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यथाकाल‘ निबन्धकार श्री मनोजकुमार श्रीवास्तव के ग्यारह निबन्धों का सद्यः प्रकाशित सग्रह है। देश और दुनिया मानवीय मूल्यों के क्षरण, आत्मकेन्दि्रत जीवन-दृष्टि, लोकतांत्रिाक व्यवस्था के वाबजूद समूची दुनिया में सामूहिक सरोकरों के प्रति उपेक्षा, आतंकवाद, भाषायी विवाद, वैश्वीकरण के दौर में पूंजी पर एकधिकार और समाज में बह रही अपसंस्कृति के ख्ातरों पर विद्वान लेखक ने विस्तार से चर्चा की है। श्री श्रीवास्तव ने इन निबन्धों के माध्यम से शिक्षा खेल, आतंकवाद, जातिप्रथा, भाषा, संस्कृति और कविता से सम्बन्धित निबन्धों द्वारा इन विषयों के ऐतिहासिक स्वरूप को रेखांकित ही नहंी किया है अपितु इन पर समकालीन संदर्भों में विचार किया है। भावी समाज और पीढी की दशम्-दिशा पर अपनी स्पष्ट राय रखी है। ’शिक्षा‘ नये युग की चुनौती के अन्तर्गत लेखक ने एक विस्तृत निबन्ध लिखा है। शिक्षा प्राप्त कर लेने की चरम परिणति के रूप में वे नौकरी प्राप्त कर लेने की योग्यता को शिक्षा नहीं मानते, न शक्ति हीनता से सशक्तीकरण का मार्ग। ’’रोजगार प्रशिक्षण, व्यावसायिक पाठ्यक्रम और व्यवहारिक समस्याओं की बाबात पाठ्य पुस्तकें ही नहीं बल्कि चरित्रा की मनोवैज्ञानिक साहित्य और काव्य संकाय की भी पुस्तकें जो उसकी (गरीब की) कमजषेर आत्म-छवि और एक उदासीन, जटिल व तेजष् रफ्तार दुनिया में उसके परायेपन के बोध के विरुद्ध एक मानवतावादी पाठ्यक्रम प्रस्तुत करें। शक्तिहीनता से सशक्तिकरण का रास्ता सिर्फ नौकरी कर प्राप्त नहीं होता, वह होता है समझ के विकास से।‘‘ (पृ. १७) लेखक शिक्षा का असल मकसद स्पष्ट करना चाहता है। शिक्षा मात्रा पेट-भरने का साधन बनकर व्यक्ति को यांत्रिाकता के पाश में बंधे अपितु बौद्धिक विकास भी करें। लेखक ने पाठ्यक्रमों को लेकर बडे पते की बातें की हैं। प्राथमिक शिक्षा-व्यवस्था से लेकर उच्च शिक्षा व्यवस्था तक पाठ्यक्रमों के सम्बन्ध में विचार करते हुए वह सवाल करता है-’’क्या शिक्षा को हम वाउन की उस परिभाषा से आजाद करवा पाऐंगे जिसमें इसे, ’सचेतन रूप से नियंत्रिात (कांशसली कंट्रोल्ड) प्रक्रिया कहा गया है जो भारत की उस परम्परा से किंचित भिन्न पडती है जहां शिक्षा जीवन का अंग मात्रा नहीं स्वयं जीवन है।.... सही अर्थों में मुक्तिकारी न कि ’सचेतन रूप से नियंत्रिात।‘ (पृ. ३०) शिक्षा के मनोविज्ञान के तहत उनका आग्रह है कि ’शिक्षा को घटक वादी न्याय से अब सांदर्भिक न्याय की तरफ ले जाना जरूरी हो गया है।.... पाठ्यक्रमों में ऐसे अनेक शब्द हैं जो इनके आसपास उस तरह बोले-सुने नहीं जाते हैं, जैसे कक्षा पहली की वर्णमाला में ईख / ऐनक/ चरख्ाा/ ठठेरा/ रथ जिसका ताल मेल प्रासंगिक नहीं होता।‘‘ हमारी शिक्षा-व्यवस्था का ठर्रा प्रारम्भ से ही गडबडाया हुआ है।‘‘ आजषदी के बाद कई प्रयोग किये गए। लेकिन ’मर्ज बढता गया ज्यों-ज्यों दवा की।‘ शिक्षा को राज्यों का विषय बना दिया गया। हर राज्य ने अपनी सुविधा का ध्यान रखा, आवश्यकता का नहीं। प्राथमिक शिक्षा के स्तर से ही बालकों के कोमल मन-मस्तिष्क का विकृत किया जाता रहा है। ’ग‘ से गणेश, गमला, गधा हर वर्ग के लिए हर प्रान्त की अलग चित्राात्मक प्रस्तुति। रेल रक्षा तथा डाक-व्यवस्था की तरह शिकंजा का भार भी केन्द्र के जिष्म्मे होता तो शिक्षा जगत् की दुर्गति कम होती। माफियाओं से अपेक्षाकृत रूप से कम प्रभावित होती-शिक्षा प्राथमिक शिक्षा से माध्यमिक शिक्षा और फिर विश्वविद्यालयी शिक्षा तक समूचा तंत्रा दरक गया है। सरकारी प्राथमिकशालाएं हैं निजीशालाएं हैं, पब्लिक स्कूल हैं, मदरसे हैं, शिशु मंदिर हैं जवाहर विद्यालय ह, नवोदय विद्यालय हैं सभी जगह अपना पाठ्यक्रम अपना एजेण्डा है। कुकुरमुत्तों की तरह स्कूल उग आए हैं। हर जगह अपना-अपना नियंत्राण है। परिणाम सामने हैं-शिक्षा माफिया शिक्षण की रीति-नीति तय करेगा। पब्लिक स्कूल और सरकारी स्कूल के अन्तर को स्पष्ट करते हुए वे लिखते हैं- ’’पब्लिक स्कूल की टीचर ऐसा नहीं कि पढाती नहीं हैं। यदि सराकरी स्कूलों में टीचर का पढाना समस्या है तो पब्लिक स्कूल में टीचर का बहुत-बहुत पढाना उससे विकराल समस्या है। ’’पहली कक्षा के बच्चे ’ए, एन, द‘ का फश्र्क सीख रहे हैं, गुणा और भाग सीख रहे हैं। कोइ आपत्ति करे, आफ समय की बात और थी। अब जष्माना होडबाज हो गया है। अब तो जोड, गुणा, भाग, हिसाब किताब जितना जल्दी आ जाए अच्छा। (पृ. ४२) तो यह है सारी जल्दबाजी और बच्चों की एक दम बाजार के लिए तैयारी करने का कारण। व्यवसाय हो गया है। विद्या, जो मुक्त करती है उसकी अब आवश्यकता ही नहीं रह गई। व्यक्ति को जितना जकड सके उतना ही शिक्षा की सफलता का दावा। जीवन की सफलता के आगे जीवन का सार्थकता का कोई मूल्य नहीं है। ऐसी है आज की शिक्षा व्यवस्था। युवाओं को सुशिक्षित करने में मांओं की भूमिका को स्पष्ट करते हुए नैपोलियन का जिक्र करते हुए लेखक ने एक घटना का उल्लेख किया है-’’जब नैपोलियन ने मैडम कम्पां से पूछा कि फ्रांस के युवाओं को सुशिक्षित करने में कमी किस बात की है तो उनका जवाब था कि अच्छी माताओं की।.... यहां शिक्षा को अपना एकान्तिक एकाधिकार बताता और बनाता हुआ स्कूल प्रबन्धन और प्रशासन।‘‘ लेखक स्कूलों को अपने परिवेश का वैसा ही केन्द्र बिन्दु बनाना चाहता है ’’जैसे कि आसमान के सारे माण्डल में सूरज। विनम्र प्रयासों की ऊर्जा ही हमारे काम आती है। ऐसे शंक्वाकार महलों का शीर्ष होना भी क्या, जहां या तो गिद्ध पहुंचे या छिपकलिया।‘‘ गुरु और शिक्षक के अन्तर को विद्वान लेखन ने ’प्रवृत्ति‘ और ’वृति‘ से स्पष्ट किया है। ’वृति‘ ने गुरु की ’प्रवृत्ति‘ का हरण कर लिया है। ’गुरु‘ के लिए अध्यापक कार्य व्यवसाय नहीं था, ’अध्ययन‘ उसका ’जीवन-दर्शन‘ था ’जीवन पद्धति‘ थी। भोगवाद और बाजारवाद ने उस दर्शन और पद्धति के प्रति स्वयं गुरु के ही जीवन को बदल दिया है तो प्रवृत्ति को तो व्रत्ति में बदलना ही था। अस्तु ’’मैच फिक्सिंग और मोहभंग‘ में उन्होंने भारत में क्रिकेट के जन्म से लेकर मैच फिक्सिंग के प्रसंगों और उसके बाद भद्र-जनों के इस खेल में अभद्रता के प्रति क्षोभ प्रकट करते हुए क्रिकेट मोह-भंग को स्वागत योग्य भी बताया है-’’क्रिकेट में यह मोह भंग एक अर्थ में स्वागत-योग्य भी है क्योंकि इसके मोहावेश ने देश के अन्य खेलों की प्रगति को प्रभावित तो किया ही है, देश की जनसंख्या के एक बडे हिस्से को निस्पन्द और निष्क्रिय भी बनाया है। श्री श्रीवास्तव ने ’आतंक का भन्ते विज्ञान‘ शीर्षक निबन्ध में आतंकवाद के कारणों और उसके पूरी दुनिया पर छा जाने के बाद भी विभीषिका को विश्लेषित किया है। सारी दुनिया में इस आतंकवाद के दो रूप हैं एक ही नजष्र में यह अपनी पहचान और मुक्ति का संघर्ष है तो दूसरों की नजष्र में वे एक आसान कम खर्चीला और सरलता से संघटित किया जाने वाला छद्म युद्ध लड रहे हैं। आतंकवाद की सफलता का रहस्य आज की वैश्विक राजनीति के अन्तर्विरोधों, शासक प्रणाली की विसंगतियों, भोगोलिक स्थितियों क्षेत्राीय समस्याओं के प्रति ’तदर्थ‘ समाधानों के रवैये तथा लोकतंत्रा बनाम तानाशाही के द्वन्द्व में छिपा है। मानवाधिकारों के प्रति दोहरे मानदण्ड, लोकतांत्रिाक व्यवस्था के आवरण में आर्थिक तानाशाही का वर्चस्व इस समस्या के स्वरूप को बद से बदत्तर स्थितियों इसका के लिए अवसर प्रदान करेगा। श्री श्रीवास्तव ने अपने निबन्धों के माध्यम से युगीन सवालों को उठाया है। वे सवालों से टकराते हैं जूझते हैं, उनके समाधान प्रस्तुत करने के लिए पाठकों को प्रेरित करते हैं। पाठक के मन-मस्तिष्क को झकझोरते हैं। विषयों पर विस्तार पूर्वक विचार करते हुए भूख, आतंकवाद, भद्रजनों के खेल क्रिकेट की अभद्रताएं उन्हें विचलित करती हैं। विज्ञापनों के कुप्रभाव से समाज में फैलती अपसंस्कृति का प्रचार-प्रसार उन्हें चिंतित कर देता है। जातिगत समस्याओं और जातीय संघर्ष से उपजी ’एक सामाजिक बुराई अब एक राजनीतिक बुराई‘ के रूप में उभरकर देश के लिए खतरे की घण्टी साबित हो सकती है। लेखक सवाल करता है कि ’क्यों उस अनुदार समाज में वाल्मीकि, वेदव्यास से लेकर कबीर, रैदास, नानक, पीपा, धन्ना, प्राणदास, मलूकदास जैसी प्रतिभाएं ज्ञान और अध्यात्म में पैदा हो गई, लेकिन आज के विशेषााधिकार प्राप्त आरक्षित और धर्म-निरपेक्ष युग में न तो दलित करोडपति पैदा हो रहे हैं और न पूरे हिन्दू समाज का नेतृत्व करने वाली दलित प्रतिभाएं सामने आ रही हैं। कहीं कुछ गडबड अवश्य है। क्या डॉ. राधाकृष्णन ने आज के भारत पर टिप्पणी करते हुए ठीक नहीं कहा था कि ’’जाति अब एक सामाजिक बुराई के रूप में धूमिल पड रही है और एक राजनीतिक बुराई के रूप में उभर नहीं रही है।‘‘ श्री मनोज कुमार श्रीवास्तव ने ’यथाकाल‘ के निबन्धों में, अपने जीवनानुभवों से अर्जित विस्तृत ज्ञान-सम्पदा को सशक्त अभिव्यक्ति दी है। विषय से सम्बद्ध, विविध पक्षों, दृष्टिकोणों पर वैज्ञानिक विश्लेषण पद्धति द्वारा विचार करते हुए विषय सापेक्ष किन्तु पाठकीय सहमति से निरपेक्ष रहकर निष्कर्ष दिए हैं। विचारात्मक निबन्धों की परम्परा में ये निबन्ध अपना विशिष्ट स्थान रखेंगे। समकालीन आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक परिदृश्य के प्रति सचेत पाठकों, विचारकों के लिए एक जरूरी किताब है ’यथाकाल‘। विश्वास है चिन्तन-मनन करने वाले अध्येताओं को निश्चय ही यह पुस्तक चिंतन के नये आयाम प्रदान करेगी। हिन्दी विभाग, अ.मु.वि.
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