कालिदास के बारे किंवदन्ती है कि उनकी पत्नी विदुषी विद्योत्तमा ने मूर्खता पर खीझ कर उन्हें छत से धकेल दिया। वे काली की प्रतिमा के सामने गिरे। उनकी जीभ कट गयी। खून की कुछ बूंदें काली पर पडीं। प्रसन्न होकर काली ने कालिदास को विद्या का आशीर्वाद दिया। कालिदास महामूढ से महाकवि हो गये। यह किंवदन्ती इतनी प्रचलित और मान्य है कि प्रायः संस्कृत साहित्य के सभी इतिहासकारों ने इसका उल्लेख किया है। संस्कृत के प्रखर आलोचक राधावल्लभ त्रिापाठी ने अपने ’संस्कृत साहित्य के अभिनव इतिहास‘ में इस किंवदन्ती को उद्धृत किया है।संस्कृत कवि राजेन्द्र मिश्र ने तो ’विद्योत्तमा‘ नाम से नाटिका भी लिख दी है। ’बहती गंगा‘ के यशस्वी लेखक शिवप्रसाद मिश्र ’रुद्र‘ ने ’महाकवि कालिदास‘ शीर्षक नाटक की रचना की है। यह नाटक वस्तुतः ’पूर्व कालिदास‘ पर केन्दि्रत है। इसमें रुद्र जी ने विद्योत्तमा प्रसंग का अत्यन्त सुन्दर विनियोग किया है। नाटक में विद्योत्तमा की छवि एक ऐसी विदुषी की है जिसकी तेजस्विता पुरुष दंभ को तार-तार कर देती है। पण्डितों के बीच ही नहीं, बल्कि इस किंवदन्ती को लोक के बीच भी स्वीकृति प्राप्त है। एक बे पढा-लिखा, सामान्य आदमी भी कालिदास के बारे में इस किंवदन्ती को तथ्य और तर्क के रूप में उद्धृत करता मिल जायेगा। कवि गुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अपनी ’सेकाल‘ कविता में ऐसी कोशिशों को निरर्थक बताते हुए कालिदास के निर्मल और सुन्दर काव्य-सरोवर में अवगाहन करने का प्रस्ताव किया है ः हाय रे, कबे केटे गेछे कालिदासेर काल! पण्डितेरा विवाद करे लये तारिख साल! कई बार ऐसा होता है कि जहां पण्डितों का पाण्डित्य चूक जाता है, शताब्दियां निरर्थक तर्क-वितर्क में बीत जाती हैं; वहां कवियों की मनीषा सहज ही उसका कोई हल प्रस्तुत करती है। स्थूल विवरणों के बरअक्स उनके साहित्य में मौजूद रस का अवगाहन और उनकी काव्य-प्रेरणाओं का निदर्शन ज्ष्यादा मूल्यवान और सार्थक प्रयत्न होगा। अब विद्वान जो भी कहें, पर लोक-सत्य तो यही है कि कालिदास को महाकवि बनाने में विद्योत्तमा की महत्वपूर्ण भूमिका थी। कथा के अनुसार विद्योत्तमा ने कालिदास को धकेल दिया। यह धकेलना दरअसल प्रवृत्त करना या उन्मुख करना ही है। विद्योत्तमा ने उन्हें घर की चारदीवारी से बाहर विस्तृत वृहद जीवन-समर में प्रवेश करने की प्रेरणा दी। स्त्राी मुक्ति में ही पुरुष मुक्ति निहित है। कालिदास की सभी रचनाओं में स्त्राी की सुकोमलता, सौन्दर्य और उसकी वेदना और गरिमा का रूप अवश्य मिलता है, राजा रवि वर्मा के चित्राों में उपस्थित रहने वाली स्त्राी की तरह। यह कौन स्त्राी है, जिसका सौन्दर्य और दुख बार-बार कालिदास की रचनाओं में मिलता है? रवीन्द्रनाथ ठाकुर की एक और कविता ’सूरदासेर प्रार्थना‘ याद आती है, जिसमें उन्होंने सूरदास से पूछा है कि राधा के जिस सौन्दर्य, प्रेम और विरह का सागर आपने रचा है, वह कौन थी किसकी विरह-तप्त आंखों के आंसू थे, जो राधा के नेत्राों में छलक पडे थे? हे कवि! तुमने उस विलक्षण प्रेमिका को कविता के महासागर में कहां छुपा दिया ः विरह तापित हेरि काहार नयान राधिकार अश्रु आंखि पडे छिलो मने? विजन बसन्त राते मिलन-शयने के तोमारे बेंधे छिल दुटि बाहु डोरे, आपनार हृदयेर अगाध सागरे रेखेछिल मग्न करि? ऐतो-प्रेम-कथा राधिकार चित्रा दीर्ण तीव्र व्याकुलता चुरि करि लइयाछ कार मुख, कार आंखि हते? आज तार नाहि अधिकार से संगीते? तारि नारि हृदय संचित तार भाषा हते तारे करिबे बंचित चिर दिन? सूरदास से ही नहीं यह प्रश्न कालिदास से भी पूछा जा सकता है-किसकी व्यथा, किसका प्रेम, किसका बिछोह तुम्हारे काव्य में झंकृत हुआ है? क्या उसे पूरी तरह उसकी ही निधियों से वंचित कर दोगे? शायद बडे कवियों की यह ख्ाासियत रही है कि वे निजी दुख को सार्वभौम दुख में रूपान्तरित कर देते हैं, निजी दुख का नामोनिशान नहीं मिलता और दुख को सार्वभौम सुधा-सागर में रच दिया जाता है, जिसमें शताब्दियां अवगाहन करती रहती हैं। नागार्जुन की कविता ’कालिदास सच-सच बतलाना‘ याद आती है। वे कालिदास से पूछते हैं-इन्दुमती के लिए अज का रुदन, अज का ही था या तुम्हारा था? यक्षिणी के लिए यक्ष का रुदन, यक्ष का था या तुम्हारा था? प्रश्न में ही यह साफश् संकेत है कि यह रुदन वास्तव में कालिदास का। अब यदि यह रुदन कालिदास का है तो इन्दुमती और यक्षिणी कौन हैं? ये महज काव्य-कल्पनाएं हैं या कि कोई वास्तविक चरित्रा, जिन्होंने कवि को गहन विरहानुभूति से भर दिया। या जैसा रवीन्द्रनाथ अपनी कविता में कहते हैं-’अर्धेक मानवी तुमि अर्धेक कल्पना‘। तो क्या कालिदास ने आधी मानवी में आधी कल्पना का मिश्रण करके उसे पूरी तरह अनाम रहने दिया है? ’मेघदूत‘ प्रेम की कविता है, विरह की कविता है और मिलन की कविता है। इस प्रेम का विस्तार समूची प्रकृति में रामगिरि से उज्जयिनी और उज्जयिनी से अलकापुरी के बीच प्रकृति की जितनी छवियां हैं, सब में मौजूद है। रास्ते, नदी, पहाड, वनस्पतियां सब इसमें समा जाते हैं। यहां एक बात आश्चर्य में डालने वाली है कि जहां कालिदास पहाडों तक का नामकरण करते हों, उन्हें यक्ष और यक्षिणी के लिए कोई नाम नहीं मिला। यक्ष भी अनाम है, यक्षिणी भी अनाम है। यह अनाम यक्षिणी अरूप नहीं हैं। रूप का वर्णन करते हुए यक्ष (या कवि) एक अत्यन्त मोहक और मूर्त रूप प्रस्तुत करता है- तन्वी श्यामा शिखरि दशना पक्व बिम्बाधरोष्ठी मध्ये क्षामा चकित हरिणी प्रेक्षणा निम्ननाभि ः। श्रोणीभारादलसगमना स्तोकनम्रा स्तनाभ्यां या तत्रा स्याद्युवतिविषये सृष्टिराद्येव धातुः। (उत्तरमेघ) हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इस रूप की व्याख्या यों की है-’’मेरी प्रिया के चित्त में उस अद्भुत प्रेमदेवता का निवास है, जो मनुष्य लोक में भी दुर्लभ है। इसलिए भीतर से बाहर तक वह कमनीय है। वह तन्वी है, पतली सुवर्ण-शलाका-सी। किशोर वय में जो नपे हुए कुन्दन का-सा। पीतरंग तरुणियों में श्यामा कान्ति निखार देता है, जिसके कारण यौवन के चढाव पर खडी तरुणियों को ’श्यामा‘ कहकर सहृदयजन उल्लसित होते हैं, वही रंग तुम उसमें तरंगित होते देखोगे। वह सच्ची ’श्यामा‘ है। मुझे व्याकुल विरही समझकर मेरे शब्दों को अन्यथा प्रयुक्त मत समझना। मुझे तो कभी-कभी ऐसा लगता है कि असली कुन्दन का श्यामाभ रंग विधाता एक ही बार बना सके थे और उसका उपयोग उन्होंने मेरी हृदयेश्वरी के बनाने में ही किया था। संयोग से ही वह मोहन रंग बन गया होगा, रोजष्-रोजष् थोडे वह संयोग आता है, बना सो बना। और उसके नन्हे-नन्हे नुकीले दांत? जब वह हंसती है तो मोती झरते हैं। शास्त्राों में जो लिखा है कि स्निग्ध, समान रूप वाले, एक कतार में समान भाव से विन्यस्त दांतों को ’शिखरी‘ कहते हैं, जो ताम्बूल रस से सिक्त होने पर भी स्फुट कान्तिवाले, समान भाव से चमका करते हैं, वह तो मानो उसी को देखकर लिखा है। वह सचमुच ’शिखरि-दशना‘ है। शास्त्राकारों की दृष्टि भी कहां-कहां तक जाती है। निश्चय ही वे त्रिाकालदर्शी होते हैं, नहीं तो इतने पहले इन सौभाग्यव्यंजक दांतों का अनुमान वे कैसे कर सकते थे? तुम इन सुन्दर दांतों को ताम्बूलरस-सिक्त देखते तो मेरी बात समझ सकते। कहां देख पाओगे? उसने साल-भर तक पान खाया ही नहीं होगा। मगर फिर भी उन ’शिखरी‘ दांतों को तुम पहचान लोगे। मगर मैं भी क्या प्रलाप कर रहा हूं। तुम्हें उसके दांत दिखेंगे कहां? हाय, उसने इन शाप-भ्रष्ट दिवसों में क्या कभी हंसने का अवसर पाया होगा मित्रा, विरह ने सब झुलसा दिया होगा। वे कुन्दकलिका के समान दांत कभी खुले ही नहीं होंगे। अधरोष्ठ भी सूख गये होंगे। परन्तु मेरा अनुमान है कि उन अधरों पर सहज विराजमान लालिमा, जो फ हुए बिम्बाफल में ही दिखायी देती है, अब भी वैसी ही होगी। तुमने ’पक्व बिम्बाधर‘ शब्द सुना होगा, इसका अर्थ समझना चाहो तो उसी के अधरों को देखकर समझ सकते हो। हाय, वे अधर अब कैसे हो गये होंगे। और वे चकित हरिणी के नेत्राों के समान भीत-चपल बडी-बडी आंखें? मित्रा, शोभा और विच्छित्ति उन आंखों के इशारे पर उठती-बैठती हैं। तुमने पह्यिनी जाति की उत्तम स्त्रायों की चर्चा सुनी होगी। महामाया का सबसे सुकुमार विलास स्त्राी-शरीर के अवयवों में आविर्भूत हुआ है और उस विलास का सर्वाधिक मोहक अधिष्ठान पह्यिनी नारी है। महामाया का यह त्रौलोक्य-मनोविलास पह्यिनी नारी के ’चकितमृगदृशाभप्रान्तरक्त‘ नयनों में उल्लसित होता है। मैं कहूं कि महाशक्ति का सर्वोत्तम उल्लास नारी के नयन-कोरकों में तरंगित होता है तो इसे गलत न समझना। एक बार जिसने इस प्रकार के शोभन नयनों का प्रसाद पा लिया वह धन्य है, उसने इस सृष्टि के मूल में स्पन्दित होने वाली महामाया का प्रसाद पा लिया है। तुम जिस क्षण प्रिया के उन मनोज्ञ नयनों को देखोगे उसी समय तुम्हें अपना जीवन चरितार्थ जान पडेगा, तुम्हारे शत-शत जन्मान्तर कृतार्थ जान पडेंगे। क्योंकि तुम विधाता की आदि-सिसृक्षा को प्रत्यक्ष रूप में देखोगे। यदि मेरी हृदयेश्वरी बैठी होगी तो तुम उसकी तनुता, उसकी श्यामता, उसकी अधर-शोणिमा और उसके स्निग्ध नयन-कोरकों को देखते ही पहचान लोगे। पर कदाचित् वह गृह-कर्म में लगी हो, शायद खडी हो, शायद चल रही हो। फिर भी तुम्हें उसे पहचानने में देर नहीं लगेगी। उसका कटि-प्रदेश बहुत पतला है, नाभि गम्भीर है, पीन-उन्नत वक्षःस्थलों के कारण वह आगे झुकी हुई-सी लगती है, श्रोणी-भार के कारण गति में अलग विक्षेप है, बहुत घीरे-धीरे चल पाती है। मैं ठीक कहता हूं मित्रा, विधाता की आदि-सिसृक्षा को तुम उसमें प्रत्यक्ष देख पाओगे। (मेघदूत ः एक पुरानी कहानी, पृ. १०८-११०) ध्यान दें कि कालिदास ने यक्षिणी के दांतों तक का नाम रख दिया है, पर यक्षिणी के लिए सामान्य यक्षिणी नाम ही रहने दिया है। तो क्या कालिदास ने यक्ष और यक्षिणी को जानबूझकर अनाम रहने दिया? क्या यह मूर्त का अमूर्तन है? यह अमूर्तन ही कला को सार्वभौम और विश्वजनीन बनाता है। यह अमूर्तन ही दांते की विएत्रिाशे को सबकी विएत्रिाशे बनाता है। वह नरक की यात्राा में भी कवि को प्रकाश दिखाती हुई चलती है, उस प्रकाश में सभी प्रकाशित अनुभव करते हैं। यह अमूर्तन ही कालिदास के प्रेम को यक्ष के प्रेम में और यक्ष के प्रेम को मनुष्य मात्रा के प्रेम में बदल देता है ; प्रिया के प्रति प्रेम विस्तारित होता है, उसमें देश भी शामिल होता हैव प्रकृति भी शामिल होती है। प्रिया और प्रकृति एकमेक हो गये हैं। विरह की गहनता में प्रेम की उदात्तता है। यह उदात्तता अन्तःकरण के आयतन को ऐसा विस्तार देती है कि जड और चेतन का भेद मिट जाता है- धूम ज्यातिः सलिलमरुतां सन्निपातः क्व मेघः सन्देशार्थाः क्व पटुकरणैः प्राणिभिः प्रापणीयाः। इत्यौत्सुक्यादपरिगणयन्गुह्यकस्तं ययाचे कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाचेतनेषुड्ड (पूर्वमेघ) एक बार फिर हजारीप्रसाद द्विवेदी की व्याख्या-’’धुएं, प्रकाश, जल और वायु से बना हुआ मेघ कहां और सन्देश ले जाने वाला चतुर सन्देशवाहक कहां! यक्ष का दिमाग खराब हो गया क्या? वररुचि ने बताया है कि प्रेमपत्रा ले जाने वाले को बहुत सावधान होना चाहिए। उसे हर अवस्था की सुकुमारता का ज्ञान होना चाहिए। हर्षातिरेक से विरही के प्राण-पखेरू उड जाते हैं, कभी लम्बी भूमिका से उनका दम घुट जाता है, कभी अनुकूल लोगों की संगति में बैठे हुए विरही शुभ-सन्देश के फलस्वरूप कष्ट पाने लगते हैं-हजार बातों का ध्यान रखना होता है और यह भाग्यहीन यक्ष इस जड मेघ को प्रेम-सन्देश का वाहक बनाना चाहता है। मगर यक्ष को यह सब सोचने की फश्ुर्सत नहीं थी। वह कामनाओं से कातर था, औत्सुक्य से आर्त्त था। ’आरत के चित रहै न चेतू‘-वह होश में नहीं था। ऐसा प्रायः देखा गया है कि प्रेम-वियोग की पीडा से जो लोग व्यथित होते हैं, वे चेतन-अचेतन, बडे-छोटे सबके सामने दयनीय होकर, कृपण होकर उपस्थित होते हैं। मानो हर आदमी उनके साथ सहानुभूति ही दिखाएगा, हर ईंट-पत्थर उनकी सहायता ही कर देगा। क्यों ऐसा होता है? क्या प्रेम-दशा में उत्थित व्यक्ति संसार के प्रत्येक जड-चेतन के भीतर किसी अन्तर्विलीन विराट् चेतना का सन्धान पा जाता है? जष्रूर पा जाता होगा। यक्ष तो पाने में अवश्य समर्थ हुआ था। उसने मेघ को परम सहानुभूति-सम्पन्न मित्रा के रूप में ही देखा, उसने हृदय गला देने वाला सन्देश भेजा। अत्यन्त विश्वसनीय घनिष्ठ मित्रा के सिवा और किसी से यह सन्देश नहीं कहा जा सकता। उसे आप पागल कहें, प्रकृतिकृपण कहें, पर उसने जगत् के भीतर निरन्तर स्पन्दित होने वाली विराट् चेतना को पहचान लिया था। (मेघदूत, एक पुरानी कहानी, पृ. १५-१६) प्रेम में यह सामर्थ्य है कि उससे होकर जगत् में व्याप्त विराट चेतना से साक्षात्कार हो जाय। जाहिर है, इस समूचे व्यापार के मूल में यक्षिणी रूपी वह अनाम स्त्राी ही है। कालिदास नारी को जो गरिमा और प्रतिष्ठा देते हैं वह अन्यत्रा दुर्लभ है। ’कुमार संभव‘ में शिव अवनतांगी पार्वती के खरीदे हुए दास बनने को प्रस्तुत हैं- अद्यप्रभृत्यवनतांगि तवास्मि दासः क्रीतस्तपोभिरितिवादिनि चन्द्रमौलौ। (कुमार संभव, पंचम सर्ग ८६) शिव पार्वती के दास बनने को प्रस्तुत हैं। सारी शिवभक्ति के बावजूद कालिदास पार्वती को या पार्वती रूपी स्त्राी को बराबरी की गरिमा प्रदान करते हैं। अज के लिए इन्दुमती महज प्रेयसी नहीं बल्कि घर संभालने वाली गृह स्वामिनी, सम्मति देने वाली मित्रा, एकान्त की सखी तथा गान विद्या आदि ललित कलाओं की प्रिय शिष्या थीं- गृहिणी सचिवः सखी मिथः प्रियशिष्या ललिते कलाविद्यौ। (रघुवंश, आठवां सर्ग/६७) कालिदास के यहां स्त्राी को महज विलास की सहचरी नहीं बल्कि जीवन के विविध क्षेत्राों में सहभागी बनाकर कालिदास उसकी गरिमा स्थापित करते हैं। इन्दुमती के मृत्यु शोक पर विलाप करते हुए अज ब&
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