|
Vartmaan Sahitya ::February, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner सत्ता और जातिवाद का गणित कुंवरपाल सिंह
इन दिनों उत्तर प्रदेश में चुनाव का दौर है। राजनेताओं को अपनी गद्दी खतरे में नजष्र आ रही है। इसलिए वे सत्ता के लिए हर तरह के खेल और नाटक दिखा रहे हैं। इनमें, मुलायम सिंह जी की समाजवादी पार्टी, मायावती जी की बसपा और राजनाथ जी की भाजपा रोजषना नए-नए तमाशे कर रहे हैं, ताकि जनता को लुभा सकें। मायावती जी इस कार्य में अग्रणी रही हैं। आरंभ में उन्होंने नारा दिया-’’तिलक तराजू और तलवार इनमें मारो जूते चार।‘‘ इनके अनुयायियों ने इस सिद्धान्त को व्यवहार में उतारा और कई स्थानों पर जाति-विद्वेष बढ गया। बाद में, उनकी समझ में आया कि देश में कोई भी दल केवल एक धर्म या जाति के लोगों के बल पर अधिक दिन सत्ता पर कशबिज नहीं रह सकता। लगभग ४५० वर्ष पूर्व अकबर ने इस रीति पर अमल करके कि देश में शासन करना है तो देश के हर वर्ग को साथ रखना होगा। इससे मुगष्ल साम्राज्य की नींव मजबूत हुई और शासन को दृढ आधार हासिल हुआ। लेकिन, हमारे हिन्दी-प्रदेशों के राजनेता इतिहास से कोई सबक नहीं लेते। सबक लें भी कैसे? उन्होनें इतिहास पढा हो, तब न? वे तो पुराण और दंत कथाओं को ही इतिहास समझते हैं। इसी चक्कर में मायावती जी की दो बार गद्दी चली गई। घाटे का सौदा करके उन्हें समझ में आया कि केवल एकांगी दृष्टिकोण से देश की राजनीति में लम्बी पारी नहीं खेली जा सकता, उसके लिए व्यापक और उदार दृष्टिकोण जरूरी है। भ्रमित मायावाती जी ने जातिवाद के दूसरे छोर को पकडा और ब्राह्मणों के महा-सम्मेलन का आयोजन कर डाला। अन्य दलों के मुस्लिमों ने भी इससे प्रेरणा ली और उन्होंने सम्मान सम्मेलनों द्वारा अनेक जातियों का सम्मान कर डाला। इस तरह के सरकारी आयोजनों पर जनता की खून पसीने की कमाई निर्लज्जतापूर्वक खर्च की जाती है और जनता को भ्रमित किया जाता है। भाजपा पहले ही, जनता के एक वर्ग को साम्प्रदायिकता ने रंग में रंग चुकी है। राम, जो सबके प्रिय आराध्य हैं उन्हें कठघरे में खडा कर दिया है। इतिहास इस कृत्य के लिए भाजपा को क्षमा नहीं करेगा। राम तो तुलसी के भी थे और कबीर के भी। जातिवाद और साम्प्रदायिकता सिक्के के दो पहलू हैं। बहुत से लोग जातिवाद को प्रगतिशीलता को और साम्प्रदायिकता को प्रतिक्रियावाद मानते हैं। जातिवाद का जष्हर बहुत धीमे चढता है। साम्प्रदायिकता एक तीखा जष्हर है। दोनों का अन्तिम पडाव एक ऐसी व्यवस्था कशयम करना है जो वर्चस्ववादी होती है। डॉ. राम मनोहर लोहिया ने पचास के दशक में पिछडी जातियों का राजनीतिकरण किया था। उन्होंने माक्र्सवादियों के वर्ग-संघर्ष के स्थान पर वर्ण-संघर्ष पर जोर दिया। उनका हवाई विचार था कि पिछडी जातियां समाज में मूलभूत परिवर्तन करने में सफल हगी। हरित-क्रांति की सफलता और जमींदारी व्यवस्था के समाप्त होने से पिछडी जातियों की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई। वे जिस भूमि से दूसरों के लिए धन पैदा कर रहे थे, वह अब उनकी हो गई थी। वे मालिक बन गए। मजबूत आर्थिक आधार ने उन्हें राजनीतिक रूप से भी महत्वाकांक्षी बनाया। डॉ. लोहिया स्वप्नदर्शी थे। जाति और वर्ण की राजनीति को वे एक धुरी की तरह इस्तेमाल कर रहे थे। लोहिया के प्रयासों से कांग्रेस १९६७ में कई स्थानों पर हारी। पंजाब, उ.प्र. और बिहार जैसे प्रांतों में कांग्रेस अल्पमत में आ गयी। पूर्ण बहुमत न होने के कारण संविद सरकारें अस्तित्व में आयीं। जिनका नेतृत्व अधिकांश पिछडे वर्ग के नेताओं ने किया। ये सरकारें दो-ढाई साल तक ही चलीं। जो अपने अन्तर्विरोधों के कारण टिक नहीं सकीं, क्योंकि जनसंघ और सी.पी.आई. के नेताओं में वैचारिक मतभेद और कार्य पद्धति को लेकर निरन्तर खींचतान रही। इंदिरा गांधी ने अपने प्रधानमंत्रिात्व-काल में जातिवाद का अप्रत्यक्ष सहारा लिया और क्षत्रिाय महासभा तथा ब्राह्मण महासभा जैसे संगठनों के सम्मेलनों का आयोजन करवा डाला। उनका विचार था कि पिछडों के मुकाबले अगडे ही हमारे अधिक मददगार हो सकते हैं। मुसलमानों और दलितों को तो वे अपने साथ ही समझती थीं। १९७१ के चुनावों में कांग्रेस को भारी सफलता मिली। फिल्मों में जैसे किसी फिल्म के फार्मूले की सफलता से कोई फिल्म चल जाती है तो आने वाली फिल्में भी उसी फार्मूले पर बनने लगती हैं, वैसा ही हाल हमारी राजनीति का है। इन्दिराजी का गष्रीबी हटाओ नारा बेहद कशमयाब रहा था। किन्तु गष्रीबों को उससे कोई लाभ नहीं चहुंचा। हां, उनके लिए यह नारा वोट-दिलाऊ जरूर साबित हुआ। जनता ने चुप रहकर इंदिरा-शासन के कष्ट झेले। किन्तु समय आने पर जनता-पार्टी को समर्थन देकर उन्हें परास्त कर दिया। यह अलग बात है कि सम्मिलित दलों के अन्तर्विरोधों, मतभेदों और नेताओं की निजी महत्वकांक्षाओं ने जनता-पार्टी को भी समाप्त कर दिया। कांग्रेस को शायद अनुमान नहीं था कि जो काम वह दबे-ढके रूप से कर रही है, उसे भाजपा या उसके अन्य सहयोगी दल खुलेआम अंजाम दे सकते थे। इनमें लोहिया और उनके समर्थक समझते थे कि यदि पिछडों को सत्ता प्राप्त हो जाएगी तो क्रांतिकारी परिवर्तन होंगे और समाजवाद आ जाएगा। लेकिन सत्ता में आकर चाहे वे मुलायम सिंह हों, लालू प्रसाद यादव हों, नीतीश कुमार हों या शरद यादव हों या श्री जार्ज फर्नाण्डीज, इनकी करनी और कथनी से स्पष्ट है कि उ.प्र. और बिहार में पिछडों की लम्बे समय तक सरकार होने के बाद भी आर्थिक सामाजिक परिवर्तन की दशा-दिशा क्या है? विकास की गति क्या है? कांग्रेस का अगडों को साथ लेकर चलना बीस साल में ही ध्वस्त हो गया। जिन ब्राह्मण सभा और क्षत्रिाय महासभा के कंधों पर वह बैठी थी, वे सदी के अन्तिम दशक की शुरूआत में ही प्रस्ताव पास करके भाजपा की टोली के सदस्य हो गए। ऐसे में कायस्थ महासभा या जाट महासभा क्यों पीछे रहती। उन्होंने भी अपने अंग्रजों का मार्ग अपनाया। यह तो हम जानते हैं कि साम्प्रदायिकता समाज की कोढ है। किन्तु, जातिवाद कोढ में खाज है।
Discuss this topic on KhabarExpress Forum
|
|
October, 2006 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | January, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | February, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | March, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | April, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | May, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | | June, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner | | |
|