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Vartmaan Sahitya ::February, 2007
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मुखडा एवं अन्य कहानियां ः मूल्यहीनता के प्रतिरोध का कथा-संसार जितेन्द्र कुमार
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’’मुखडा एवं अन्य कहानियां‘‘ डॉ. अरविंद कुमार का दूसरा कहानी संग्रह है, जिसमें उनकी बारह कहानियां संग्रहीत हैं। अरविंद कुमार न टाइम पास के लिए कहानियां लिखते हैं न उन्हें चटक-मटक और मसालेदार भाषा में प्रस्तुत करते हैं। उनकी कहानियों के पात्रा मध्यवित्त परिवारों से आते हैं। उनकी कहानियों में उनका अनुभव जन्य कथा संसार है जिनके कथानायक जीवन की विसंगतियों, विडंबनाओं, लम्पटता, भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता, बेईमानी, मूल्यहीनता का प्रतिरोध करते हुए, जीवन के लिए एक सुरक्षित कोना की तलाश में लहूलुहान होते हैं; हारते हैं, कभी जीतते हैं किन्तु कुंठित होकर प्रतिरोध से किनाराकसी नहीं करते। कथाकार की पैनी दृष्टि अपने कार्यक्षेत्रा के यथार्थ के अन्वेषण से संपृक्त है और उन्हें मनगढंत यथार्थ के सृजन की आवश्यकता नहीं पडती। मिट्टी का घट धूप में सूखने के बाद कुंभकार की आवां की आंच में तपकर सिद्ध होता है। आवां की आग अगर घट को तपाने में असमर्थ है, तो घट का भविष्य क्या होगा। अधपका घट किस काम का? अरविंद कुमार ने बिहार के शिक्षा परिसर के आवां को बहुत करीब से देखा है। वहां अश्लीलता का पुष्प दुर्गंध बिखेर रहा है। उनकी कहानियों की भूमि कॉलेज और विश्वविद्यालय हैं। उसकी अंतरंग गतिविधियां कथाकार को कहानी का कच्चामाल देती हैं। ’’डॉ. शर्मा का पोस्टकार्ड‘‘, ’’आलोडन‘‘ और ’’चबूतरा, सीढयां और नदी‘‘ में विश्व विद्यालय का अंतरंग जीवन है। ’’मुखडा‘‘ कहानी में कथाकार ने शैक्षिक पर्यावरण को प्रदूषित और विनष्ट करने वाले शिक्षा के धुरंधरों के काले चेहरों को उजागर किया है। भारतीय परम्परा में गुरु पिता सदृश्य है। नहीं, वह साक्षात ब्रह्म है। ब्रह्मस्वरूप है। लेकिन ’’मुखडा‘‘ में शोध छात्राा दीपिका से मौखिकी के समय विभागाध्यक्ष डॉ. सिंह का प्रश्न है ः ’’आपकी डॉक्टरी का जश्न कब होगा?‘‘ एक अन्य गुरु एक कदम और आगे बढते हैं ः ’’कृष्णा सोबती देह-दर्शन की रचनाकार हैं। बताइस यह तन की रीति क्या है?‘‘ शोध का विषय है कृष्णा सोबती की रचनाओं की भाषा और प्रोफेसर साहब प्रश्न पूछ रहे हैं तन की रीति क्या है। गनीमत है कि ऐसे बेतुके प्रश्नों का विरोध मौखिकी में उपस्थित अन्य महिला प्रोफेसर करती हैं। लेकिन इस विरोध के लिए डॉ. सिंह उन्हें चेतावनी भी देते हैं। ’’आलोडन‘‘ की कथाभूमि भी विश्वविद्यालय ही है। शिक्षा माफिया का एक चेहरा यहां डॉ. ठाकुर हैं जिनका शिक्षा से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं है। लेकिन जातिवाद और भाई-भतीजावाद के रोग से ग्रस्त शिक्षा तंत्रा में विभागाध्यक्ष बनने के सुअवसर उपलब्ध हैं उनके लिए। गुटबाजी ऐसी कि अवकाश ग्रहण करने वाले प्राध्यापक मित्राों को पेंशनरी सुविधाओं के मिलने में अडंगा डालने में उन्हें कोई संकोच नहीं। विदाई समारोह में छद्म प्रशंसा करने से नहीं चूकते। विरोध और प्रतिरोध का असंगठित स्वतःस्फूर्त क्षीण स्वर डॉ. चौबे और डॉ. संध्या के रूप में है। एक छात्रा भी विरोध में आता है। असंगठित प्रतिरोध इसलिए है कि बुद्धिजीवियों को संगठित लोहे के चने चबाना है। फिर उनके स्वार्थ की धुरी अपनी ओर झुकी होती है। वे दूसरों के मामलों में पडना नहीं चाहते। ’’डॉ. शर्मा का पोस्टकार्ड‘‘ में भी एक प्रोफेसर साहब हैं। वे साहित्यिक पत्राकारिता में भी रसूख रखते हैं। शोध छात्रा-छात्रााओं का साक्षत्कार लेते हैं यूनिवर्सिटियों में। स्वाभाविक है कि साहित्य सृजन से जिन्हें यश अर्जन की तृष्णा है, वे प्रोफेसर शर्मा की सेवा तन-मन-धन से करते हैं। एक प्रोफेसर की पत्नी शीला साहित्य सृजन के क्षेत्रा में प्रवेश चाहती हैं। डॉ. शर्मा उनका आमंत्राण स्वीकार करते हैं। शीला उन्हें अपनी कहानी सुनाती हैं। शर्मा अपने शहर लौटते हैं। शीला को पोस्टकार्ड लिखते हैं कहानी भेज देने के लिए। साहित्यिक पत्राकारिता में कविताएं कहानियां व्यक्तिगत संबंधों पर छपती हैं। संग्रह की अंतिम कहानी ’’चबूतरा, सीढयां और नदी‘ प्रोफेसर आनंद और प्रो. अर्चना की रोमांस कथा ही है। वे पुराने प्रेमी हैं। अर्चना पी-एच. डी. करना चाहती है। डॉ. आनंद सहायक हो सकते हैं। विश्वविद्यालय परिसर का यह भी एक अंतरंग परिचय है। विश्वविद्यालय परिसर के बाहर साम्प्रदायिकता जैसे मसलों पर शिक्षक की भूमिका तटस्थता और निष्क्रियता की है। कोई कारगर हस्तक्षेप नहीं है। साम्प्रदायिकता के खिलाफ संग्रह में एक कहानी है ः ’’दीवार‘‘। ’’माधव सदन‘‘ की गली होकर अकबरपुर निवासी अल्पसंख्यक समुदाय के लोग शहर में आते जाते हैं। कुछ संकीर्णतावादी गली के मुहाने पर दीवार खडी कर देना चाहते हैं। शिक्षक सर की भूमिका साम्प्रदायिकता के खिलाफ है। ’’सुजाता नर्सिंग होम‘‘ की संचालक डॉ. मिश्रा दलालों के माध्यम से रोगियों को ठगते हैं। बल्कि नर्सिंग होम में काम करने वाले कर्मचारियों और अन्य चिकित्सकों को भी न्यायपूर्ण वेतन-मजदूरी आदि नहीं देते। डॉ. शशि श्रीवास्तव नर्सिंग होम के संचालक चिकित्सक के अनैतिक कार्यों का विरोध करती है। अन्याय अत्याचार भ्रष्टाचार गुंडागर्दी के जहरीले पौधे-चतुर्दिक पारथेनियम की तरह लहलहा रहे हैं। रेलगाडी में किसी लडकी की यात्राा निरापद नहीं रही। गुंडे दलबांधकर खुलेआम छेडखानी करते हैं। रेलगाडी के सहयात्राी मूक दर्शक बने रहते हैं। सुरक्षा के लिए तैनात सिपाही निष्क्रिय बने रहते हैं। संवेदनहीन समय में कम से कम एक यात्राी प्रतिरोध करता है। गुंडो से मारखाकर अगले स्टेशन पर उतर जाता है, पर उसकी चेतना जगती है और प्रतिरोध के लिए रेलगाडी पर पुनः सवार हो जाता है। दुर्भाग्य है कि कहानी का अंत यहीं हो जाता है। कहानी अभी आरंभ ही हुई थी। ’’आतंक के बीच‘‘ कहानी रेलयात्राा की कुव्यवस्था की कथा है। पुलिस वाले रेलयात्राा में यात्रिायों को संगठित गुंडों की तरह परेशान करते हैं। मुश्किल यह है कि इस कहानी में परेशान होने वाले यात्राी एक प्रोफेसर ही हैं। उनके पक्ष में एक सहयात्राी पुलिस की ज्यादती का विरेाध करता है। पुलिस अन्य पुलिसकर्मियों को बुला लेता है और वे उस सहयात्राी पर पिल पडते हैं। विडंबना यह है कि प्रोफेसर साहब जिनके लिए झगडा आरंभ हुआ एक बुद्धिजीवी की तरह चुप्पी साध लेते हैं।‘‘ ’’प्रश्न‘‘ कहानी घरेलू नौकर के प्रति एक नौकरशाह मालिक के अमानवीय व्यवहार की कथा है। इस कहानी में भी एक चरित्रा है जो पेशे से शिक्षक है। वह नौकरशाह मालिक का मित्रा है और उसी के घर में रहता है। नौकर रामू मंडल उनकी भी सेवा करता है। शिक्षक महोदय रामू मंडल पर नौकरशाह मित्रा के दुर्व्यवहार और अत्याचार के प्रति निःसंग बने रहते हैं। रामू मंडल भागकर होटल में नौकर हो जाता है। शिक्षक अक्समात् रामू से मिलते हैं तो उसे स्मृतियों में ले जाना चाहते हैं जैसे कि होटल में नौकर होने से घरेलू नौकर रहना ज्यादा अच्छा है। ’’मौत जो इस शिखर के लिए थी‘‘ एक अधेड स्त्राी के प्रेमजाल में पडे एक युवा कवि की त्राासद कथा है जो प्रेमछल में अपनी अनेक कविताओं को उस अधेड स्त्राी के नाम छपवा देता है। भ्रष्टाचार के दर्शन तो भगवान की तरह सर्वत्रा होते हैं। राज्य खाद्य निगम कोई अपवाद नहीं है। लेकिन घटनाएं जब संभावनाओं के खिलाफ घटित हो जाती हैं, तब कहानी की जमीन मिल जाती है। राज्य खाद्य निगम के सहायक प्रबंधक राजेश सहाय खाद्य निगम की भ्रष्ट व्यवस्था में अपने को समायाजित न कर त्यागपत्रा देने का निर्णय लेते हैं। अरविंद कुमार की कथा भाषा साफ सुथरी और बिना तामझाम वाली है। वे कथा के लिए प्रायः रिपोर्ताज और संस्करण की शैली अपनाते हैं। जीवन की सच्ची अनुभूतियों को कथा के रूप में प्रस्तुत करने के लिए एक हद तक उन पर दवाब भी रहता है। उनके कथा नायक व्यवस्था और संस्था में फैले भ्रष्टाचार, चरित्राहीनता, संवेदनहीनता और अश्लीलता का प्रतिरोध करते हैं। उनकी कहानिय में यही स्वर अन्त र्ध्वनित होता है जो उन्हें मूल्यपरक बनाता है। मदन जी का हाता, आरा-८०२३०१ (बिहार)



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