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Vartmaan Sahitya ::February, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner द्वितीय जिला सम्मेलन-प्रगतिशील लेखक संघ, सुपौल (बिहार)
आशीष चमन
जनकवि नागार्जुन की पुण्य तिथि के अवसर पर कवि अरविन्द ठाकुर की अध्यक्षता में आयोजित जिला प्रगतिशील लेखक संघ सुपौल (बिहार) का द्वितीय जिला सम्मेलन संपन्न हुआ। सम्मेलन में परिसंवाद का आयोजन किया गया जिसका विषय था-’’महेन्द्र नारायण ’पंकज‘ द्वारा संपादित पुस्तक ’जनकवि नागार्जुन ः एक मूल्यांकन और जनवादी चिन्तन‘। सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए बी.एन. मंडल विश्वविद्यालय मधेपुरा के पूर्व कुलसचिव प्रो. शचीन्द्र महतो ने कहा कि नागार्जुन जनता के कवि थे। वे अपने लेखन और संघर्ष के द्वारा वर्गविहीन जातिविहीन, सामाजिक व्यवस्था की स्थापना करना चाहते थे। आज पूंजीवादी और साम्राज्यवादी ताकतों ने आम आदमी का जीना मुश्किल कर दिया है। आशीष चमन ने कहा कि नागार्जुन किसान मजदूरों के लेखक थे। विद्यानन्द सिन्हा ने कहा कि महेन्द्र नारायण ’पंकज‘ की संपादित पुस्तक ’जनकवि नागार्जुन ः एक मूल्यांकन‘, में नागार्जुन की जनवादी चिन्तन की तलाश कर रहे ह। पुस्तक में संग्रहीत लेख उनके जनवादी चिन्तन का खुलासा करते हैं। उन्होंने नागार्जुन की कविता का उदाहरण देते हुए कहा कि वे जनता की पीडा के कवि थे। बहुत दिन तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास, कई दिनों तक काली कुतिया सोई उनके पास। दाने आए घर के अन्दर कई दिनों के बाद धुंआ उठा आंगन के ऊपर कई दिनों के बाद। अमर नाथ अमन ने कहा कि नागार्जुन एक व्यक्ति नहीं बल्कि आम आदमी के जीवन को बेहतर बनाने की लडाई के अग्रणी योद्धा थे। अनिल कुमार झा ने कहा कि नागार्जुन आज के समय में और अधिक प्रासंगिक लग रहे ह जब किसान आत्महत्या कर रहे हैं। वे किसान आन्दोलन से भी जुडे रहे और किसान समस्या पर वे अनवरत लिखते रहे। डॉ. अनुपम ने कहा कि बाबा नागार्जुन समाज की पुरानी लीक से हट कर नई लीक बनाने वाले महान लेखक व कवि थे। प्रो. निलिलेश कुमार सिंह ने कहा कि-’’नागार्जुन समाज में परिवर्तन चाहते थे। वे एक क्रांतिकारी कवि थे जो पूंजीवादी व्यवस्था के स्थान पर समाजवादी व्यवस्था लाना चाहते थे। महावीर सिंह, अधिवक्ता ने कहा कि नागार्जुन माक्र्सवादी कवि थे। इसीलिए उन्होंने अपने को प्रतिबद्ध कवि व लेखक बताया उनकी ही कविता है-’’जी हां प्रतिबद्ध हूं।‘‘ जिला साक्षरता समिति सुपौल के सचिव डॉ. ललन कुमार ने कहा कि निरक्षरता है इसलिए गरीबी है, गरीबी है इसलिए निरक्षरता है। नागार्जुन के सपनों के भारत में गरीबी का स्थान नहीं है। प्रो. (श्रीमती) वीणा सिंह ने कहा कि नागार्जुन के साहित्य में नारीमुक्ति और नारी-शोषण के विरोध को स्थान दिया गया है। वे स्त्राी-पुरुष संबंधों में समानता के पक्षधर थे। डॉ. विश्वासचन्द्र मिश्र ने कहा कि पंकज जी की पुस्तक ’जनकवि नागार्जुन ः एक मूल्यांकन‘ में नागार्जुन की जनवादिता को उजागर किया गया है। वे मूलतः मेहनतकश शोषित-पीडत आम आदमी के लेखक थे। आज भी भूख, गरीबी, शोषण, विषमता, अत्याचार, अन्याय मौजूद है। नागार्जुन इन समस्याओं के निदान के लिए लिखकर जन जागरण का काम कर रहे थे और स्वयं लड भी रहे थे। कुमार अमर ने कहा कि नागार्जुन हमारे आदर्श हैं। इप्टा मधेपुरा के सचिव, तुर्वसु शचीन्द्र ने कहा कि बाबा नागार्जुन किसान-मजदूरों के शोषण खत्म करने के लिए लेखन कर रहे थे और लड भी रहे थे। वे आजादी से पहले और बाद में भी कई बार जेल गए। डॉ. आर.पी. साह ने कहा कि नागार्जुन किसानों के लेखक ही नहीं नेता भी थे। प्रो. इन्द्रनारायण यादव ने कहा कि वे प्रतिरोध का साहित्य लिखने वाले लेखक व कवि थे। महेन्द्र नारायण पंकज ने नागार्जुन पर पुस्तक संपादित करने का उद्देश्य बताते हुए कहा कि वे नागार्जुन के विचारों स जनता को अवगत कराना चाहते थे। उन्होंने अपना विचार प्रकट करते हुए कहा कि बाबा नागार्जुन संघर्ष और सौंदर्य के कवि थे। वे कबीर के बाद सबसे बडे व्यंग्य लिखने वाले कवि हुए। प्रलेस कटिहार के संयोजक प्रो. मनोज पराशर ने कहा कि नागार्जुन जन, जंगल, जमीन की समस्या के निदान के लिए साहित्य सृजन कर रहे थे और जन संघर्षों के माध्यम से उन समस्याओं के निदान में जुटे थे। मुख्य अतिथि के पद से बोलते हुए डॉ. परमानन्द पाठक ने कहा कि नागार्जुन शोषित पीडत दलित व उपेक्षित जन के कवि थे। उन्होंने जैसा लिखा वैसा जीया भी। उनके जीवन और रचना में कोई अन्तर नहीं था। अन्त में अध्यक्षीय भाषण में अरविन्द ठाकुर ने कहा कि नागार्जुन तुलसीदास और निराला के बाद हिन्दी के सबसे बडे कवि हुए। स्वातंत्र्य समिति के उपाध्यक्ष सुरेन्द्र भारती ने आगन्तुक अतिथियों, लेखकों को सम्मेलन में भाग लेने व परिसंवाद को सफल बनाने के लिए धन्यवाद दिया। द्वितीय सत्रा में उन्नीस सदस्यीय जिला कमिटी का निर्माण किया गया। इस सत्रा में प्रो. शचीन्द्र सचिव जलेस बिहार एवं महेन्द्र नारायण पंकज संगठन प्रभारी कोसी क्षेत्रा भी उपस्थित थे। जिला सचिव, प्रगतिशील लेखक संघ, सुपौल (बिहार)
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