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बहुत मार्मिक उपन्यास है ’गिलिगडु‘। गिलिगडु यानि नन्हीं चिडया। चिडयां जो प्रतीक हैं, ताजगी की, जीवंतता की, जिनके चहचहाने में जीवन की जोशीली हलचल है, जिनके समवेत कलरव में जीवन-संगीत के सातों स्वर, सात सुखों के अनेक राग-रागनियों में झंकृत हो उठते हैं। चिडयां जो प्रतीक हैं रवानगी की, स्वच्छंदता की, भावनाओं की ऊंची उडान की, निर्दोष नैसर्गिक सौंदर्य की, स्वतंत्राता की। शरीर जीवन का पिंजरा है। जिसमें आत्मा की गिलिगडु बसती है, जो शरीर पिंजर में निबद्ध होते हुए भी चौदह भुवनों की, असीम की यात्राा करने में सक्षम है। जो शरीर के शैशव के साथ खेलती है। युवावस्था के साथ पुरुषार्थों को सिद्ध करती हुई जग जीत लेने का हौसाला रखती है, एक से अनेक होकर पितृऋण, समाजऋण चुकाती है, सृष्टि संचालन को अग्रसरित करती है। दायित्वपूर्ण करती है घर के समाज के.... और चौथेपन में, जीवन की संध्या में हर तरफ निश्चिंत हो जाती है घर, परिवार संतानों के दायित्वपूर्ति से तो दूसरी तरफ अतिरिक्त संवेदनशील हो जाती है, अपेक्षाकृत अधिक ध्यानाकर्षण चाहती है अपने रिक्तताबोध एवं आयुर्वार्धक्य के कारण। मुक्त होना चाहती है रिक्तता के मृत्युतुल्य बोध से। मरने की चिंता नहीं करनी रिटायर्ड सिविल इंजीनियर जसवंत सिंह को भले ’फ्लू‘ हो या चाहे कुछ और हो। कर्नल स्वामी भी तो चिंता नहंी करते बल्कि उनके जैसा खिलंदडा जीवंत बुजुर्ग नहीं देखा जसवंत ने। दोनों ने खूब पटती है। जैसे सद्यः परिचित मार्निंग वॉकर साथी न होकर वे युगों से एक-दूसरे के घनिष्ठ मित्रा रहे हों, जैसे उनकी मित्राता अब की न होकर बहुत पुरानी हो....। अभी दिल्ली आये समय ही कितना हुआ जसवंत को जुमा-जुमा कुल बारह पन्द्रह दिन। बेटे की घर गृहस्थी में रहने आये हैं अब इस उमर में। सेवानिवृत्त हैं, पत्नी नहीं रहीं। कानुपर में अकेले कब, कैसे, किसके सहारे रहें, सो स्वजनों की सम्मति से अब बेटे बहू के पास आ गये हैं। पर मन नहीं लगता बिल्कुल बंधे-बंधे से होकर रह गये हैं, यहां सीमित दायरे में। दिल्ली लाख अल्कापुरी के वैभव और शानोशौकत से युक्त हो लेकिन उन्हें बांध न पाई, रह-रह कर उन्हें ’अपने कानपुर‘ की याद तडपाती रहती है। यह कसक दबाये नहीं दबती। सबके लिये भले चाहे कानपुर गंदा, बुरा, बैकवर्ड हो लेकिन जसवंत के लिये आंखों का तारा है। यहां जिन अपनों के सहारे आये थे, वे तो बिराने देश की तरह बेगाने निकल गये। नरेन्द्र ड्यूटी चला जाता है, बहू को ’अनचाहे मेहमान‘ ससुर में कोई अनुरक्ति नहीं। पोते हैं, लेकिन उनके पास और भी गम हैं, दादू के सिवा। पर जसवंत हैं कि उपेक्षा, तिरस्कार के बावजूद बेटे के साथ एडजस्ट होना चाहते हैं, उसके काम में सहयोग देना चाहते हैं। तभी तो टॉमी को टहला, फारिग कराकर निहाल हैं। ‘‘चलो बेटे बहू ने टॉमी की जिम्मेदारी सौंप कर उन्हें अपनी गृहस्थी की किसी जिम्मेदारी के काबिल तो समझा। अब तो उन्हें यह भी लगने लगा कि इस घर में सही अर्थों में किसी के लिये बुजुर्ग हैं, तो वह केवल टॉमी है। पोते निलय मलय के नखरे उठाने का सुख उनकी थाली का कौर नहीं।‘‘ नरेन्द्र जो कहते नहीं थकता था कि सबसे पहले बद्रीकेदार आपको ले जाऊंगा, जब तक आप दर्शन नहीं कर लेंगे तब तक मैं वहां जाने की सोच भी नहीं सकता, और वही नरेन्द्र कितनी बेशर्म मक्कारी से अपने ’फ्रैंण्ड सर्कल‘ के साथ सपरिवार बद्रीकेदार का प्रोग्राम ही नहीं बनाता बल्कि इस अंदाज में पूछकर (घर में एक दाना भी नहीं, अब अगर कहो तो रोटी बना दूं? खाओगे?) उन्हें यात्राा के सर्वथा अयोग्य ठहरा कर घर की जिम्मेदारी के लिये छोडकर चला जाता है। बेटे के दो बोल, बहू से आत्मीयता, बच्चों से दुलार कर पाने की उनकी इच्छा सदैव अतृप्त रह जाती है। किसी के पास भी उनके लिये समय नहीं है, भाव नहीं है, वे तो टॉमी से भी गये गुजरे हैं, टॉमी अच्छी ’ब्रीड‘ का नस्ली कुत्ता है, जो अपनी उपस्थिति से मालिक के स्टैण्डर्ड में इजाफा करता है उनके रुतबे को कायम रखता है। जबकि, उनसे सभी को घोर असुविधा है, बल्कि शिकायत है कि वे अश्लील हरकतें करते हैं। सामने वाली लडकी को देखकर पैजामा खोल देत हैं। वे कैसे बतायें, विश्वास दिलायें कि ऐसा हरगिज नहंी है। वे मस्सों में मलहम लगा रहे थे इसीलिये पजामा खोला था.... वह भी कमरे के अंदर....। लेकिन यहां उनकी सुनने वाला कोई नहीं, सुनाने वाला हर कोई। उन्हें तमीज नहीं है। लिफ्ट खुली छोड देते हैं। बंद नहीं करते.... यानि वे बिल्कुल नाकारा और फालतू हैं। इसलिये तो फालतू सामान की तरह उन्हें घर की लॉबी में शिफ्ट कर दिया गया। उन्होंने एतराज भी किया। कहा भी पहले तो कमरे में ठहराया जाता था। अब लॉबीनुमा बाल्कानी में क्यों? पर उन्हें तरह-तरह के तर्क (कुतर्क) देकर समझा दिया गया पहले वे मेहमान की हैसियत से दो चार रोज के लिये आते थे, अब तो आकर रह जाने के लिये हमारे पास आये हैं। तरह-तरह की बातों से उनके एतराज को खारिज कर दिया गया और वे शीशों में बंद बॉल्कानी के दडवे में कैद होने पर विवश हो गये....। जहां टॉमी भी बंधा होता था। जिस बहू की संवेदनशीलता कुत्ते के लिये इस हद तक थी कि वह उसके लिए टी.वी. चैनल बदल देती.... उसे बोरियत से बचाने के कई जतन करती। वही बहू हाड मांस के इंसान के लिये इतनी क्रूर कि उनकी अवश्य रोगावस्था पर उन्हें आडे हाथों लेती, आफ कपडों की वजह से सारे कपडे पीले हो गये हैं.... साबुन रख दिया है खुद धो लिया करें.... और वे रोग की गंभीरता से अपराधी से घिरे कर्नल स्वामी की उस बात के क्रियान्वयन पर विचार करने लगे.... हां अब तो छींकने, पादने तक में खून से तर हो जाते हैं कपडे.... हडेंसा लगाया, दवाई की लेकिन बवासीर ही क्या जो ठीक हो, उल्टा बढता चला जा रहा है। कर्नल ठीक कहता है अब उन्हें ’पैड‘ लगाना चाहिये.... बस यही एक कमी रह गई थी.... पर मजबूरी क्या नहीं करा लेती....। कितनी उपेक्षा सहें वे उनकी चाय के लिये कभी नीबू नहीं होता घर में। सलाद के लिये है। सुबह नरेन्द्र को शहद पीने के लिये है.... लेकिन उनके लिये.... नाश्ते में इंतजार में घंटों बीत जाते हैं.... मीठा दलिया या सीले बिस्कुट या कई दिन बासी फ्रिज में पडी दाल के चीले....। जसवंत भी अपने मलय-निलय के लिये ऐसी ही योजना बनाते हैं। चाहे जितना खर्च हो वे बर्थडे सैलीब्रेट करेंगे। ’’उनका प्रस्ताव सुनते ही मलय परम प्रसन्न हो उठा। उसने बताया कि उसने तो अपना जन्मदिन मैकडोनल्स में मनाने का कार्यक्रम पहले ही बना रखा है। मम्मी पापा भी राजी हैं। लेकिन घरवाले इस प्रोग्राम में शामिल नहीं होंगे। उसका यह कार्यक्रम उसके दोस्तों के साथ हैं।‘‘ न, न दादू! अपने साथ हम किसी भी बडे को नहीं ले जायेंगे। पार्टी बोरिंग हो जायेगी।‘‘ ’’मगर उपहार क्या लोगे तुम अपने दादू से?‘‘ ’’ऊंऽऽऽ अदनान सामी की सी.डी. दिलवा दीजिये।‘‘ ’’वो कहां मिलेगी?‘‘ ’’पालिका बाजार जाना होगा आपको।‘‘ ’’तुम दोनों चलोगे?‘‘ ’’नहीं ‘‘ ’’क्यों?‘‘ ’’पढना होता है न....।‘‘ बाबू जसवंत सिंह उदास हो गए। बच्चों की गलती नहीं। उन्हें अपने तक सीमित होना सिखाया जा रहा है। उन्हें समझाया जा रहा है कि उन्हें किसी कि जरूरत नहीं। नरेन्द्र और बहू विचित्रा तब भी लगे थे जब बच्चों के बिना मांगे ही वह उन्हें विचित्रा विचित्रा खेल खिलौने लाकर दिया करते थे। उन्हें किसी की जरूरत महसूस न होती। कानपुर आते ही उन्हीं खेलों के साथ आते। गली के बच्चों के साथ खेलने में उन्हें कोई दिलचस्पी न होती। न अपने खेलों में वे उन उत्सुक बच्चों को साझीदार बनाते। न हाथ लगाने देते। कम्प्यूटर! विज्ञान ने बडी नियामतें दी हैं जी खोलकर! बडी नियामतें छीन ली जी तोडकर। ’’अहलूवालिया भाई साहब के घर कम्प्यूटर नहीं होगा, वरना उनका भी मुहावरा बदल चुका होता।‘‘ (गिलगिडु) बच्चों के पास दादी बाबा की कहानियां, उनका दुलार, उनकी विरासत, सुरक्षा कवच, लहजे, रीति नीति आत्मीयता नहीं है, आंख मिचौनी, लुकाछिपी की दरकार नहीं है, अब है टी.वी. क्विज, टी.वी. चैनल्स.... कार्टून चैनल्स डिस्कवरी चैनल, वीडियो गेम, कम्प्यूटर गेम....। शेम.... शेम.... शेम....। ये बच्चों को क्या बना रहे हैं? अनुकृति में हीरो, रचनात्मकता में जीरो। शालू जो कभी बाप के आगे बोलने की कौन कहे भर नजष्र देख तक नहीं सकती थी, जिसके लाड-दुलार में उन्होंने जमीन आसमान एक कर दिया था, ख्ुाद दुख झेलते रहे उसे सुखी देखने की खातिर। और आज वही शालू फोन पर कहे जा रही थी, एक तरह से फरमान ही सुना रही थी अपने बेबस बाप की नियति का ’’भैया तो यहां तक सोच रहें हैं कि जहां बाबूजी का मन लगे, वे प्रसन्नचित रहें, उन्हीं वहीं रखा जाये। उन्होंने पता लगाया कि नोएडा के सैक्टर पचपन में कोई आनंद निकेतन वृद्धाश्रम है, क्यों न उनके रहने की व्यवस्था वहां कर दी जाये। हम उम्रों की जमात में बाबूजी का मन लगा रहेगा। भैया जगह देख आये हैं, वे बता रहे हैं कि बहुत सुंदर है। भोजनादि की व्यवस्था उत्तम कोटि की है। उन्हें वहां रखने के निर्णय से भैया पर खर्च का अतिरिक्त बोझ पडेगा। भैया उसे सहर्ष उठाने के लिये तैयार हैं। हरिद्वार के किसी आश्रम के विषय में भी भैया के किसी मित्रा ने चर्चा की है। आश्रम ठीक गंगातट पर है....। बाबू जसवंत सिंह के हाथ से टेलीफोन का रिसीवर छूट गया....।(गिलगिडू) जिस बेटी की परवरिश में तन, मन, धन खपा दिया। जिसकी एक पुकार पर पे दुनिया के किसी भी कोने से दौड पडते असुविधाओं की परवाह न करके.... आज वे ही उन्हें दरबदर करने की सोच चुके हैं। टी.वी. में दिखाये वृद्धाश्रम और जीवन की अंतिम संास लेते निर्विकार उदासीन वृद्धों के साक्षात्कार उनकी आंखों में कौंध गये.... अब वे भी वहां का हिस्सा बनने जा रहे हैं.... ऐसा क्या कसूर किया है उन्होंने कि इतनी घोर उपेक्षा, अपमान पर तुल गये बहू बेटे.... बेटी। अपनी पोतियों को गिलगिडु कहता है कर्नल। मेरी भी तो नन्हीं गिलगिडु हैं.... सुनगुनियां की बेटियां.... अब उन्हीं के पास जाऊंगा.... उनसे बातें करूंगा.... ’’बाबू जसवंत सिंह वल्द ठाकुर अमरेन्द्र बहादुर सिंह गांव सगवर पोस्ट सगवर जिला उन्नाव अपने जीवन की वसीयत बदल रहे हैं.... सुनगुनियां से कहना चाहते हैं, अपने और उसके रिश्ते को वह जो भी नाम देना चाहते हैं, अपने और उसके रिश्ते को वह जो भी नाम देना चाहे, उन्हें स्वीकार होगा। नाम वही चुन सकती हैं और दे भी सकती हैं। जीवन का यह नितांत नया पडाव वे अपनी गिलगिडु कात्यायनी कुमुदिनी के साथ बिताना चाहते हैं। कानपुर पहुंचते ही वे अपने परिचित एडवोकेट कुशवाहा से नई वसीयत बनवायेंगे उसे रजिस्टर्ड करवायेंगे उनके न रहने पर उस घर की एकमात्रा अधिकारिणी सुनगुनियां होगी। सुनगुनियां का पुत्रा रामरतन, न अभिषेक आसरे ही उनकी कपाल क्रिया करें। उसे ही वह अपने दाह संस्कार का अधिकार दे रहे हैं।‘‘ (गिलगडु) और वे लौट आते हैं कानपुर अपनी जगह। अपनी जगह को घर बनाने का शुभ, शिव, सत्य, सुंदर संकल्प लेकर।‘‘ चित्राा ने यहां दिशा दी है उस अवस्था को जो आश्रित हो जाने को ही अपनी नियति मान बैठती है दुख, उपेक्षा, उदासी में घुट घुटकर मरने पर बाध्य है। ऐसों के लिये बहुत सकारात्मक विकल्प, व्यवस्था है गिलिगडु में जो पूरी तरह से मानवोचित और मानवीयता के प्रति उन्मुख है। सबसे बडा नाता है इंसानियत का, प्रेम का, आत्मीयता का, नैतिकता का, सामंजस्य का, समायोजन का, संसारिकता, सहकारिता का जो रहती दुनिया तक खत्म होने वाला नहीं। ऐसा ही नाता है जसवंत जी का सुनगुनियां से। सुनगुनियां जो ईमानदार, निच्छल निष्कपट स्त्राी है। जो जसवंत सिंह की कोठी के पिछले भाग में पनाह लिये हुए है अर्से से। वह उनके पूरे घर की सेवा टहल चाकरी करती है। ’’उधर फोन पर सुनगुनियां आ गई। बाबू जसवंत सिंह की लंबी गैर मौजूदगी से उपजी विषाद की कलौंछ उनकी आवाज सुनते ही सुनगुनियां के स्वर में भर आई। बाबू जसवंत सिंह ने छूटते ही उलाहना दिया इतने दिनों तक उसने फोन क्यों नहीं किया? सुनगुनियां ने यह कहकर असमर्थता जताई। कैसे करती? फोन घरवालों की आंख बचा नेताजी की बडी बिटिया ही लगा दिया करती है। सो वह यहां थी नहीं।’’ कर्नल स्वामी खुद भी शान से जिये औरों को भी जीने का प्रेरणा देते रहे। जसवंत अगर उनके फ्लैट पर मिलने न जाते तो उन्हें उस हृदय विदारक हकीकत का पता कैसे चलता? ’’आफ दोस्त कर्नल स्वामी अब इस दुनिया में नहीं रहे....‘‘ खत्म हो गये। ईश्वर को प्यारे हो गये। ’कब‘.... ’आज उन्हें गये हुए बारह दिन हो गये। तीस नवंबर की सुबह थी वह!‘ ’घर पर बहुएं बच्चे.... सब कहां गये हुये थे?‘ ’कौन से बहू बच्चे। मिसेज श्रीवास्तव को बाबू जसवंत सिंह के प्रश्न ने भौंचक कर दिया। ’माधवी, अनुश्री, गिलिगडु.... नेहा नरायण....‘ ’पिछले आठ वर्षों से हमने भाईसाहब को अकेले ही रहते देखा है।‘ बाबू जसवंत सिंह को लगा कि किसी ने उन्हें तीसरे माले से उठाकर नीचे फेक दिया है....‘ चौरानबे की बात होगी। पत्नी की मौत के बाद कर्नल स्वामी निपट अकेले हो गये। मलिन बस्तियों के बच्चों को कर्नल स्वामी शाम को पढाते ही नहंी थे, अपनी आय का आधा वे उन बच्चों की जरूरतों पर खर्च किया करते थे। स्वयंपाकी थे। ऐसी मुलायम इडली बनाते थे कि अच्छे अच्छों से न बने। बच्चों को बडे चाव से खिलाते थे मेदुबडा और इडली।‘‘ (गिलिगडु) जसवंत सोचने पर विवश हो गये उनकी हों या कर्नल की किसी अभिशाप से कम नहीं हैं ये संताने। ’नर हो न निराश करो मन को‘ तुम्हारा यह मूलमंत्रा अब मेरा है। मेरे जैसे सबों.... का है। जो बोयेंगे वहीं काटेंगे न। बबूल बोकर सेब संतरे की फसल कोई नहीं काट सकता। बूढी काकी या अन्य सर्जनाओं के सर्जकों ने तद्विषयक मार्मिक चित्रा दिये हैं वृद्धजनों के। जो शीशा दिखाते हैं साहित्य में समाज का। आज के दौर मं भी बाढ है यथार्थ अभिव्यक्ति के चित्राण की। जो हो रहा है, वह एक से बढकर एक निजी शैलियों में चित्रिात हो रहा है। वहां यथार्थ की बात है। हो, लेकिन केवल यथार्थ चित्राण भर से बात बनती नहीं। हां संवाद, संपर्क जरूर कायम हो जाता है लेखक पाठक म। इस चाल से चित्राा इस नातें विशिष्ट हैं, अलग खडी हैं आगे। वे यथातथ्य वस्तु निष्ठ निरूपण करती हैं, मार्मिक दृश्य देती हैं। अनुभूति की सघनता इतनी कि साधारणीकरण हो जाता है कथ्य विशेष से। पर इस सबसे बढकर बात यह है कि ये रचनात्मक समाधान भी देती हैं विषमताओं विडंम्बनाओं से उबरने निकलने के। अपनी पठनीयता में यह उपन्यास बेजोड है जो पढने के बाद चुक नहीं जाता। यादों में समा जाता है एक बेचैनी लिये हुये। यहां संवेदना और जिज्ञासा इस कदर घुलीमिली है कि एक बैठक में ही अद्योपांत पढ जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं। टॉमी, कर्नल, जसवंत जी, गिलिगडु, सुनगुनियां, श्री नारायण, अनुश्री आदि पात्रा क्यों कर भूलेंगे जबकि वे हमारे बिल्कुल नजदीक के हैं, पडोस के, रिश्तेदारी के और शायद हमारे घर के भी। भाषा की अविष्कारक हैं चित्राा जी। आवां की तरह यहां भी उनकी विशिष्ट भाषा का कौतुक कौशल दिखाई पडता है। विविधता लिये हुये। इसमें उनकी भाषा चित्राों की जीवित जागती भाषा है। परिस्थितियों या वस्तु का वे ऐसा जीवंत चित्राात्मक वर्णन करती हैं कि आंखों के आगे पूरा दृश्य उभर कर आ जाता है। दृश्यात्मक भाषा-वैज्ञानिक हैं वे। अगर टॉमी का वर्णन कर रहीं हैं तो पूरी सजगता के साथ उसकी पूर्णांगिक चेष्टाओं, भंगिमाओं का ऐसा खुलासा करती हैं कि लगता है टॉमी औपन्यासिक न होकर दूरदर्शन पर दिख रहा हो अपने पूरे हावभावों को लिये हुये या कि सामने खडा हुआ हो। गिलिगडु में भाषा का जिंदा रूप है। डी.ए.वी. कॉलेज, कानपुर (उ.प्र.)
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