवाद रहा होता तो रूस में जो साम्यवादी क्रांति हुई थी उसी से मिली-जुली कोई क्रांति इस देश में भी हो सकती थी क्यों कि उस स्थिति में भारत और रूस की शासन व्यवस्थाओं और परिस्थितियों में समानता होती और अंग्रेजी शासन यहां पर न होता। अतः जो विचारक यह कहते हैं कि लोकतंत्रा और आधुनिकता अंग्रेजी शासन की देन है उनकी इस गलत सोच के विषय में कुछ न कहना ही ठीक है। वे समय और इतिहास की परिवर्तनकारी शक्ति से अपरिचित प्रतीत होते है। चाहे १८५७ का जन-विद्रोह सफल न हुआ हो लेकिन उसने भविष्य में अंग्रेजी शासन के विरूद्ध एकजुट होकर देशव्यापी जन प्रतिरोध और संघर्ष का रास्ता दिखला दिया। १८५७ के जन-विद्रोह की यह बहुत बडी देन है जिससे १९४२ का स्वतंत्राता संग्राम संभव हो सका। मलखान सिंह सिसौदिया, सिकन्द्राबाद (आंध्रप्रदेश) व १८५७ पर केन्दि्रत वर्तमान साहित्य का अंक मिला। इस सामग्री को संयोजित करने, जुटाने और लिखाने के पीछे कितना श्रम और मशक्कत करनी पडी होगी, इसकी मैं कल्पना कर सकता हूं। अंक दस्तावेजी है। आपकी पूरी टीम को इस अंक के लिए बधाई। विनोद दास, मुंबई व आपकी पत्रिाका ’वर्तमान साहित्य‘ मैं प्रारम्भ से ही पढता आ रहा हूं। १८५७ क्रान्ति पर आधारित विशेषांक। मेरी धारणा है कि अब वैसी ही क्रान्ति की फिर अपेक्षा है। उस समय हमें विदेशी शक्तियों से लडना पडा था; लेकिन आज हमें अपने ही माफिश्या सरगनाओं से लडना है। आज से तीन चार दशक पहले आजषदी के कुछ वर्षों के बाद ही तत्कालीन शासन के विरुद्ध जब मुझे मोह-भंग हो गया था, तो मैंने एक कविता लिखी थी, ’सिंहासन छोडो‘ वह प्रस्तुत कर रहा हूं.....। विश्वनाथ मिश्र, लखनऊ व मैं ’वर्तमान साहित्य‘ का पाठक हूं। आपकी पत्रिाका हिन्दी जगत् को पुष्टि प्रदान करती है, यह कहना अत्युक्ति नहीं होगी। ’वर्तमान साहित्य‘ में मात्रा उत्तर की ही नहीं दक्षिण एवं राष्ट्र के अन्य भागों से भी हिन्दी की वाणी मुखरित होती है, हमारे ख्याल में यही विशेषता आपकी पत्रिाका को अन्य पत्रा-पत्रिाकाओं के मध्य अलग रखती है। दं. नागेश्वर राय, आंध्र लोयोला कॉलेज, विजयवाडा व अक्टूबर अंक में बरेली पर सुधीर विद्यार्थी जी का लेख महत्वपूर्ण जानकारियों, विरासत से भरा हुआ है। डॉ. प्रेमशंकर जी की गद्य कविताएं ’सानेट‘ की तरह सुगठित लगती हैं। इसी तरह राममेश्राम की गजष्लों की ऊंचाई एवं गहराई दिलोदिमाग को छूती हैं साहिर की याद हमें भी अपनी यादों की दुनिया में ले जाती है। उनके फिल्मी गानों के रंग में जिंदगी जिस तरह उभर कर आई है, उसे विजय शर्मा ने बखूबी बताया है। बिस्मिल्ला खां पर सामग्री अविस्मरणीय है, और गांधी की प्रासंगिकता भी बेहद महत्वपूर्ण है। शाकिर अली, छत्तीसगढ ग्रामीण बैंक, हाटकचोरा, जगदलपुर, छ.ग.-४९४००१ व अक्टूबर २००६ का वर्तमान साहित्य अंक। नमिता जी का सम्पादकीय, प्रासंगिक और बाल श्रम पर उच्चतम न्यायालय के आदेश पर सटीक हस्तक्षेप है। नमिता जी ने ठीक ही लिखा है कि कानून बनाने मात्रा से बाल श्रम नहीं रुकेगा। उन्हीं के शब्दों में ’ये विशुद्ध आर्थिक स्थितियों से जुडे सवाल हैं जिनका हल भी समाज की इच्छा पर निर्भर करता है.... कानून भी बिना सामाजिक चेतना के बिल्कुल मखौल है।‘ अगस्त के अंक में डॉ. विनीता रघुवंशी ने मुक्तिबोध की कविता ’भूल गलती‘ का पुनर्पाठ प्रकाशित किया था। इसमें मुक्तिबोध की इस कविता में उनके विचार से ’भूल गलती‘ पं. नेहरू को देश का प्रधानमंत्राी बनाना था। प्रस्तुत अंक में मुक्तिबोध साहित्य के विशेषज्ञ भाई चंचल चौहान ने इस संघीय व्याख्या का सप्रमाण और सतर्क खण्डन अपने लेख ’मुक्तिबोध‘ की भूल गलती-एक कुपाठ‘ शीर्षक लेख में किया है। विनीता जी का विश्लेषण पाठकों को गलत दिशा में निर्देश करता है। साहिर के जन्मदिन पर श्री विजय शर्मा का लेख कवि की आत्मा में प्रवेश कर उनके गीतों का विवेचन करता है। ’ये बरेली के शेख साहब‘ निबंध में इस शहर की साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत का ऐतिहासिक चित्राण है। कविताओं में ओमप्रकाश मिश्र और गष्जष्लों में ’अनवारे इस्लाम‘ की गष्जष्लें अच्छी लगीं। अपनी पुस्तक समीक्षा में आपने सीताराम येचुरी की पुस्तक ’घृणा की राजनीति‘ पर लिखते हुए समकालीन सामाजिक परिस्थिति का सम्यक विश्लेषण किया है। ’क्या गांधी आज प्रासंगिक है?‘ प्रश्न पर आपका संक्षिप्त नोट भी आपकी प्रगतिशील समझ का प्रतिबिम्ब है। कृष्ण बिहारी मिश्र, २, साक्षरा अपार्टमेन्ट्स, ए-३, पश्चिम विहार, नई दिल्ली-११००६३ व ’वर्तमान साहित्य‘ का नवम्बर-दिसम्बर २००६ का अंक पहली बार पढा। पसंद आया। आज के दौर में हिन्दी भाषा में ऐसी पत्रिाका वाकई सराहनीय है।



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