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Vartmaan Sahitya ::February, 2007
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लघुकथाएँ पूरनसिंह
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दलित-विमर्श
दिल्ली का राजेन्द्र भवन देश के साहित्यकारों और समाजसेवियों से खचाखच भरा हुआ था। दरअसल पिछले दिनों, दलित साहित्य पर साहित्यिक पत्रिाका ’आंचल‘ ने अपना विशेषांक ’दलित-विमर्श‘ निकाला था। सभी लोग पत्रिाका के सम्पादक श्री द्विजेन्द्र भारद्वाज को बधाइयां दे रहे थे। भारद्वाज साहब बेहद खुश थे। कुछ दलित तो भारद्वाज साहब को मसीहा कहने में भी नहीं हिचकिचा रहे थे। कार्यक्रम शुरू हुआ। कार्यक्रम के संचालक श्री निगम जी ने संचालन किया। दरअसल श्री निगम जी ही इस दलित-विमर्श विशेषांक के अतिथि संपादक थे। कार्यक्रम में सर्वप्रथम बोलते हुए श्री भारद्वाज ने कहा, ’’मैं दुर्भाग्य से ब्राह्मण हूं। पीडतों के दर्द और उनकी कराह मैं जानता हूं। मैंने पिछले कई वर्षों से कहानी, कविता, गजल, नारी विशेषांक निकाले लेकिन मन में एक टीस-सी रही, लगा कहीं अन्दर ही अन्दर कुछ टूट रहा है। तो मैंने इस बार दलित विशेषांक निकालने की छोटी सी कोशिश की है। मेरे कुछ सवर्ण साथियों का मुझ पर दबाब भी रहा है लेकिन मैं जिद्दी हूं। मैं जो ठान लेता हूं करता हूं। दरअसल मुझे लगता है कि हमारे पूर्वजों ने जो अपराध किये हैं उनका प्रायश्चित हमारी पीढी को करना चाहिए। देखो, कहां तक मैं इस कार्य में सफल हो पाता हूं। अंक आफ सामने है निर्णय भी आपको लेना है। धन्यवाद‘‘। श्री भारद्वाज जी के पश्चात कुछ अन्य साहित्यकारों और समाज सेवियों ने भी श्री भारद्वाज जी की तारीफ में पुल बांधे और धीरे-धीरे कार्यक्रम अपनी समाप्ति की ओर बढने लगा। श्री भारद्वाज जी कार्यक्रम की समाप्ति के बाद अपने कुछ साथियों के साथ गाडी में बैठकर अपने घर पहुंच गये थे। रात काफी हो गई थी। खाने का प्रोग्राम शुरू हो गया था। तभी श्री दुबे जी बोल पडे थे, ’’भई मान गए भारद्वाज यार तुझे तो, क्या इमोशनल डायलॉग दिए तूने आज। तुझे देखकर तो कहीं से नहंी लगता था कि तू ब्राह्मण है।‘‘ और श्री दुबे जी ने व्हिस्की का एक पैग बनाकर भारद्वाज जी के सामने रख दिया था तथा दूसरा पैग श्री गुप्ता जी के सामने रखने के पश्चात् अपने लिए पैग लेते हुए मुर्गे की प्लेट से लग पीस खींचने लगे थे। ’’छोड ना यार दुबे, तू भी ना‘‘ लडकियों की तरह लजाये हुए श्री भारद्वाज ने भी खाना शुरू कर दिया था। ’’अबे शरमा मत साले ढोंगी।‘‘ श्री गुप्ता जी से नहीं रहा गया सो बोल पडे थे। ’’अच्छा बता अब तक कितना माल चीर चुका है इस अंक से। मेरा मतलब इस ’दलित-विमर्श‘ से‘‘। दरअसल श्री गुप्ता जी को श्री भारद्वाज जी की कमाई से जलन हो रही थी। ’’देखो भाईयो, मुझे इन दलितों वलितों से क्या लेना, भई पत्रिाका चलानी है तो चलानी है। यार कितने दिनों से कभी कविता तो कभी कहानी अंक निकाले जा रहे हैं कुछ नहीं बनता। अब इन पर भी एक कोशिश करके देख ली। पैसा भी मिला और इज्जत भी मिली।‘‘ श्री भारद्वाज जी बोले थे। और श्री दुबे जी की तरफ देखकर बोतल की तरफ इशारा किया था। श्री दुबे जी ने दूसरा पैग बनाते हुए कहा था, ’’ए भारद्वाज देखा था तूने, वह साला चौधरी तो बोलते बोलते रो पडा था।‘‘ ’’कौन सा चौधरी‘‘ श्री गुप्ता जी की जीभ लडखडाने लगी थी। ’’वही यार यू.पी. का चमार।‘‘ ’’देखो मैं तम्हें बताऊं‘‘ अपनी लडखडाती जुबान से श्री भारद्वाज जी बोले थे, ’’ये जो नीची जाति वाले लोग हैं न इन्हें आप इमोशनली ब्लेकमैल कर सकते हो। मैंने वही किया। इनके सामने उस अम्बेडकर का नाम ले लो। इन सालों की.... मैंने इनकी नस पकड ली है.... यार पत्रिाका निकालने और बच्चे पालने के लिए पैसे चाहिए वे क्या गुप्ता से आयेंगे। क्यों गुप्ता, बोलता क्यों नहीं। साले तू ऐसे ही जल और जल जल के मर....भाई मुझे तो पैसे चाहिए। मुझे इन साले भंगी-चमारों से क्या लेना, अपनी मां की.... चले जाएं ये और इनके मसीहा और ऊपर से चला जाए दलित-विमर्श।‘‘ इतना कहते-कहते श्री भारद्वाज जी सोफे पर ही पसर गए थे। श्री गुप्ता जी उन्हें घूरे जा रहे थे और दुबे जी बोतल में बची सारी शराब बिना पैग बनाए ही पिए जा रहे थे। पास में ही टेबल पर रखे पत्रिाका के दलित-विमर्श के अंक के ऊपर मीट से भरी प्लेट बिखरी पडी थी।
सुरक्षित सीट
ब्रह्मपुरा गांव में मात्रा पांच घर ही ब्राह्मणों के और बाकी पांच सौ घर चमारों, धोबियों, धनुकों और बाल्मीकियों के थे। पिछले एक लम्बे समय से इस गांव की प्रधानी पंडित दीनानाथ उपाध्याय के घर में ही रही है। अभी पिछले दिनों अचानक सरकार ने इस सीट को सुरक्षित घोषित कर दिया है तभी से पंडितजी की नींद हराम हो गई है। वह रात-दिन यही सोचते कि आखिर क्या किया जाय।
धीरे-धीरे प्रधानी का पर्चा भेजने का दिन भी पास आ गया। पंडित जी को अचानक ज्ञान प्राप्त हुआ और उन्होंने अपने घर में झाडू पौंछा कर रही अपनी नौकरानी सन्तो चमारिन से पर्चा भरवा दिया।
कुछ दिन पश्चात चुनाव हुए और सन्तो चमारिन विजयी हुई। अब पंडित दीनानाथ उपाध्याय प्रधानी करते हुए यही कहते हैं ’’चलो अच्छा हुआ प्रधानी रही तो हमारे ही घर में। आखिरकार सन्तो है तो हमारी अपनी ही न‘‘ और सन्तो चमारिन आज भी पंडित जी के घर में झाडू पौंछा करती है।
एक रचनाकार
आदरणीय आर.के. भारती जी की रचनाओं से मैं इतना प्रभावित था कि जब भी मैं उनकी रचनाओं को पढता तो सोचता कि शायद ही कोई इतना अच्छा दलितों, शोषितों, पीडतों के बारे में लिखता होगा। मुझे उनकी रचनाएं दलित साहित्य में माइलस्टोन लगतीं। वे ब्राह्मणों और ब्राह्मणवाद की ऐसी बखिया उधेडते कि लोग आश्चर्यचकित रह जाते।
एक दिन आदरणीय भारती जी मुझे एक सम्मेलन में मिल गए। मैं उनका भक्त था सो उनके पास पहुंच गया और अपना परिचय देने के पश्चात बोला था ’’साहब, आप तो मनुवाद की ऐसी पोल खोलते हैं कि कोई जबाब नहीं। अपनी रचनाओं में ढोंग-ढकोसलों पर जो प्रहार करते हो देखते ही बनता है। कभी आपको ब्राह्मणों से धमकी नहीं मिली।‘‘
’’मैं उनसे डरता नहीं हूं साहब।‘‘ उन्होंने सीना चौडा करते हुए कहा था।
’’खैर जो भी हो आपसे एक निवेदन था। अगले बुधवार को अगर आप फ्री हों और मेरे साथ लंच पर आएं तो मुझे बेहद खुशी होगी।‘‘ मैंने अपना प्रस्ताव उनके समक्ष रखा। ’’जरूर आता साहब लेकिन दरअसल वह क्या है कि अगले मंगलवार को मैं सपरिवार मां वैष्णों देवी के दर्शन के लिए जा रहा हूं इसलिए नहीं आ पाऊंगा। मैं साल में दो बार मां वैष्णों देवी के दर्शन के लिए अवश्य जाता हूं। जब भी समय मिलेगा आफ घर खाने पर अवश्य आऊंंगा।‘‘ इतना कह कर आदरणीय भारती जी ने हाथ जोड लिए थे और चल दिए थे। मैं अवाक-सा उन्हें देखता रह गया था।
बलिदान
’मानव मिश्रा ने आरक्षण के विरोध में आत्महत्या कर ली।‘ यह खबर प्रिंट और इलैक्ट्रानिक मीडिया में सुर्खियों में छायी रही। खबर सुनकर मंत्रिायों के पसीने छूट गये और विपक्ष की बांछें खिल गईं। आरक्षण विरोधी, आंदोलनकारी और उग्र हो गए थे।
बाद में, मानव मिश्रा का पोस्टमार्टम किया गया जिसमें डाक्टर ने अपनी रिपोर्ट में लिखा-’मानव मिश्रा की मृत्यु किसी जहरीले पदार्थ के खाने से हुई।....।‘‘ और पुलिस के जांच अधिकारी को मानव मिश्रा की पैंट की पीछे वाली जेब से एक पर्स मिला जिसमें एक छोटा सा कागज का पुर्जा रखा था जिस पर लिखा था, ’’आरती, मैं जानता हूं कि तुम मुझे प्यार नहीं करतीं। सच तो यह है कि मैं तुम्हारे जीवन में कभी था ही नहीं....। तुम तो हमेशा सागर को ही चाहती रहीं।.... आज से तुम आजाद हो। मैं तुमसे बहुत दूर जा रहा हूं। दूर.... बहुत दूर। हो सके तो मुझे मांफ....।‘‘
आरक्षण के खिलाफ मानव मिश्रा का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। जंग अब भी जारी है।

२४०, बाबा फरीदपुरी, पश्चिमी पटेल नगर,
नई दिल्ली-११०००८




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