सन् १८५७ के प्रथम स्वतंत्राता संग्राम में मेरठ से नर्मदा तक और बंगाल से दिल्ली तक क्रान्ति की ज्वालाएं धधक उठी थीं। मध्यप्रदेश के अन्य क्षेत्राों की तरह नर्मदा की पूरी घाटी आग की चपेट में थी। जबलपुर क्षेत्रा में विद्रोह का झण्डा उठाया गढा-मण्डला की वीरांगना दुर्गावती के वंशज राजा शंकर शाह, उनके पुत्रा रघुनाथ शाह और विजयराघवगढ के राजा सरजू प्रसान ने। राजा शंकर शाह गढा-मण्डला के गोंड शासक निजामशाह के पौत्रा और सुमेर शाह के पुत्रा थे। उनका राज्य अठारहवीं सदी के अंतिम चतुर्थाश में सागर के मराठा शासन के अधीन हो गया था। राजा शंकर शाह राज्य और अधिकार से वंचित हो गये थे, तथापि उन्हें अब भी पुराने राजवंश की प्रतिष्ठा प्राप्त थी। उन्हें ब्रिटिश शासन की ओर से पेंशन मिला करती थी और उन्हें तीन गांवों की कुल ९४७ बीघा जष्मीन ही जागीर के रूप में प्राप्त थी। जबलपुर में आने वाले तूफान के संकेत लगभग छह माह पहले ही दिखायी देने लगे थे। कमिश्नर डब्ल्यू सी. अर्सकाइन ने ’नेरेटिव ऑफ ईवेन्ट्स अटेंडिंग द आउटब्रेक ऑफश् डिस्टरबेंसेजष् एण्ड द रेस्टॉरेशन ऑफ अथारिटी इन द सागर-एण्ड-नर्मदा-टेरीटरीजष् इन १८५७-५८‘ में इसका वर्णन किया है। वह लिखता है कि जनवरी १८५७में ही जिले के अधिकांश भाग में एक गांव से दूसरे गांव छोटी-छोटी चपातियां रहस्यपूर्ण तरीके से भेजी जाती थीं। वे वास्तव में इस संदेश का प्रतीक थीं कि कई आकस्मिक और बडी घटना घटित होने वाली है, इसलिए आम लोगों को उसके लिए तैयार रहना चाहिए। वे आने वाली क्रान्ति के लिए जनता के आह्वान की प्रतीक थीं। देश के अन्य क्षेत्राों की तरह जबलपुर में भी ऐसी खबरें फैल चुकी थीं कि हिन्दुओं तथा मुसलमानों का धर्म भ्रष्ट करने के लिए घी, आटा और शक्कर में शासन के आदेश से क्रमशः सुअर की चर्बी, गाय का रक्त और हड्डी का चूरा मिलाया गया है। शीघ्र ही दिल्ली-मेरठ की घटनाओं की जानकारी जबलपुर पहुंची। परिणामस्वरूप वहां १९ और २२ मई को बहुत उत्तेजना फैली। इसके बाद आठ जून को झांसी की घटनाओं की सूचना पहुंची। इसका अन्दाज अंग्रेजषें को नहीं था कि ऊपर से शांत दिखने वाले वातावरण में भीतर ही भीतर चिंगारियां सुलग रही हैं। उसका एक संकेत तब मिला जब एडजुटेंट मिलर पर अपनी रेजीमेंट की गारद के निरीक्षण के दौरान एक सैनिक ने अपने बन्दूक से आक्रमण कर दिया। सैनिक को गिरफ्तार कर लिया गया। पता चला कि वह पागल था अतः उसे बनारस भेज दिया गया, लेकिन अंग्रेजों के असंख्य अत्याचारों में इस सैनिक के साथ किया गया व्यवहार एक मिसाल है। कर्नल नील ने, जो भारतीयों के प्रति प्रतिशोध से भरा हुआ था, घोषित कर दिया कि वह पागल नहीं है और उसे फांसी पर लटका दिया गया। फिर एक जुलाई को सागर में हुए सैनिक विद्रोह का उत्तेजक समाचार जबलपुर पहुंचा ं इस समाचार ने सैनिकों के अंसतोष में आग में घी का काम किया। ५२वीं बटालियन की तीन कंपनियों ने भी अपनी बंदूकें तान लीं, परन्तु उन्हें शान्त कर दिया गया। ऐसी अफवाहें फैलीं कि कुछ सरदार अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोही सैनिकों का साथ देने वाले हैं। संभावित हमलेसे आशंकित हो अर्सकाइन ने १८ जुलाई को एजेंसी हाउस की सुरक्षा को और मजबूत कर लिया तथा महिलाओं और बच्चों सहित कुल ४५ उन व्यक्तियों को ,जो सुरक्षा की दृष्टि से सिवनी तथा नरसिंहपुर नहीं भेजे गये थे, एक बडे कमरे में एक साथ रखा गया और वहीं उन्होंने भोजन किया। अर्सकाइन ने अपनी रिपोर्ट में स्वीकार किया कि ’निस्संदेह वह रात जबलपुर के यूरोपीय लोगों के लिए कम भयानक नहीं थी , क्योंकि कृत-संकल्प व्यक्तियों में से कुछ लोग जब हम भोजन कर रहे थे, उस समय उस बडे कमरे के दरवाजे से हम पर गोली चलाकर सबको मार सकते थे।‘ विद्रोह की प्रतिध्वनि दमोह और पन्ना रियासत की सीमाओं से भी सुनायी दी। नवाब सिंह नामक एक विद्रोही सरदार ने ५०० बुन्देलों के साथ १४ जुलाई को बिलहरी के किले पर कब्जा कर लिया तथा मुडवारा (अब कटनी जिले में) पर भी आक्रमण करने का विचार करने लगा। मनगढ राजा नामक एक अन्य क्रान्तिकारी सरदार ने जबेरा और कटंगी के निकट अंग्रेजी राज्य के विरूद्ध लोगों को बडी संख्या में एकत्रा कर लिया। क्रान्तिकारियों ने बडे साहस के साथ अपनी गतिविधियां जारी रखीं। इससे जबलपुर जिले में अराजकता की स्थिति निर्मित हो गयी। घबराकर जबलपुर के डिप्टी कमिश्नर ने १७ जुलाई को सुझाव दिया कि हिरन नदी के उत्तर में जहां विद्रोहियों के बडे-बडे सशस्त्रा दल एकत्रा हो रहे हैं, मार्शल लॉ लगा दिया जाए। जबलपुर की स्थिति गंभीर होती जा रही थी। अतः कामठी से चलित सैन्य (मूवेबल कालम) टुकडी सहायता के लिए बुला ली गयी। उसमें मद्रास की सैन्य टुकडी और तोपखाना शामिल था। चलनशील सैन्य टुकडी ने दो अगस्त को जबलपुर में प्रवेश किया। कुछ दिनों के बाद उस सैन्य टुकडी के अधिकांश भाग को पडोसी जिलों में शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए भेज दिया गया। इस फैसले का कुछ अंग्रेज अधिकारियों ने विरोध किया क्योंकि इससे जबलपुर में उन पर खतरा बढ गया था। शंकर शाह का नेतृत्व इस बीच जबलपुर में क्रान्तिकारी गतिविधियां निरन्तर बढती जा रही थीं। ५२वीं बटालियन के कुछ सैनिकों ने चलनशील सैन्य टुकडयों और उसके साथ आए यूरोपीय तोपचियों का विरोध किया था। सितम्बर के प्रारम्भ में इस बात के प्रमाण उपलब्ध थे कि कुछ सैनिकों तथा जागीरदारों ने विद्रोह की योजना बनायी थी। उन्हें गोंड राजा शंकर शाह का नेतृत्व प्राप्त था। वह अपने महल में गढ-पुरवा ग्राम में निवास करता था। अब वह जबलपुर नगर का हिस्सा है। जबलपुर स्थित ५२वीं बटालियन के कई सैनिक शंकर शाह के महल जाया करते थे। उनका अनेक विद्रोही नेताओं से निकट संपर्क बना हुआ था। इनमे ंबरगी के विद्रोही देवीसिंह तथा उमराव सिंह, मुगरमोहा के शिवनाथ सिंह और बरखेडी के जगत सिंह के नाम उल्लेखनीय हैं। इन विद्रोही नेताओं ने विद्रोह की भरसक तैयारी कर रखी थी। उन्होंने अपने गांवों के पास की पहाडयों में बडी संख्या में बंदूकें और तलवारें जमा कर रखी थीं। यह भी जानकारी मिली कि उनके साथ करीब दो सौ सशस्त्रा विद्रोही हैं। जबलपुर स्थित ५२वीं सेना में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध भावना बलवती होती जा रही थी। इस बटालियन के कुछ सैनिकों ने यूरोपीय लोगों को मार डालने की योजना बनाई, लेकिन इसके पहले कि वे अपनी योजना को कार्यान्वित कर पाते, अंग्रेज सैनिक अधिकारियों को इसकी जानकारी मिल गयी। चार सितम्बर को इन सैनिकों को पकड लिया गया और तोप से उडा दिया गया। योजना यह थी कि अन्य जागीरदारों और जमींदारों की सहायता से पर्याप्त सेना एकत्रा की जाए और मुहर्रम के अंतिम दिन ब्रिटिश छावनी पर आक्रमण किया जाए, लेकिन दुर्भाग्य से डिप्टी कमिश्नर को जबलपुर शहर के सेठ खुशाल चंद ने यह सूचना गुप्त रूप से दे दी कि राजा शंकर शाह और उनके पुत्रा रघुनाथ शाह के नेतृत्व में छावनी पर हमला कर उसे तहस-नहस करने और अंग्रेजों का खात्मा करने की पूरी तैयारी कर ली गयी है। इस योजना के बारे में अधिक जानकारी जुटाने के लिए डिप्टी कमिश्नर ने एक चाल चली। उसने एक चपरासी को फकीर के वेश में राजा शंकर शाह के पास भेजा। राजा और उनका पुत्रा राघुनाथ शाह उस छद्म भेषी गुप्तचर की लच्छेदार बातों के धोखे में आ गये। उन्होंने उसे अपने उद्देश्य और वे साधन जिनके द्वारा छावनी पर हमला किया जाना था, विस्तार से गुप्तचर को बता दिये। यह महत्वपूर्ण सूचना प्राप्त कर डिप्टी कमिश्नर और लेफ्टी० बाल्डविन २० सवारों और ४० पुलिसवालों के बडे दल के साथ राजा के महल की ओर १४ सितम्बर को रवाना हुआ। जब राजा का निवास लगभग डेढ किलोमीटर दूर रह गया तो डिप्टी कमिश्नर कुछ सवारों को साथ लेकर आगे बढा और उसने पुरवा ग्राम को चारों ओर से घेर लिया। पुलिस के पहुंचने पर राजा शंकर शाह, उनके पुत्रा रघुनाथ शाह और तेरह अन्य व्यक्तियों को गिरफ्तार कर लिया गया तथा उन्हें छावनी की जेल में बन्द करा दिया गया। राजा के निवास की तलाशी लेने पर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ विद्रोह करने की भावना व्यक्त करने वाले अनेक दस्तावेज मिले। उन कागजातों में राजा शंकर शाह द्वारा लिखित एक प्रार्थना भी अंग्रेजों के हाथ लगी, जिसमें उन्होंने अपनी आराध्य देवी से याचना की थी। याचना की गयी थी कि देवी जी अंग्रेजों का खात्मा करने में उनकी सहायता करें। यह प्रार्थना उस सरकारी घोषणा-पत्रा में एक ओर लिखी गयी जो मेरठ विद्रोह के उपरांत अंग्रेजों ने जारी किया था। कागज का यह टुकडा राजा के पलंग के पास एक थैली में रखा था। प्रार्थना इस प्रकार थी- मूंद मुख डंडिन को, चुगलों को चबाई खाई खूंद डार दुष्टन कों श.त्राु-संहारिका मार अंगरेज, रेज कर दे मात चण्डी बचै नहिं बैरी बाल-बच्चे संहारिकाड्ड संकर की रक्षा कर, दास प्रतिपाल कर दीन की पुकार सुन, अय मात कालका खाई ले मलेछन कों, देर नहीं करौ मात भच्छन कर तच्छन, घोर मात कालिकाड्ड यह प्रार्थना शंकर शाह की अंग्रेजों का खात्मा करने की तीव्र आकांक्षा की द्योतक है। उन्हें आशा थी कि उनके इस पवित्रा उद्देश्य में आराध्य माता देवी उनकी सहायक होंगी। राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह की गिरफ्तारी से ५२वी सेना में उत्तेजना फैल गयी। कारण साफ है। इस बटालियन के सैनिक राजा के निकट संपर्क में थे और उनके नेतृत्व में विद्रोह की तैयारी कर चुके थे। उन्होंने राजा को जेल से मुक्त कराने का पूरा प्रयास किया परन्तु वे असफल रहे। अंग्रेज यह अच्छी तरह जानते थे कि राजा शंकर शाह की आजादी जबलपुर स्थित अंग्रेजों की मौत का कारण बन जाएगी। इसलिए उन्होंने डिप्टी कमिश्नर और दो ब्रिटिश अधिकारियों की एक तीन सदस्यीय सैनिक अदालत बैठायी। अंग्रेजों की सैनिक अदालत का न्याय क्या होगा यह सभी जानते थे। अदालत ने बडी जल्दबाजी में निर्णय दिया कि राजा और उनका पुत्रा भीषण देशद्रोह के अपराधी हैं और उन्हें मृत्यु दण्ड दिया गया। १८ सितम्बर को जबलपुर में एजेन्सी हाउस के सामने फांसी परेड हुई। दो तोपें एजेन्सी हाउस अहाते में लायी गयीं। इसके बाद राजा शंकर शाह तथा रघुनाथ शाह लाए गये। उनके चेहरों से दृढता झलक रही थी। एकत्रा अपार जनसमूह को नियंत्रिात करने के लिए पैदल सैनिकों और घुडसवारों की टुकडयां तैनात थीं। ये टुकडयां दौड-दौड कर तोपों के आसपास के बेचैन, उत्तेजित जनसमूह को पीछे धकेल रही थीं। शंकर शाह और रघुनाथ शाह की हथकडयां और बेडयां निकालकर उन्हें तोपों के मुंह पर बांध दिया गया। तोपों के मुंह पर बांधे जाने के समय राजा शंकर शाह ने प्रार्थना की कि माता देवी उनके बच्चों की रक्षा करें ताकि वे अंग्रेजों को भस्म कर सकें। चार्ल्स बॉल ने ’द हिस्ट्री ऑफ इण्डियन म्यूटिनी‘ में लिखा है कि ’बूढा आदमी दृढता और हेकडी के साथ तोपों तक चलकर गया।‘ मार्टिन ने ’द इण्डियन एम्पायर‘ में लिखा है पिता और पुत्रा को १८ सितम्बर को तोपों से बांधकर उडा दिया गया। हिम सदृश बालों वाले वृद्ध पुरुष ने अन्त समय तक अपने गौरव को आंच नहीं आने दी। यह संपूर्ण कार्रवाई सार्वजनिक रूप से की गयी और लोगों को यह दृश्य देखने के लिए बुलाया गया। तोपचियों को तोप दागने की आज्ञा दी गयी और तोपें चलते ही पिता-पुत्रा के अंग क्षत-विक्षत होकर चारों ओर बिखर गये। रानी की ओर से अधजले अवशेषों को एकत्रा कराया गया। घटनास्थल पर उपस्थित एक अंग्रेज अधिकारी ने राजा तथा उसके पुत्रा को तोप से उडाए जाने के दृश्य का हृदय विदारक वर्णन किया है- ’मैं अभी अभी विद्रोही राजा और उनके पुत्रा को तोप से उडाए जाने का दृश्य देखकर वापस लौटा हूं। वह एक भयानक दृश्य था। उनके हाथ और पैर, जो बांध दिये गये थे, तोप के मुंह के पास पडे थे। सिर और शरीर का ऊपरी भाग सामने की ओर लगभग ५० गज की दूरी पर पडे थे। उनके चेहरों को जरा भी क्षति नहीं पहुंची थी। वे बिल्कुल शांत थे। उनके चेहरे पूर्ववत् निर्विकार रहे, उनकी गरिमा अक्षुण्ण रही।‘ इस प्रकार शंकर शाह और उनके पुत्रा रघुनाथ शाह ने गढा-मण्डला की गौरवशाली बलिदानी परम्परा में एक और अध्याय जोडा। उससे लगभग तीन सौ वर्ष पहले गढा-मण्डला के गोंड राज्य की वीरांगना दुर्गावती ने मुगल साम्राज्य के विरुद्ध हथियार उठाये थे और स्वतंत्राता के लिए बलिदान हुई थीं।
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