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Vartmaan Sahitya ::February, 2007
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आम-आदमी के दुःख दर्दों को गुनगुनाती हौंसले से भरी गजल भानु प्रकाश
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इस हकशीकत से इन्कार नहीं किया जा सकता कि हमारी तहजीब गष्जष्ल में और गष्जष्ल हमारी तहजीब में शामिल है। यह एक ऐसा आईना है जिसमें हर जमाने के सियासी हालात को देखा और पढा जा सकता है। अगर हम गष्जष्ल का विस्तार से जायजा लें तो मालूम होगा कि इसमें केवल हुस्नों इश्क की दास्तानें ही नहीं हैं बल्कि अहमद शाह अब्दाली के हमलों की आवाजें भी सुनाई देती हैं और दिल्ली की बर्बादी के मंजर भी नजष्र आते हैं। गष्जष्ल एक ऐसा साज है जिसके नगष्में बुलन्द होते ही सुनने और पढने वालों के दिलों के तार बोलने लगते हैं। इस कसौटी पर बनाफर की गष्जष्लों को परखते हैं तो यह खरे नजष्र आते हैं।‘‘ गष्जष्ल के सशक्त हस्ताक्षर कामिल बैहजषदी ने गष्जष्लकार के रूप में सतत् सक्रिय बनाफर चन्द्र के दूसरे गष्जष्ल संग्रह ’चांद सूरज‘ के विषय में लिखा है-गष्जष्ल को उसके सही मीटर में लिखना निश्चित ही एक कठिन कार्य है लेकिन बनाफर चन्द्र ने उसको सतत् अभ्यास से संभव तो किया ही है साथ ही उसमें चेतना और वैचारिकता को रदीफ काफिया में ढाला है। गष्जष्ल आम आदमी के अन्तस की व्यथा कहती नजष्र आती है। हिन्दी में इसकी शुरूआत दुष्यंत ने की थी। ’’मेरी जुबान से निकली तो सिर्फ नज्ष्म बनी, तुम्हारे हाथ में आयी तो एक मशाल हुई।‘‘ बनाफर दुष्यंत की उसी सामाजिक प्रतिबद्धता को और आगे बढाते हैं ः ’’जो मसीहा था सारी दुनिया का, उसको टांगा गया है कीलों पर।‘‘ गष्जष्लें हमारी राष्ट्रीय एकता व सांप्रदायिक सद्भावना के लिए महत्वपूर्ण काम कर रही हैं। इसलिए आज निदा फाजष्ली व बशीर बद्र सहित कई बडे शायरों की किताबें देवनागरी में भी आ रही हैं और उनमें हिन्दी उर्दू के अत्यन्त ही सरल सहज शब्द हैं। हाल ही में भारत भवन में उर्दू कविता पाठ पर आयोजित कार्यक्रम मे गुलजार ने हिन्दी उर्दू भाषा पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि-’’हिन्दी और उर्दू को खूबसूरत लहजे हैं। इन दोनों को कश्दम से कश्दम मिलाकर चलते देखना बहुत अच्छा लग रहा है।‘‘ बनाफर चंद्र आज ऐसे गजष्लकार के रूप में हमारे सामने हैं जो जनता को संवेदित करने के साथ ही आन्दोलित करने का भी माद्दा अपनी गजष्लों में रखते हैं। देखें कुछ शेर ः मेरे पेरों में यह जो छाले हैं इन से ही राह में उजाले हैं मौत जब आयेगी तब आयेगी अभी जिन्दा हूं जमाने के लिए बनाफर के शेरों में उन मजदूरों का संघर्ष झलकता है जिनकी जिन्दगी दुःख अभावों और शोषण की दुर्गंध मारते छालों से भरी है और दुनिया इनकी बदौलत ही रोशन है। लेकिन इनका वर्तमाान और भविष्य घोर अंधकार में डूबा है। कुलीन वर्ग की तीखी हिकारतों को नकारते हुए इनका सही मूल्यांकन कोई शायर लेखक ही कर सकता है। बनाफर का यह शेर वास्तविक अर्थों में मेहनतकशों को सम्मान प्रदान करता है। ’’नदी बहती है जब पसीने की, तब कोई रास्ता निकलता है।‘‘ ’’जिसकी खुशबू है मेरे आंगन में, किसी मजदूर का पसीना है।‘‘ या बात करते हो चांद सूरज की वह बहुत दूर का नजषरा है। बनाफर की गष्जष्लों का आवेग क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया में हमें चेतना के तीव्र प्रवाह में इस तरह बहा ले जाता है जिस तरह इसके पूर्व दुष्यंत की गष्जष्लें या उनके बाद के महत्वपूर्ण गष्जष्लकारों की गष्जष्लें हमें आंदोलित कर देती थीं- तुम बनाफर को गौर से देखो लाश अपनी उठा के लाया है। गष्म तुम्हारा है रखलो छुपाकर इसे यह खजाना किसी को बताना नहीं बनाफर की गष्जष्लों में सबसे मुख्य बात है उनका नयापन जो वैचारिक ताजगी से भरा है जैसे कि मजष्हब का सियासत में दाखिल होना और दोस्ती का दुश्मनी में बदलना या आज के सांप्रदायिक माहौल पर बहुत गहरा असर करता है। आज बडे-बडे वक्तव्यों और भारी भरकम लेखों के मुकाबले गष्जष्लें या कभी-कभी तो शेर भी भारी पडते हैं। खासकर किसी जनसमस्या या आन्दोलन के लिए प्रदर्शन करते समूह के नेताओं, वक्ताओं द्वारा अक्सर दुष्यंत का यह शेर सुनते रहे हैं- कौन कहता है कि आसमान में सूराख नहीं हो सकता एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो यह गष्जष्ल जैसी विधा की लोकप्रियता का सबसे बडा प्रमाण है कि सडक का आदमी भी उसे गीत की तरह गुनगुना रहा है। इसलिए इसे भाषा में बांटने वालों को ध्यान से सोचना चाहिए कि वे इस बहस के द्वारा इस लोकप्रिय विधा को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं? क्या वापिस राजमहलों कि ओर....? जबकि गष्जष्ल कितना आगे निकल आयी कि आज उसमें घर-घर की कहानी नजष्र आती है। बनाफर का यह शेर देखें- उसी घर ने किया मुझे बेघर उम्र गुजारी जिसे बसाने में दरअसल हिन्दी और उर्दू बेहद ही करीबी भाषाएं हैं इसलिए हमें यह समझ लेना चाहिए कि उनमें परस्पर आवाजाही स्वाभाविक है। हां लेकिन यहां मुझे यह कहने में भी कोई संकोच नहीं है कि हिन्दी गजष्ल की सबसे बडी विशेषता यह है कि उसने एकदम नये बिंबों को गष्जष्लों में उतारा है और उनका तेवर भी नया है। उससे आज की और अभी की जिंदगी का तनाव और अनुभव निचोडा हुआ मिलता है। यह उर्दू के बहुत ही कम शायरों में दिखेगा। दुष्यंत कुमार ने गजलों को हिन्दी में एकाएक प्रचलित करने का श्रेय इसलिए ही पाया क्योंकि उसमें आक्रोश के सबसे अलग ही तेवर थे। मुझमें रहते हैं करोडों लोग चुप कैसे रहूं। हर गजष्ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है। बनाफर चन्द्र की गजष्लों के बहाने जो भी बातें सामने आयीं है। वह ये कि-बात चाहे हिन्दी गजष्ल की हो या दुष्यंत के शेरों की उन सबका तात्पर्य यही है कि आज समय बदल चुका है। लेकिन आम आदमी को संवेदित, आक्रोशित करती सरल भाषा व इस भाषा में गुनगुनाती, चीरती हुई गजष्ल आज भी लोगों की जरूरत है और बनाफर आज के समय में इस जरूरत को पूरा भी कर रहे हैं व गजष्लों को नया आयाम भी दे रहे हैं। गजष्लकारी की दुनिया एक समुद्र की तरह है और हिन्दी और उर्दू भाषाएं इसमें कहीं कम खारे तो कहीं अधिक खारे पानी की तरह इस तरह घुली मिली हुई हैं कि उन्हें अलग करना गजष्लकारी के समुद्र से उन मोतियों, रत्न को खत्म करने जैसा है जो कि समुद्र के प्रति अथाह चाहत का सजीव आकर्षण है। अर्थात् गजष्लकारी के समुद्र के प्रति लोगों का आकर्षण सजीव लहरों यानी कि विचारों के बदलाव व सहजता से समाहित है। नहीं तो गजष्ल के पुरातन अर्थों में सिर्फ प्रेमिका से बात चीत को ही गजष्ल मानते हुए बिल्कुल इसी तंग अर्थ में गजष्ल विधा राजा महाराजा और रईस-नवाबों के दरबारों में कैद रहा करती थी। वहां गजष्लें तबलों के ठेकों पर सुनाई जाती थी, प्रेम, विरह, मिलन, जवानी, अंगडाई अदा, नाज-नखरों और प्रेमिका के गाल-बालों का उनमें जिक्र होता था। तब गजष्ल में ’’मखमल पर चलने से पैर छिल जाने की‘‘ बातें हुआ करती थ। पुरानी दिल्ली में तो ऐसा कहा जाता था कि एक पडोसिन जवान होती थी तो मुहल्ले में दर गजष्लें कहीं जाती थीं। बनाफर चन्द्र का यह गजष्ल संग्रह ’’चांद सूरज‘‘ हिन्दी-उर्दू भाषा की मिलन सरिता का सरल सहज प्रवाह ही नहीं दर्शाता बल्कि उस विस्तृत मानवीय सौहार्द की भावना का प्रबल समर्थन करता है जिसे हिन्दू मुस्लिम एकता के रूप में स्थापित करने की निरन्तर जागरूक कोशिश की जा रही है। इसलिए ऐसे संग्रहों का स्वागत होना चाहिए, जहां भाषा की मिलन सरिता दो संस्कृतियों, धर्मों और जातियों को जोडने का महत्पूर्ण कार्य कर रही हों। और अंत में बनाफर के हौसलों से भरे दो शेर- जब गजष्ल कोई गुनगुनाता हूं जिन्दगी को करीब पाता हूं होंठ सीने से बेहतर है खोले जुबां आग को आग पानी को पानी कहो। एल.आई.जी.-१९६/२ सी, साकेत नगर, भेल, भोपाल



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