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Vartmaan Sahitya ::February, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner पथदंश ः संस्कृति और विकृति का मुहावरा गढती लेखनी
रामकली सर्राफ
कहानी यदि घटनात्मक संवेदनाओं की अभिव्यक्ति है तो ऐसी घटनाओं का एक भरापूरा संसार निर्भय मल्लिक की कहानियों में उपलब्ध है। रचना-कर्म से निर्भय मल्लिक का पुराना रिश्ता है। सातवें दशक में चर्चा के केन्द्र में आए निर्भय मल्लिक उसके कुछ पहले से ही लिखते रहे हैं। प्रत्येक कहानी जीवन और समाज की किसी न किसी समस्या से जुडी है। समाज की दशा और दिशा को लेकर सदा चिन्तित रहने वाले निर्भय मल्लिक बेहद भावुक तथा संवेदनशील हैं। उनकी पैनी दृष्टि हर छोटी-बडी घटना पर रहती है। इसका साक्ष्य है, उनका कहानी-संकलन भैरवपुर की पाठशाला तथा अन्य कहानियां कहानियां किसी दशक की नहीं हैं और न ही वे किसी दशक के प्रतिनिधि कहानीकार हैं। उनकी कहानियों का संसार निम्न मध्य वर्ग तथा निम्न वर्ग है। मल्लिक जी ने देश का व्यापक भ्रमण किया है। उनके पास अनुभवों का समृद्ध भंडार है। परन्तु कहानियां बिहार और पश्चिम बंगाल के जन-जीवन से संबंधित हैं। मल्लिकजी घटनात्मक स्थितियों के माध्यम से अपनी बात शुरू करते हैं और उन्हें एक तारकिक परिणति तक ले जाते हैं। नक्सल आन्दोलन के प्रति उनका रोमांटिक लगाव है। नक्सल आन्दोलन तथा नक्सली युवकों के जीवन की घटनाओं का रसपूर्ण अवगाहन उनकी कहानियों में हुआ है। प्रत्येक कहानी किसी न किसी घटना से संबंधित है, बनते-बिगडते रिश्ते, टूटते-बिखरते पारिवारिक संबंध, बेकार युवक-युवतियां, आमलोगों के जीवन की परेशानियां, सामाजिक समस्याएं, शहरों का तनावपूर्ण जीवन, युवक-युवतियों का असन्तोष-आकर्ोश, गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, नक्सल आन्दोलन की समस्याएं कहानी का केन्द्र बिन्दु हैं। भैरवपुर की पाठशाला जोरदार ऐसी ही कहानी है। इस कहानी के माध्यम से कहानीकार ने तंत्रा की निष्करियता और निठल्लापन पर करारा व्यंग्य किया है। कलकत्ता कारपोरेशन में ऐसे अनेक कर्मचारी हैं जो कब के दिवंगत हो चुके। परन्तु कुछ को अभी भी वेतन और कुछ को विधिवत् पेंशन मिलती है। भैरवपुर गांव बाढ में बह गया, सारे लोग बह-बिला गये पर, पाठशाला कायम है और शिक्षक मृत बच्चों की आत्माओं को पढाते हैं जो भूत बनकर कक्षा में पढने आते हैं। अड्डा कहानी बंगालियों की अड्डा मारने की प्रवृत्ति से संबंधित है। अड्डा बंगाली संस्कृति का विशेष अंग है। अड्डा का तात्पर्य किसी एक जगह बैठ कर घंटों गपशप करना है। यह जगह विशेष रूप से चायघर अथवा काफी हाउस हो सकती है। नटवर चरित-प्रधान कहानी है। इसके माध्यम से गांव-गिरांव की जीवन-शैली का जायजा लिया गया है। बलडोजर विकास के नाम पर सरकार की उच्छेदवादी प्रवृत्ति को उजागर करती है। मुक्तिसंग्राम नक्सल आन्दोलन पर केन्दि्रत है। नक्सली-युवकों पर पुलिसियाअत्याचार का बेधक वर्णन इस कहानी में हुआ है। मालविका प्रेम कहानी है। एक भटके हुए युवक की प्रेम कहानी-मालविका का प्रेमी प्रेमिका के घर की तलाश में खो जाता है। कहानीकार संभवतः यह बताना चाहता है कि प्रेम में मंजिल की तलाश व्यर्थ है। प्रेम की राह पर चलते जाना ही वास्तविक प्रेम है। चित्राांकन एक चित्राकार के जीवन की व्यथा-कथा है। बाढ, सूखा, भूकम्प, अतिवृष्टि के अवसरों पर नेताओं, मंत्रिायों और उनके चमचों की खूब बन आती है। सरकार से प्राप्त होने वाली राशि की बन्दर-बांट होती है। चमचे रूपया-पैसा उदरस्थ कर जाते हैं। जरूरतमंदों तक वह राशि कभी नहीं पहुंचती। सुखिया एक साहसी विकलांग महिला के जीवन-संघर्ष को बयां करती है। पाडे के कुछ मस्तान पूजा के नाम पर सुखिया की जमीन के छोटे से टुकडे को हडपना चाहते हैं। सुखिया मस्तानों से भिड जाती है और उन्हें मार भगाती है। कुछ युवक ’बुधन सरदार‘ के घर में घुस जाते हैं। वृद्ध दम्पति से आत्मीयता कायम कर लेते हैं। फिर उन्ह रस्सी से बांधकर रूपया-पैसा, गहना-गुडया लेकर चमपत हो जाते हैं। चोरी-डकैती का यह नया रूप है। रेशमी कहानी परिस्थितियों की मारी एक ऐसी युवती की दास्तान है जिसे पुरुषों के भेडया-समाज से नफरत है। वह अपनी इज्जत बचाते हुए किसी तरह सपेरों के पास चली जाती है और सपेरिन बन जाती है। सपेरों के साथ रहते हुए वह अपने को सुरक्षित महसूस करती है। सभ्य समाज की तुलना में सपेरों का समाज उसे अच्छा लगता है। रेशमी की दृष्टि में मनुष्य संापों से अधिक जहरीले हैं। मास्टर साहब एक चरित-प्रधान कहानी है। दंगे से भयभीत एक मुस्लिम युवक मास्टर साहब के घर में घुस जाता है। चारों ओर तनाव का माहौल है। मास्टर साहब का लडका दवा के लिए बाहर गया हुआ है। फिर भी मास्टर साहब उस युवक को घर में छिपा लेते हैं और दंगाई युवकों से उसके प्राण की रक्षा करते हैं। नर्स भी एक आदर्श महिला की कहानी है। नर्स के बेटे का हत्यारा पुलिस अधिकारी अस्पताल में भर्ती है। बिन्दु रमा (नर्स) को जहर देकर मार देने के लिए उकसाती है। रमा तैयार हो जाती है। परन्तु अंततः वह ऐसा नहीं करती। जहर से भरी सीरिंज को खिडकी के बाहर फेंक देती है और एक आदर्श नर्स की भूमिका निभाती है। हेमू और हादसा भी चरित प्रधान कहानियां हैं। ये कहानियां जीवन के नैतिक-पक्षों से जुडी हैं। डाबू एक भिखारी बच्चे की कहानी है। डाबू मर जाता है। ललिता डाबू का संस्कार नहीं करती। मरी हुई लाश को लेकर सियालदह स्टेशन पर बैठ जाती है। लोगों से काफी रूपया-पैसा उगाहती है। डाबू मरकर ललिता को मालामाल कर देता है। ललिता डाबू की लाश का व्यवसाय करती है। दारोगा चंडीचरण एक निर्दय पुलिस अधिकारी है। गरीबों की झोपडी-झुग्गियों को उजाडने में तनिक भी देर नहीं करता। दारोगा का मकान नगरपालिका की जमीन पर बना है। नगरपालिका के लोग अब उसका मकान गिराने लगते हैं तो दारोगा के पांव के नीचे की जमीन सरकने लगती है। फिर भी वह गरीबों पर अत्याचार बंद नहीं करता। इस बीच पत्थर का एक टुकडा उसके सिर पर लगता है और वह गिर कर मूर्छित हो जाता है। संवेदना लेखक की पहली शर्त है। संवेदनशील तो सभी होते हैं, पर लेखक संवेदनशील होने के साथ ही भावुक भी होता है। एक पगली औरत की मृत्यु लेखक विजय की चेतना को झकझोर देती है। किसी ट्रक द्वारा कुचले जाने का पगली का दृश्य वह अपनी नंगी आंखों से देखता है और मर्माहत हो जाता है। उसका मानसिक संतुलन बिगड जाता है। सडक पर फैला पगली का लाल खून उसे विचलित कर देता है। जब भी वह कुछ लिखने को प्रस्तुत होता है , पगली के कुचले जाने का वह दृश्य उसके सामने उपस्थित हो जाता है और वह उद्विग्न हो उठता है। बहुत दिनों बाद ही लेखक विजय समान्य हो पाता है। जतुगृह तथा शाम हो गयी आर्थिक तंगी, फटेहाली से पीडत उन बेरोजगार युवकों की कहानियां हैं जो आन्दोलन करते हैं और पुलिसिया अत्याचार के शिकार होते हैं। उपर्युक्त दोनों कहानियां नक्सल आन्दोलन के परिप्रेक्ष्य में लिखी गयी हैं। इसी प्रकार बबुआ एक संघर्षशील आदर्शवादी युवक की कहानी है। बबुआ के मित्रा उसे मिट जाने से बचा लेते हैं। मित्राता निर्वाह की यह विरल कहानी है। ऐसे उदाहरण आजकल विरल हैं। मेरे बाबूजी टूटते-बिखरते परिवार की मार्मिक कहानी है। ’स्त्राी‘ क्यों घर की लक्ष्मी कहलाती है-यह इस कहानी से स्पष्ट है। यह कहानी पश्चिमी समाज से भारतीय समाजों की भिन्नता दर्शाती है। घर-परिवार संभालना स्त्राी का दायित्व है। स्त्राी के न रहने पर पुरुष आधा मर जाता है। मां की अचानक मृत्यु पर बेटी सावित्राी अपने अर्द्ध विक्षिप्त पिता को मां की भूमिका में उतार कर संभाल लेती है। इस प्रकार वह टूट चुके पिता को बचा लेती है। रामू एक हाथी के बालक-प्रेम की कहानी है। पशुओं में भी संवेदना होती है। उनका भी हृदय पसीजता है। खूंखार हाथी बालक रामू के बीमार पडने पर प्रतिदिन उसके घर आता है और यह सिलसिला बालक रामू के ठीक न हो जाने तक चलता है। नया प्रजन्म संतालों और जमींदारों के संघर्ष की कहानी है। किसान को अपनी जमीन से बेहद लगाव होता है। किसी भी कीमत पर वह अपनी जमीन की रक्षा करता है। किसानों में भूमि-मोह पुत्रा-मोह से भी अधिक होता है। आलोच्य संग्रह की कहानियां भारतीय समाज के विभिन्न पहलुओं से पाठकों रू-ब-रू कराती हैं। एक यथार्थवादी रचनाकार का आग्रह जीवन के यथार्थ से मुठभेड करते हुए अपने समय के ज्वलंत सवालों से टकराना होता है। चरित्राों के रूपांकन में निर्भयजी को महारत हासिल है। मल्लिकजी चिरन्तन सत्य के फेर में नहीं रहते। जीवन का वर्तमान ही उनकी कहानियों का अभिप्रेत है। सीमित भाव-भूमियों के कहानीकार नहीं हैं निर्भय मल्लिक। स्वातंत्रा्योत्तर भारतीय सामाजिक जीवन के यथार्थ और उसके विविध पक्षों का उद्घाटन उनकी कहानियों में जमकर हुआ है। कहानियां वर्तमान जीवन-परिवेश के दबावों में बनते-बिगडते सामाजिक पहलू, मानवीय संबंध, पारिवारिक रिश्ते, जीवन-मूल्य तथा राजनीति और समाजनीति के समीकरणों को विविध रूपों में तराशती हैं। द्वारा-छपते-छपते, किर्ीको रोड, कोलकाता
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