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समाज रोज निरीह, मूक, भयभीत असंख्य ’प्रेमों‘ की हत्या करता है, यह समाज वृणित है, ध्वस्त हो जाने का पात्रा है। ....समाज के नियम, परम्पराएं, नैतिकता प्रेम के आगे टुच्चे बौने की तरह हैं जिसकी पीठ पर खडे होकर प्रेम को ताण्डव करना चाहिए। ....-प्रियंवद (?) ’कथादेश‘ (प्रेम कहानी विशेषांक, जन., ०६) ’सहितस्य भावः साहित्यं‘ की ’पुरानी‘ परिभाषा के अनुसार साहित्य वह है जो हितकारी भावों से युक्त है। साहित्य का यह हितकारी भाव किसके प्रति है? जाहिर है जो पढे उसके प्रति। साहित्य पढने वाले व्यक्ति या व्यक्तियों के प्रति और उससे निर्मित समाज के प्रति। यहां कहना यह है कि व्यक्ति एवं समाज परस्पर विरोधी नहीं, नाभिनालवत् एक-दूसरे से अनिवार्यतः सम्बद्ध हैं, आपस में अनुपूरक हैं। व्यक्तियों से ही समाज बनता है और समाज के सांचे में ढलकर ही व्यक्ति तैयार होते हैं। बिना समाज के व्यक्ति की कल्पना नहीं की जा सकती और बिना व्यक्ति या व्यक्तियों के समाज के अस्तित्व का विचार बे मानी है। समूह में रहने की अपनी प्रवृत्ति के कारण मनुष्य ने स्वयं समाज की रचना की और स्वेच्छा से कुछ बन्धन स्वीकार किये। समाज मनुष्य के ऊपर किसी अन्य सत्ता द्वारा थोपी गयी संस्था नहीं, अपितु उसके सम्यक विकास के लिए स्वयं द्वारा निर्मित संस्था है। अब इसके लिये तो कोई प्रमाण नहीं ही देना होगा कि मनुष्य के वर्तमान विकास की मंजिल तक आने में इस समाज नामक संस्था का कितना और कैसा भारी योगदान है? क्या बिना सामूहिक जीवन-पद्धति के निर्माण के चलते अधुनातम प्रगति-शिखरों तक पहुंचना संसार के लिए सम्भव हो सकता था? इस प्रश्न के उत्तर में ’हां‘ कदाचित् ही कोई कह पाये। तो जिस समाज नाम की संस्था का मनुष्य के जीवन-निर्माण और संासारिक-विकास में ऐसा महत्तर योगदान है, उसे वर्तमान विकास-यात्राा के पडावों तक लाने में ऐसी महती भूमिका है और उसकी आगे की उपयोगिता को भी नकारने का अकाट्य तर्क शायद ही किसी के पास हो -उस समाज को ध्वस्त करने के लिए आतुर है आज का साहित्यकार। ध्यातव्य है कि प्रियंवद (या अप्रियंवद?) ऐसे अकेले साहित्यकार नहीं हैं, उनके जैसे और भी बहुतेरे भाई-बन्धु उनके हैं जो अपनी-अपनी लेखनी के बुलडोजरों को लेकर एक साथ हो, समाज को ध्वस्त करने हेतु निकल पडे हैं। परम्परागत मूल्यों, मर्यादाओं, आचारों पर अपनी नंगी तलवार (किन्तु भोथरी) लहराते हुए आक्रमण की मुद्रा में पिल पडे हैं। भारतीय समाज, संस्कृति, धर्म, दर्शन, संस्कार, विचार, इतिहास, शास्त्रा सभी कुछ पश्चिम की चकाचौंध से चौंधियाए इन तथाकथित स्वयंभू विचारकों के लिए तुच्छ हैं, हेय हैं, त्याजय हैं तथा विनवत कर देने योग्य हैं। क्यों भारतीय समाज घृणित और ध्वस्त हो जाने का पात्रा है प्रियंवद के अनुसार क्योंकि यह प्रेम नहीं करने देता। कौन सा प्रेम? वह प्रेम जो ’देह से गुजरकर आता है।‘ वह प्रेम जो ’एकाधिक लोगों से भी‘ किया जा सकता है। भारतीय दृष्टि से आदर्श प्रेमी-प्रेमिका हैं जिनके लिये वे लेखते हैं-’इनके बारे में जरूर पढें। प्रेम की वैचारिक व बौद्धिक व्याख्याएं नयी अनुभूतियां आपको पता लगेंगी। ‘ कैसी बौद्धिक व्याख्याएं एवं नयी अनुभूतियां पता लगेंगी? यह कि ’दोनों के अन्य प्रेमियों से सम्बन्ध थे। दोनों, दूसरों के इन सम्बन्धों को जानते थे।‘ फिर व्यभिचार क्या है? देखें इस सम्बन्ध में प्रियंवद के महाक्रान्तिकारी विचार-’मैं प्रेम को व्यक्ति स्वतन्त्राता का सर्वोच्च उद्घोष मानता हूं। इसलिये हमेशा उसे समाज से ऊपर रखता हूं। समाज के गढे शब्द व्यभिचार को निरर्थक मानता हूं।‘ अपने इस आदर्श प्रेम की प्रयोगशाला वे उस वय को बनाते हैं जिसे नाबालिगष् घोषित कर सरकारी स्तर पर भी इस निर्णय के अयोग्य माना गया है। लेकिन प्रियंवद लिखते हैं-’अनुभवहीन, कम उम्र के अबोध, आवेगों, स्वप्नों, उत्साह से लबालब किशोरों के प्रेम में जैसे होती है। (रूमानी छवि) उन्हें ऐसा ही प्रेम करना भी चाहिए और अपने इस प्रेम को विजयी भी बनाना चाहिए।‘ और ऊपर से तुर्रा यह कि ’वह (प्रेम) मनुष्य को विराट बनाने वाली भावना है।‘ ’कथादेश‘ के इसी अंक में युवा कथा-लेखिका जया जादवानी लिखती हैं -’सन्तुलित दृष्टि, परिपक्व विचार, जीवन का गहन अध्ययन वे करें, जिन्हें समाज रचना है। प्रेम मनुष्य रचता है।‘ उपर्युक्त प्रेम कैसा मनुष्य रचता है और कैसे रचता है, समझ से परे है? और समाज रचने एवं मनुष्य रचने में कैसा और क्या अन्तर है-ये तो जया जी जानें, पर यहां प्रश्न यह उठता है कि फिर मनुष्य क्या रचता है? उच्छृंखलता, स्वेच्छाचार? और यह भी कि सन्तुलित दृष्टि, परिपक्व विचार, जीवन का गहन अध्ययन क्या मनुष्येतर प्राणियों की क्षमता और परणा के विषय हैं? ठीक है, प्रेम जीवन में अत्यन्त महत्वपूर्ण है और यह मानव को उदात्त बनाने वाली भावना है, इससे भी कोई इन्कार नहीं करता। परन्तु, यहां जिस तरह से और जिस तरह के प्रेम को प्रतिष्ठापित करने की कुचेष्टा की जा रही है, वह आपत्तिजनक है। प्रेम यदि मनुष्य रचता है तो जिस तरह के प्रेम की वकालत प्रियंवद, देवेन्द्र और जया कर रहे हैं वह तो कतई मनुष्य नहीं रचता, उसे विनष्ट अवश्य करता है। देवेन्द्र लिखते हैं-’प्रेम की कोई उम्र नहीं होती। यह जीवन में कभी और किसी के प्रति (यहां ’कभी और किसी के प्रति‘ पर ध्यान दें) भी घटित हो सकता है। फिर भी इस अशरीरी भाव पर कोई उम्र फबती है तो वह किशारावस्था से ही मिलती-जुलती होती है।‘ जया जी ’कथादेश‘ के इसी अंक में प्रेम का मतलब समझाती हैं-’प्रेम का मतलब देह में इनकारी होना नहीं है, वरन् देह से गुजर कर इसके पार जाना हे।‘ जब प्रेम की मंजिल देह ही है और देह से गुजरकर ही यह परिपक्व होता है (प्रियंवद) तब फिर विवाह में ही क्या बुराई है? बुराई है, क्योंकि इसमें जिम्मेदारी आ जाती है। प्रेम में तो बस खेलने-खाने का सुख है जबकि विवाह के पश्चात खिलाने-पिलाने और जीवन के अन्यान्य क्षेत्राों में सहयोग करने-कराने की जिम्मेदारी आ जाती है। इसलिये विवाह बुरा है। लेकिन इसके लिये तर्क (या कुतर्क) कौन सा दिया जाता है, देखें-’पत्नी का रिश्ता-स्त्राी को दिया गया पुरुष बर्बरता का प्रतिदान है। वैश्यावृत्ति इसकी सगी जुडवां बहिन है। स्मृतियों और सपनों के साथ बलात्कार को जायज और वैध बनाती हुई यह विवाह संस्था जाति, धर्म, कुल, गोत्रा, हैसियत और भूगोल के बंटवारे जैसी अमानवीय निरंकुशता पर टिकी हुई है। इसकी आत्मा में ही प्रेम की सुकोमल भावनाओं के लिए गुंजाइश नहीं है।‘ (देवेन्द्र) असल में यह पुरुषवादी मानसिकता ही है जो स्त्राी को भोगने की छूट तो चाहती है, किन्तु उसके साथ सहयोग करने या जीवन के प्रति सामूहिक जिम्मेदारी से बच निकलना चाहती है और बहाने के लिए ऐसे कुतर्क गढती है। स्त्राी-विमर्श के नाम पर चल रहे देह-विमर्श पर ताली पीटकर वाह-वाही करने वालों के पीछे भी यही मानसिकता काम कर रही है क्योंकि स्त्राी के देह मुक्त हो जाने में उन्हें अन्ततः अपनी ही भलाई नजर आ रही है ....शिकर की गन्ध....। अन्यथा क्यों परिवार या विवाह जैसी संस्था में प्रेम की सुकोमल भावना के लिए स्थान नहीं है? और यदि ऐसा ही है तो कैसे और क्यों यह संस्था हजारों सालों से चलती चली आयी है और विश्व भर के लगभग हर सभ्य-असभ्य समाज में किसी न किसी स्वरूप में मौजूद है? साथ ही यह कि यदि यह संस्था इतनी ही बुरी है या आज हो गयी है तो इसका विकल्प क्या है? और उस विकल्प में कोई खामी नहीं होगी, इसकी क्या गारण्टी है? यहां दरअसल वास्तविक समस्या यह है कि प्रेम को मात्रा स्त्राी-पुरुष सम्बन्धों तक ही सीमित रखकर देखा जा रहा है और इस तरह उसको विराट भावना बताकर संकुचित भावना बनाया जा रहा है। यही कारण है इन लोगों को विवाह में प्रेम की सुकोमल भावना नजर नहीं आती। प्रेम पर एकछत्रा अधिकार केवल प्रेमी-प्रेमिका और पति-पत्नी का ही नहीं है। स्त्राी-पुरुष सम्बन्धों के अतिरिक्त प्रेम-सम्बन्धों के और भी बहुत से स्वरूप हैं जो परिवार से लेकर समाज तक फैले होते हैं और इनका महत्व भी कुछ कम नहीं होता। यहां ध्यान देने योग्य तथ्य यह भी है कि पारिवारिक प्रेम का विस्तार ही सामाजिक और राष्ट्रीय प्रेम में होता है। साथ ही यह भी कि मनुष्य ने समाज-रचना मात्रा स्वार्थ-सम्बन्धों से प्रेरित होकर नहीं की, प्रेम-सम्बन्ध भी इसका बहुत बडा आधार रहा है। यहां देखना यह भी आवश्यक है कि यदि प्रेम मनुष्य को रचने वाली, उसे उदात्त बनाने वाली या विराट बनाने वाली भावना है तो इसलिये कि इसके साथ त्याग भी जुडा हुआ है। प्रेम का अर्थ सिर्फ भोग नहीं, त्याग भी है। केवल प्राप्ति ही नहीं, समर्पण भी प्रेम की एक अनिवार्य शर्त है। जो छोडना नहीं जानता, वह पाने का शऊर भी नहीं जानता। पाने में तो सुख है ही, देने का भी कुछ अलग ही आनन्द है। संग्रह का अपना अलग सुख है किन्तु, कभी-कभी परित्याग का सुख उससे भी ऊपर हो जाता है। इस दृष्टि से सही मायनों में अगर प्रेम होता है तो परिवारों में ही। कुछ लोगों के अनुभव, हो सकता है इस सम्बन्ध में बहुत कडवे हों, परन्तु लाखों-करोडों की संख्या में कुछ सौ या कुछ हजार लोगों को मानक नहीं बनाया जा सकता। तमाम छोटे-मोटे झगडों, समस्याओं के बावजूद गार्हस्थिक प्रेम में जो एक-दूसरे के लिए तडप, हित-चिन्ता, सुख-दुख का सांझापन, दीर्घ स्मृति-साहचर्य तथा एक-दूसरे के समर्पण के प्रति अव्यक्त सम्मान/आभार भावना होती है वह स्वार्थ प्रेरित एवं देह-लोलुप तात्कालिक प्रेम में नहीं हो सकती। जीवन की अन्तिम अवस्था तक जो प्रेम बना रहे, वही सच्चा प्रेम है और यही भारतीय दाम्पत्य की उपलब्धि है। भारतीय पारिवारिक और सामाजिक जीवन के आदर्श रहे हैं रामकथा के पात्रा और आज के युवाओं के आदर्श बनाने की चेष्टा की जा रही है सीमोन द वोउवा को जिनका प्रेम हमारी दृष्टि से हर तरह से अनैतिक है, अवांछित है, कलुषित है। रामकथा के पात्राों ने आपसी प्रेम और सौमनस्य के लिये भारी भारी त्याग किया है। अपना विसर्जन किया है। स्वयं को कष्टों में डाला है। आज का प्रेमी भी त्याग करता है। वह त्याग करता है अपनी कुलमर्यादाओं का, अपने सांस्कृतिक-सामाजिक मूल्यों और परम्पराओं का। अपने घर-परिवार का। और यदि ऐसा नहीं है तो इस तरह का माहौल बनाने की तैयारी की जा रही है। अखबार से लेकर इश्तिहार तक, सिनेमा से लेकर मीडिया तक....और अब पत्राकार से लेकर साहित्यकारों तक का एक वर्ग ऐसा चकाचौंध भरा वातावरण बनाकर भारतीय मानस को पूर्णतः पश्चिमी प्रभाव से ओत-प्रोत कर देने में लगा है। संयम और सदाचार की भारतीय चिन्तन परम्परा को एक झटके में पीछे छोड तात्कालिकता ओर स्वेच्छाचार की पश्चिमोन्मुखी भोगवादी दृष्टि को अपनाने की उतावली में हैं आज के कुछ विचारक और साहित्यकार जिसमें हर चीज का महत्व उसके तात्कालिक उपयोग में है, हर वस्तु के मूल्य का निर्धारण उसके बाजार मूल्य से होता हे। ’’प्रयोग करो और फेंको‘‘ की इस बाजारवादी आधुनिक नीति के सम्मुख वह भारतीय चिन्तन इन्हें स्वाभाविक रूप से व्यर्थ और हेय लगता है जिसमें प्रकृति से लेकर जीव-जन्तुओं तक की उपयोगिता के प्रति एक कृतज्ञता का भाव रखने की प्रेरणा है। जिस पश्चिम के उन्मुक्त समाज पर आज का चिन्तक मुग्ध है वहां तो चयन की सभी को छूट है। अपने उपयुक्त जीवनसाथी की खोज स्वयं की जाती है और पहले प्रेम करके, लम्बे साहचर्य के पश्चात् एक दूसरे की रुचियां, पसन्द-नापसन्द आदि को जान-समझकर विवाह किया जाता है (यद्यपि विवाह फिर भी और वहां भी किया ही जाता है), तब क्यों वहां अधिकांश वैवाहिक सम्बन्ध पूरे जीवन नहीं निभ पाते और दूसरी ओर कैसे बिना एक-दूसरे को जाने-समझे, यहां तक कि देखे भी बिना, एक बार विवाह सम्बन्ध में बंध जाने के पश्चात् भारतीय पूरा जीवन सहजता से तालमेल के सहित साथ-साथ गुजार देते हैं-यह इन लोगों के सोचने का विषय है? मान्यता है कि पश्चिमी समाज में लोग पहले प्रेम करके फिर विवाह करते हैं और भारतीय विवाह करने के पश्चात् प्रेम करते हैं। और यह प्रेम उथला, छिछला, क्षणिक आवेगमय, तडक-भडक वाला या दिखावटी नहीं होता। स्थायित्व ओर गहराई लिये होता है जो कि समय बीतने के साथ-साथ और भी प्रगाढ होता चला जाता है। इसमें दिखावा या प्रदर्शन का महत्व नहीं, महत्व आत्मिक लगाव का होता है जो जीवन-यात्राा में आगे बढते जाने के साथ-साथ और भी गहरा होता जाता है तथा जो एक दूसरे के सुख-दुख के समय आन्तरिक आह्लाद या तडप के रूप में व्यक्त होता है। प्रीति-पात्रा के अपने ऊपर मर मिटने की कमना इस प्रेम में नहीं रहती, अपितु प्रीतिपात्रा के लिए अपने मर-मिटने की भावना इसमें रहती है। इसके अपवाद भी समाज में हजारों हैं लेकिन यदि वास्तविक गणना की जाये तो करोडों की संख्या में प्रायः नगण्य ही ठहरेगी। जीवन में प्रेम बहुत महत्वपूर्ण है, परन्तु जरूरी नहीं कि वह उच्छृंखल प्रेम ही हो। एक व्यवस्थित और मर्यादित प्रेम जीवन के उन्नयन के मार्ग में बाधक नहीं, साधक ही होता है। लैला-मजनू, शीरीं-फश्रहाद जैसे प्रेम अपवाद हैं और कहीं-कहीं, कभी-कभी ही ऐसी घटनाएं घटती हैं। लैला-मजनू किसी समाज का आदर्श नहीं हो सकते। वे कौतुक-कौतूहल का विषय ही हो सकते हैं। यही उनमें सामाजिक रुचि की निरन्तरता का कारण है। अचरज या विस्मय भरी दृष्टि के साथ ही समाज उनकी कथा सुनता है और सुनकर हा-हा या हाय-हाय करता है। यदि यही आदर्श होते तो हर युवा ऐसा ही बनने की प्रेरणा इन कथाओं को सुनकर लेता और हर मां-बाप अपने बच्चों को ऐसा ही बनने को प्रेरित करते। जरा कल्पना कीजिए कि यदि सभी लोग लैला-मजनू हो गये होते तो आज समाज किस दशा में होता और यदि आज भी सभी लैला-मजनू हो जायें तो समाज आगे किस अवस्था में होगा? सो, कोई भी अभिभावक अपने अवयस्क, नासमझ बच्चों को ऐसे ’महान‘ ’रूमानी‘ प्रेम का निर्णय लेने की छूट नहीं दे सकता और वयस्क तथा समझदार हो जाने पर कोई रोक भी नहीं है। इस देश के कानून के अनुसार प्रेम-विवाह या कोई भी विवाह करने के रास्ते में जाति, धर्म, कुल, खानदान, क्षेत्रा, भाषा, देश-विदेश आदि की अब तो कम से कम कोई बाधा नहीं है और ऐसे बहुत से उदाहरण भी समाज में मौजूद हैं। शायद प्रियंवद, जया या देवेन्द्र भी खुद नहीं चाहेंगे कि उनके बच्चे (यदि हों तो) किशोरावस्था से ही ’महान‘ प्रेम में पडें और ऐसा कर अपने अन्दर की मनुष्यता का रचाव करें तथा बाद में एक से अधिक प्रेम करते हुए आजीवन नये-नये प्रेम-पात्राों की खोज में लगे रहें। बीमार मानसिकता के हैं वे लोग जो वयस्क, समझदार और स्वाभाविक प्रेम को जाति, धर्म, कुल, खानदान, पद प्रतिष्ठा या अन्य कारणों से रोकने के लिए क्रूरता, जघन्यता और नीचता की नीची से नीची हद तक उतर आते हैं और मानवता का शर्मसार करते हैं। मानसिकता में विकार कहीं-न-कहीं उन लोगों की मानसिकता में भी है जो ऐसे कुछ लोगों की वजह से समूचे समाज को घृणित ठहरा कर उसे ध्वस्त करने का फतवा जारी करने लगते हैं। ऐसे लोगों के कुछ बुरे उदाहरण तो दिखयी पडते हैं लेकिन बहुत अच्छे उदाहरण नहीं दिखते। जाति, धर्म, कुल, खानदान, धन, पद, प्रतिष्ठ, प्रान्तीयता और राष्ट्रीयता तक की वर्जनाओं को तोडकर आज बहुत से सफल विवाह हो रहे हैं और उन्हें समाज स्वीकार भी रहा है, इसे भी देखने और उदाहरण बनाने की आवश्यकता है। अब यदि भाई-बहिन या बाप-बेटी जैसे रिश्तों में यह ’महान‘ प्रेम पनपेगा तो समाज चौतरफा थू-थू भी करेगा भले ही कोई कुछ भी कहे। नैतिकता की अपनी परिभाषा गढ लेने भर से किसी का हर कर्म-कुकर्म नैतिक नहीं हो सकता। समूह की या समाज की दृष्टि से परखे जाने से ही नैतिकता-अनैतिकता का निर्धारण होता है। असल समस्या यह है कि हमारे यहां कुछ लोग तो आधुनिकता को भी टांग तले से निकालकर उत्तर आधुनिक हो गये हैं और बहुत सारे लोग अभी आधुनिकता तक भी नहीं पहुंचे हैं। जरूरत उन लोगों को खींच-खांचकर आधुनिकता तक लाने की है। इसी में हमारी बहुत सी समस्याओं का समाधान निहित है। रही बात समाज की तो कल्याण हमारा समाज के विनाश में नहीं, उसके रचाव में ही निहित है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ’नाखून क्यों बढते हैं‘ निबन्ध में लिखा है-’उच्छृंखलता पशु की प्रवृत्ति है, ’स्व‘ का बन्धन मनुष्य का स्वभाव हैं‘ यह ’स्व‘ का बंधन मनुष्य को समाज से ही मिला है। इसी से हम अपनी प्रकृति से संस्कृति तक आये हैं और आगे अपने को विकृति से बचाये रख सकते हैं। मन को छुट्टा तुरग बना देने से उसे कहीं और कभी भी संतुष्टि नहीं मिल सकती। अनुशासन से ही चीजें सुन्दर बनती हैं और यह अनुशासन यदि बाहरी और भातरी दोनों तरफ से तालबद्ध होता है तभी जीवन सुन्दर राग में बदलता है अन्यथा फटे बांस की बेसुरी आवाज बनकर रह जाता है। सारे नियम, सारे रीति-रिवाज, परम्पराएं मनुष्य के भले के लिए ही बने हैं। समाज की उन्नति के लिये बने हैं इन्हें मनुष्य ने स्वयं सामूहिक रूप से बनाया और स्वीकार किया है, लेकिन समय सबको बदलता है, आवश्यकता और परिस्थितियां सबमें परिवर्तन कराती हैं। व्यक्तिगत रूप से मनुष्य ने कुछ मामलों में हमेशा समाज से छूट ली है और आज भी लेता है, भले ही इससे उसे हानि ही क्यों न उठानी पडी हो। एक बात तय है कि बीते हजारों वर्षों के इतिहास में ऐसे मनुष्य का निर्माण नहीं हो पाया है और आगे भी इस बात की कोई सम्भावना नजर नहीं आती कि बिना किसी व्यवस्था के वह स्वच्छन्द रूप से आन्तरिक अनुशासन के दम पर सुख-शान्ति से रह सके। बावजूद इसके कि हर व्यवस्था की अपनी कुछ कमजोरियां हैं, हर नियम-कानून में कुछ न कुछ खोट है और कोई भी व्यवस्था, कोई भी संस्था अपने में पूर्ण नहीं है। इसी अपूर्णता की बेचैनी और पूर्णता की खोज ही तो मनुष्य और समाज में परिवर्तन और गतिशीलता की कारक हैं। तो कहना यह है कि जरूरत बुराई से लडने और उसे विनष्ट करने की है, न कि उस धरातल को ही खोद डालने की जिस पर खडे होकर मोर्चा संभालना है। वरिष्ठ प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, जवाहरलाल नेहरू शासकीय महाविद्यालय, पासीघाट, अरुणाचल प्रदेश-७९११०३
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