गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव, प्रतिबद्ध, दृष्टि सम्पन्न और सामाजिक सरोकारों के लेखक हैं। अपने समय के यथार्थ पर उनकी गहरी नजष्र है। उनकी कहानियां दुःख पीडा और आक्रोश से लबरेजष् हैं। यह कहानियां पाठक के भीतर उम्मीद जगाती है कि इस घने अंधेरे में भी इंसानितय बची हुई है। इंसान विषम परिस्थितियों के बावजूद फिर भी जिष्न्दा है। साहित्य सृजन के साथ ’निष्कर्ष‘ जैसी स्तरीय पत्रिाका के संपादन और प्रकाशन की जिष्न्दगी, सांस्कृतिक मंचों पर उम्र और स्वास्थय की परवाह न करते हुये सक्रिय उपस्थिति। उन्हीं का दम ख्ाम है। रश्क होता है। ’सपने का सच‘ गिरीश जी का दूसरा कथा-संग्रह है। जिसमें कुल १४ कहानियां संग्रहीत हैं। इसमें से छः कहानियां रेलवे के लेखा विभाग में कार्यरत बाबुओं और अधिकारियों की पृष्ठभूमि पर लिखी गई हैं और तीन कहानियां महाविद्यालयों के प्रवक्ताओं को केन्द्र में रखकर लिखी गई हैं। उल्लेखनीय है कि लेखक स्वयं रेलवे के लेखाविभाग में अपरलिपिक के पद पर कार्यरत रहे हैं फिर अंग्रेजी के प्रवक्ता होकर सुल्तानपुर डिग्री कालेज में चले गये। यही वजह है कि बाबुओं और महाविद्यालयों की प्रवक्ताओं की मानसिकता, उनकी महत्वाकांक्षा, दब्बूपन, नैतिक पतन तथा किरदार की बुलन्दी, स्टस कांशस्नेस तथा उनकी सामाजिक, आर्थिक स्थितियों और मौकापरस्ती, गरजष् कि उनके परिवेश से वे भलीभांति वाकिफश् हैं। यही करण है कि कहानियां प्रामाणिक और विश्वसनीय लगती हैं। किसी संग्रह में यदि एक या दो कहानी भी स्तरीय होती है तो वह संग्रह महत्वपूर्ण हो जाता है। इस संग्रेह की यूं तो सभी कहानियों में छिपे तंज के नश्तर पाठक के दिल में गहरे तक उतर जाते हैं, पर ’एक वाजिब आदमी‘, ’फैसला‘, ’मुर्दा चेहरों के बीच‘, और ’सपने का सच‘ खासतौर से उल्लेखनीय है। जिसे किसी भी अच्छी कहानी के समकक्ष रखा जा सकता है। संग्रह की पहली कहानी ’एक वाजिब आदमी‘ का मुख्य पात्रा वाहिद मियां जो बहुत वाजिब और ईमानदार आदमी है। उनके माध्यम से बहुत कम शब्दों में बहुत कुछ कहने में यह कहानी सफल है। संवेदनहीन व्यवस्था, भ्रष्टप्रशासन पर कहानी बहुत गहरे तक चोट करती है। ’फैसला‘ महाविद्यालयों में उच्च शिक्षा प्राप्त करती छात्रााओं में उपजती साम्प्रदायिक भावना, उनकी कुत्सित मानसिकता तथा धर्म और राजनीति की गन्दी राजनीति का यह कहानी बडी कुशलतापूर्वक पर्दाफाश करती है। इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद देशभर में सिखों के कत्लेआम की पृष्ठाभूमि पर लिखी यह कहानी कई सवाल उठाती है। यह कहानी एक तरफ छात्रााओं में उपजती साम्प्रदायिक भावना और राजनीतिज्ञों द्वारा दंगे भडका कर बेगुनाहों की लाश पर की जाने वाली राजनीति की परंपरा पर प्रहार करती है, वहीं, ’भागो मत, समाज को बदल दो, का सन्देश भी देने में सफल है। कहानी की सरलता, सहजता और संवेदनशील बुनावट सराहनीय है। ’सपने का सच‘ में श्रीकान्त एक अल्प वेतन भोगी रेलवे कर्मचारी है। यह कहानी सपने से शुरू होती है, जिसमें वह देखता है कि कर्मचारी संघ का सेक्रेटरी, उससे कर्मचारी संघ का सदस्य बनने का आग्रह करता है। श्रीकान्त संगठन को निरर्थक और फालतू मानता है। कर्मचारी संघ का सेक्रेटरी विनायक उसे दलीलों के साथ संगठन की अहमियत को समझाता है। ’सपने का सच‘ एक जुटता की सबसे बडी ताकत है। ’’जब तक वह अकेला है, कमजषेर और आतंकित ही महसूस करेगा।‘‘ वह चाहे मजदूर हों या किसान या आम जनता एकजुटता ही शोषण, अत्याचार से सुरक्षित रख सकते हैं। न कोई लफ्फशजी और न नारा बाजषी, बडे सरल और स्वाभाविक ढंग से यह कहानी अपनी बात कहने में कामयाब है। सोद्देश कहानियां लिखना वह भी कलात्मकता के साथ कठिन काम है। गिरीश जी ने जितनी सजगता से यह कहानी लिखी है सराहनीय है। संग्रह में दो कहानियां रेलवे के लेखाविभाग के उच्चाधिकारियों का केन्द्र में रखकर लिखी गई हैं। ’मुर्दा चेहरों के बीच‘ कहानी, उच्चाधिकारियों की सामन्ती मानसिकता को दर्शाती है। दफ्तरों में ई.वी० टेस्ट एक साधारण सी प्रक्रिया होती है जिसमें निकम्मे, कामचोर, सभी बाबुओं के पास कर दिया जाता है। लेकिन दीनानाथ शर्मा जो काफी पढा लिखा है। अपने काम के प्रति काफशी ईमानदार अपने पोर्शन के अलावा दूसरे पोर्शन का भी काम कर देता है। दफ्तर के साथ ही नहीं सेक्शन अफसर भी उसकी योग्यता के प्रशसंक हैं। इस सब के बावजूद अधिकारी उसे ई.वी० टेस्ट में इसलिये फेल कर देता है कि वह उनके सामने नजष्रे नीचे करके डरा-सहमा और दब्बू क्लर्कों की तरह नहीं है। हर प्रश्न का बेबाकी से जवाब देता है। हद हो गई कि उनके द्वारा अंग्रेजी में पूछे गये प्रश्न का उत्तर अंग्रेजी में देता है, परम्परागत क्लर्क से मिल उसकी छवि उन्हें बर्दाश्त नहंी होती। उनका सामन्ती संस्कार उसके स्वाभिमान को तोडने तथा नीचा दिखाने के लिए उसे फेल कर देता है। पूरा दफ्तर अधिकारी के निर्णय पर हतप्रभ है। सभी साथी तथा सेक्शन अफश्सर भी उसे सलाह देते हैं। कि वह अभी जाकर अधिकारी से माफशी मांगले। सब ठीक हो जायेगा। लेकिन वह साफश् इंकार कर देता है। ’’अपनी कुर्सी पर बैठते ही उसने पूरे सेक्शन पर सरसरी नजष्र डाली और बुदबुदाया ’मुर्दे कहीं के‘ एक छोटे से वाक्य में छुपा दर्द और आक्रोश बहुत कुछ कह जाता है। यही रचनाकार की सबसे बडी खूबी है। अधिकारियों को केन्द्र में रखकर दूसरी कहानी है ’तोहफा‘। स्टोर्स डिपार्टेन्ट के लेखा अधिकारी लाल साहब एक्सटेंशन न मिलने के कारण बहुत फिक्रमन्द हैं और क्षुब्ध भी। अपनी बडी लडकी की ही तरह छोटी लडकी की भी शादी शान-शौकत से करने की तमन्ना तो है ही लगता था एक साल के अन्दर अन्य सारी सुविधायें छिन जायेंगी। पेंशन के पैसों से घर का बढा हुआ खर्च चलाना बहुत कठिन होगा। इस बचे हुये समय में वह ज्यादा से ज्यादा पैसे और तोहफे जुटाने के अभियान में लग जाते हैं। ठेकेदार का बिल उसी दिन पास करने के लिये वह सेक्शन अधिकारी पर दबाब डालते हैं। सेक्शन अधिकारी एक दिन का और मौका चाहता है, लेकिन वह चेतावनी भरे स्वर में यह कहते हुए अपने चैम्बर में चले जाते हैं कि जैसे भी हो, इस बिल को आज ही पास होना चाहिये। अनुभाग अधिकारी डीलिंग क्लर्क पर दबाब डालता है, लेकिन बाबू साफ इंकार कर देता है कि बिना सारे बिलों को सफाई बाउचर से वेरीफाई किये वह आंख बन्द करके बिल को पास नहीं कर सकता। वह कोई रिस्क नहीं ले सकता। बडे बाबू की धमकी, साहब के गुस्से से वह नहीं दबता वह अपनी बात पर दृढ है। हर अंजाम भुगतने को तैयार है। बडे अधिकारियों की साये में पनपते भ्रष्टाचार और ईमानदारी बाबुओं की पीडा को यह कहानी पुरअसर अन्दाज में कहने में सफल है। ’स्टेटस वाले‘, ’झूठा बयान‘, ’दुविधाग्रस्त‘ महाविद्यालयों के प्रवक्ताओं के जीवन पर आधारित कहानियां हैं। स्टेटस वाले प्रवक्ताओं की हिपोक्रेसी, उनका झूठी शान और जातीय गुटबाजी को दर्शाती है। वहीं ’झूठा बयान‘ में महाविद्यालयों के मेनैजर प्रिंसिपल की मिली भगत से प्रवक्ताओं को तंग करने, उत्पीडत किये जाने की दास्तान है। प्रवक्ताओं का वह गुट जो प्रिंसिपल का विरोधी है, उसे सबक सिखाने के लिये प्रोबेशन पर काम रहे प्रवक्ता को प्रिंसिपल आतंकित करके झूठा बयान दिलवाना चाहता है। उसे नौकरी से निकाले जाने पर डर दिखाकर भयाक्रान्त करता है। लेकिन राज लगन (प्रवक्ता) साफ इंकार कर देता है। गिरीश जी की कहानियों की यही विशेषता है कि हर हाल में वह हार न मानने का हौसला देती है। इंसानियत बडी चीजष् है, उसे कोई मार नहीं सकता। ’आगंतुक‘ मेरे ख्याल में संग्रह की कमजषेर कहानी है। एक ईमानदार, विकलांग रेलवे गार्ड बीस वर्ष की सेवा के बाद भी सी-ग्रेड में ही रह जाता है और उसके चापलूस किस्म के निकम्मे साथी ’बी‘ और ’ए‘ ग्रेड के ’गार्ड‘ की पदोन्नति पा जाते हैं। उससे वह फरस्टेट हो जाता है और नौकरी से त्यागपत्रा देकर नये सिरे से संघर्ष करने की बात करता है। ’भय‘ पिएकारों की बस्ती है, जहां बडी संख्या में जरायम-पेशा, नशेडी और अड्डेबाज किस्म के लोग रहते हैं। पुलिस और राजनीतिज्ञों से साये में पनपते जरायम का यह कहानी खुलासा करती है। ’पिक्चर‘, ’बेबस‘, ’वापसी‘, ’खाली दराजा‘ यह सभी कहानियां रेलवे बाबुओं की आर्थिक तंगी, डर, दब्बूपन, बोल्डनेस, झूठे अहंकार, मध्यवर्गीय मानसिकता को रेखांकित करती है। ’खाली दराजष्‘ में दोस्त की बीमार पत्नी के बाहर इलाज के लिये पत्नी का जेवर बेचना बडी बात है। इसे आप आदर्शवादी कहानी कह सकते हैं, लेकिन क्या यह दुनिया ऐसे लोगों से खाली है। ’दुविधाग्रस्त‘ महंगाई भत्ता और वेतन वृद्धि के लिये आन्दोलनरत महाविद्यालय के लेक्चरर्स संघर्ष तेजष् करने और प्रशासन पर दबाब डालने के लिये लखनऊ जाने का प्रोग्राम बनाते हैं। प्रियकान्त ही की तरह अन्य प्रवक्ता भी जाने-न जाने की दुविधा में पडे हैं। प्रियकान्त बीमारी, ठण्ड को दरकिनार करके बहुत सबेरे वायदे के मुताबिक बस स्टेशन पर पहुंच जाते हैं, लेकिन वहां बस छूटने का समय हो जाने के बावजूद वह काफी चिन्तित है। इस तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग की लिजलिजी मानसिकता का अच्छा चित्राण हुआ है। संक्षेप में कहूं तो यह कहानियां कथानक के नयेपन, संवदेनात्मक बुनावट, भाषा की सरलता तथा उनकी विश्वसनीयता और पठनीयता सराहनीय है। इस भयानक दौर में भी मानवता के प्रति विश्वास जगाती संग्रह की कहानियां रचनाकार के सामाजिक सरोकारों को रेखांकित करती है। बख्तियार मुहल्ला (भरपुरवा), गोरखपुर-२७३००१ (उ.प्र.)
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