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Vartmaan Sahitya ::February, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner संगमन में बाजषरवाद का शोर
श्यामल मेहतो
संगमन-१२ की शुरूआत करते हुए कमलेश भट्ट कमल ने संगमन के इतिहास पर प्रकाश डाला उसके बाद पहले सत्रा की शुरूआत की गयी, जिसका विषय था-’नयी सदी की चुनौतियां और भविष्य की कहानी‘ विषय पर प्रकाश डालते हुए खगेन्द्र ठाकुर ने कहा कि ’नयी सदी पर अमानवीय शक्तियां हावी हैं, हम बाजषर से बच नहीं सकते। पहले मनुष्य बाजार को नियंत्रिात करता था, आज बाजषर मनुष्य को नियंत्रिात करता है। साहित्यकारों का सच संकट में है‘। लौहनगरी में पहली बार संगमन का आयोजन किया गया इस पर सम्मेलन के संयोजक जयनंदन ने कहा कि इससे पूर्व के आयोजित संगमन की अपेक्षा लौहनगरी में लोगों की संख्या अधिक बढी है। युवा आलोचक जयप्रकाश ने कहा कि आज टैक्नॉलोजी ने श्रम को हाशिये पर डाल दिया है। मनुष्य मनुष्य न रहकर साधन मात्रा रह गया है। जयाजादवानी ने कहा कि ’कहानी का जीवन मनुष्य के जीवन से काफी लंबा है। पहले सत्रा का संचालन कथाकार महेश कटारे ने किया। संगमन-१२ के दूसरे सत्रा की शुरूआत कुछ धूम धडाके के साथ हुई। ऋषिकेश सुलभ ने अपनी बात रखते हुए कहा ’कि मानव का हर समय चुनौतियों से भरा है और बाजषरवाद से हिन्दी लेखक काफशी डरा हुआ है। इतिहासकार लाल बहादुर वर्मा ने कहा कि जो जनतांत्रिाक नहंी है, वह इस सदी का नहीं है। आज का होने के लिए जनतांत्रिाक होना होगा। इसी सत्रा में नये कहानीकरों को भी बोलने का मौका दिया गया, जिसमें उन्होंने अपने अनुभव और समस्याओं का जिक्र किया। विषय प्रवेश करते हुए वरिष्ठ कथाकार शिवमूर्ति ने कहा कि समय की मांग है। नये-नये सृजन करने की। अवधेश प्रीत ने कहा कि युद्ध और भूख के मारे व्यक्ति की कोई गरिमा नहीं होती। बस यही नये लेखकों को विषय देता है। मनीषा कुलश्रेष्ठ ने कहा कि कहानी और लेखक का विकास किसी सिद्धान्त पर नहीं होता। बल्कि वह तो अपनी मस्त चाल से चलता है। झारखंड की महुआ मांझी ने आत्मानुभूति को लेखक की सबसे बडी पूंजी बताया। उन्होंने कहा कि समाज में प्रकृति और नारी का सबसे ज्ष्यादा शोषण होता है। श्यामल बिहारी मेहतो ने अपनी बात को यूं रखा-’’आज जो नयी सामाजिकता विकसित हो रही है वह भूमंडलीकरण की शिकार है और उसके सारे कार्य व्यवहार जाति आधारित न होकर अर्थ आधारित होता जा रहा है। जो सम्पन्न है और सम्पन्न हो रहा है जो विपन्न है, वह और विपन्न होता जा रहा है। कहने का मतलब कि आज हम जिस परिवेश में जी रहे हैं, जिस आपाधापी में हमारा जीवन गुजष्र रहा है, जिस दौड में हमारे बच्चे शामिल हैं, उसका अंत दिखाई नहीं पडता-यही तो इस सदी की सबसे बडी चुनौती है और इस चुनौती का सामना करते हुए जो लिखा जाएगा-वही भविष्य की कहानी होगी।‘‘ संगमन का समापन करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार गिरिराज किशोर ने रोचक व्याख्यान दिया। इस अवसर पर देश भर के साहित्यकारों का जमावाडा रहा। प्रियंवद, हरिनारायण, रविभूषण, कैलाश बनवासी आदि मुख्य रूप से उपस्थित थे।
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