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Vartmaan Sahitya ::February, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner लघु पत्रिाकाओं पर आयोजित संगोष्ठी
श्वेता शर्मा
साठ के दशक में जब विचार का अंत और सभ्यताओं के संघर्ष की बात हो रही थी, हम लोगों ने इसके खिलाफ लघु-पत्रिाका के रूप में अपना संघर्ष शुरू किया था। आज देखते-देखते पचास साल होने जा रहे ह। भले ही वह शुरूआत हवा में मुट्ठी बांधना भर रहा हो, लेकिन वह एक वैचारिक शुरूआत थी जबकि आज लघु पत्रिाकाओं में विचार के लिए कोई जगह ही नहीं है तो वैचारिक संघर्ष के लिए वे माद्दा कहां से दिखलाऐंगी। वे न नया विचार बना पा रही है ना ही नए धरातल पर उतना कारगर हस्तक्षेप कर पा रही हैं। आज की लघु पत्रिाकाओं के सामने यह चुनौती है।‘‘ ये बातें पहल के संपादक-ज्ञानरंजन के केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा द्वारा आयोजित दो दिवसीय लघु-पत्रिाकाओं पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन के मौके पर कहीं। उन्होंने आगे और जोडा कि ’’इस निराशजनक परिस्थिति में भी लघु-पत्रिाकाओं ने ही सबसे ज्यादा लेखक पैदा किए हैं। इसलिए लघु-पत्रिाकाओं के सम्पादकों को निराश नहीं होना चाहिए, बल्कि हमेशा ध्रुवतारे को देखते रहना चाहिए।‘‘ कवि-संपादक अरूण कमल ने अपने भाषण में कहा कि-’’हम जैसे रचनाकार लघु-पत्रिाकाओं की ही उपज हैं और लघु-पत्रिाका का काम ही है सत्ता की अव्यवस्था के खिलाफ संघर्ष करना। जो पत्रिाका ऐसा नहीं करती, वह लघु पत्रिाका हो ही नहीं सकती।‘‘ समता-संदेश के संपादक और मुख्य अतिथि हिम्मत सेठ ने वर्तमान समय में, वंचित, संघर्षशील और हाशिए के लोगों की आवाज के रूप में लघु पत्रिाकाओं को देखा और उनकी भूमिका की सराहना की। वही अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ. शंभुनाथ ने कहा कि लघु पत्रिाकाएं तो हाशिए की आवाज हैं लेकिन इनकी सबसे ज्यादा सार्थकता हाशिए के विमर्श और साम्राज्यवाद विरोधी केन्द्रीय विमर्श के बीच पुल बनने की है। लघु-पत्रिाकाओं के समाने एक चुनौती यह भी है कि यह युवाओं के बीच लुप्त हो रही पढने की संस्कृति को फिर से उभार कर सामने लाए।‘‘ उद्घाटन सत्रा के बाद ’भाषायी साम्राज्यवाद की चुनौतियां और लघु-पत्रिाकाएं‘ विषय पर आयोजित प्रथम सत्रा में कथन के संपादक रमेश उपाध्याय ने भाषाई साम्राज्यवाद के चेहरे को रेखांकित किया कि ’’अमेरिका की यह सोच कि हमें ऐसी दूसरी दुनिया बनानी है जहां के लोग रक्त और वर्ग से स्थानीय हों लेकिन रूचि, सोच और नैतिकता की दृष्टि से अमेरिकी। आज का साम्राज्यवाद पहले के साम्राज्यवाद से अलग है, इसलिए आज के साम्राज्यवाद से लडने के लिए हमें बेहतर राष्ट्रवाद की जरूरत है।‘‘ संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रही ’युद्धरत आम आदमी‘ की संपादिका रमणिका गुप्ता ने कहा कि सत्ता की भाषा हमेशा से साम्राज्यवादी होती है और साहित्य की भाषा लोक की होती है। दूसरे दिन पहले सत्रा ’साहित्यिक पत्राकारिता का परिदृश्य‘ पर बोलते हुए विभूतिनारायण राय ने वर्तमान समय को लघु-पत्रिाकाओं के स्वर्णयुग के रूप में चिहि्नत किया। वहीं हेतु भारद्वाज ने लघु-पत्रिाकाओं को मिशन और उद्देश्य से जोडने पर बल दिया और संपादकों को सैलिब्रेटिज, फार्मुलाशब्द और रूढबद्ध होने से सावधान रहने को भी कहा। गोपाल राय ने लघु-पत्रिाकाओं के औचित्य पर ही सवालिया निशान खडे कर दिए। अजेय कुमार, रविशंकर रवि और भारत-भारद्वाज ने भी अपनी बात रखी। अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए राजेश जोशी ने कहा कि आज के दौर में कहानी केन्दि्रत पत्रिाकाएं ज्यादा हैं। नाटक या कविता केन्दि्रत कम और ये पत्रिाकाएं व्यवस्था के विरोध के बदले उनके सुर में सुर मिला रही है। आज बाजारवाद एवं साम्राज्यवादी शक्तियों के खिलाफ हम लोग एक समानांतर आंदोलन खडा नहीं कर पा रहे है तो ये सोचने का विषय है और यही समय है जब हम स्वयं की जिम्मेदारी को समझें। समापन सत्रा की अध्यक्षता करते हुए रामशरण जोशी ने लघु-पत्रिाकाओं के संपादकों को वर्तमान समय की सामाजिक राजनैतिक और आर्थिक विषमताओं से लडने एवं उनके विकल्प तलाशने पर जोर दिया। अन्यवक्ताओं में अजय तिवारी, प्रफुल्ल कोलख्यान, शिवराम, रामकुमार कृषक, जय प्रकाश धूमकेतु एवं राजेन्द्र शर्मा ने भी अपने विचार व्यक्त किए। चर्चा सत्रा में सुश्री इंदु सिंह, प्रो. रामवीर सिंह, डॉ. योगेन्द्र कुमार और भारी संख्या में छात्रा-छात्रााओं ने भाग लिया। समापन महेश जायसवाल के गीत से हुआ और संचालन वीना शर्मा ने तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. चंद्रकांत त्रिापाठी ने किया। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, २, संस्थान मार्ग, आगरा (उ.प्र.)
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