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Vartmaan Sahitya ::February, 2007
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बुन्देलखण्ड ः सागर का संग्राम शंभु दयाल गुरु
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हुआ वही जिसकी अंग्रेजों को आशंका थी। एक जुलाई, १८५७ को सबेरे-सबेरे पूरी तीसरी सेना ने सागर में विद्रोह का झण्डा बुलंद कर दिया। केवल भारतीय अधिकारी और ५० घुडसवार सैनिक ही डरपोक निकले। वे विद्रोह से किनारा कर गये। अर्सकिन ने ’नेरेटिव‘ में लिखा है कि ’एक जुलाई को सागर स्थित ’तीसरी अनियमित सेना ने केन्टोनमेन्ट में खुली बगावत कर दी, वह मस्जिद में गयी और अपनी तलवारें पैनी कीं। उसी समय शेख रमजान ४२वीं सेना के वरिष्ठ सूबेदार ने नगाडे की चोट पर अपने अनुयायियों का आह्वान किया और विद्रोह का झण्डा उठा लिया। ४२ वीं के पूरे और ३१वीं सेना के कुछ सैनिक उसके साथ हो गये। तीसरी अनियमित घुडसवार सेना के पूरे सैनिक भी उससे मिल गये। विद्रोहियों और सदर बाजार के लोगों ने केन्टोनमेन्ट में अधिकांश आफिसरों के निवासों को लूट लिया और उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया।‘ अगले दिन दो जुलाई को विप्लवी सैनिक दमोह की ओर चले गये)। मध्यप्रदेश के बुन्देलखण्ड क्षेत्रा को सदा से वीर-प्रसू भूमि होने का गौरव प्राप्त रहा है। इसी क्षेत्रा में प्रतापी चंदेलों ने एक स्वतंत्रा राज्य की स्थापना कर लगभग चार सौ वर्षों तक राज्य कर यश की कीर्ति-पताका फहरायी। उनके द्वारा निर्मित खजुराहो के विश्व विख्यात मंदिर आज भी माथा ऊंचा किये खडे हैं और उनका यशोगान कर रहे हैं। वीर बुन्देला छत्रासाल ने सत्राहवीं सदी में अपने शौर्य और पराक्रम से संपूर्ण बुन्देलखण्ड को मुगल सत्ता से मुक्त कर लिया। इसी क्षेत्रा के सागर दमोह, नरसिंहपुर, जबलपुर में सन् १८४२-४३ के बुन्देला विद्रोह ने अंग्रेजी सत्ता की नीवें हिला दी थीं। अतः स्वाभाविक ही, जब १० मई, १८५७ का जनता की क्रोधाग्नि, अग्नि-शिखाओं के रूप में प्रज्जवलित हो गयी तो बुन्देलखण्ड के गांव-गांव में लोग हथियार लेकर अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध उठ खडे हुए। स्वातंत्र्य सेनानियों ने सागर और दमोह जिलों में ब्रिटिश सत्ता के परखचे उडा दिये। करीब आठ माह तक सागर में और चार माह तक दमोह में ब्रिटिश शासन का नामोनिशान मिट गया था। यातायात के अपर्याप्त साधनों के बावजूद मेरठ-दिल्ली में क्रांति के विस्फोट की खबरें १७ मई को सागर पहुंच चुकी थीं, लेकिन सागर में तत्काल विद्रोह नहीं भडका। फिर आठ जून को झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के संघर्ष की वीरगाथा सागर पहुंची। इसके साथ ही यह सूचना भी मिली कि बानपुर के राजा मर्दनसिंह ने ललितपुर में क्रांतिकारियों की एक बडी सेना इकट्ठी कर ली है और उसने ललितपुर स्टेशन घेर लिया है। इस क्षेत्रा के कमिश्नर मेजर अर्सकिन ने भारत सरकार को १० अगस्त, १८५८ को प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट ’नेरेटिव ऑफ ईवेन्ट्स अटेन्डिंग द म्यूटिनीज एण्ड रिवोलियन इन सागर एण्ड नर्बदा टेरिटरीज १८५७-५८ में लिखा है कि-विस्फोट के छह माह पहले ही सागर में आने वाले तूफान के संकेत मिलने लगे थे। उसने लिखा है कि-जनवरी १८५७ में छोटी-छोटी चपातियां रहस्यमय ढंग से सागर और अन्य जिलों में भेजी जा रहीं थीं। वे एक संदेश थीं और यह आह्वान भी कि आने वाले विप्लव के लिए लोग तैयार रहें। फिर अप्रैल माह में बंगाल को रेजीमेन्ट्स की ओर से पत्रा मिले कि ग्रीस लगे नये कार्तूस उनका धर्म नष्ट करने के उद्देश्य से अंग्रेजों ने तैयार करवाये हैं और मई माह में सागर में यह खबर दावानल की तरह फैल गयी कि घी, आटा और शक्कर में शासन के आदेश से गाय और सुअर को हड्डियों का चूरा और खून मिलाया गया है ताकि हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों का धर्म भ्रष्ट किया जा सके। उधर बानपुर के राज मर्दनसिंह के साथ-साथ शाहपुर के राजा बखतबली ने भी अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार उठा लिए। वास्तव में सागर जिले में और कुछ हद तक दमोह जिले में ब्रिटिश सत्ता को उखाड फेंकने का जो भीषण संग्राम हुआ, उसमें इन दोनों की भूमिका केन्द्रीय थी। बखतबली ने, जिनकी रियासत सागर और दमोह जिलों में फैली थी, अंग्रेजों से संग्राम करने के लिए सैनिकों की भर्ती शुरू कर दी। इस बीच चन्देरी के डिप्टी कमिश्नर ने राजा मर्दनसिंह के आक्रमण के विरुद्ध ललितपुर की रक्षा के लिए सहायता मांगी। अतः १६ जून को सागर से मेजर गॉसन की कमान में एक फौजी टुकडी भेजी गयी। चार सैनिकों ने विद्रोह के तेवर अपनाते हुए फौजी टुकडी को आगे बढने से रोक दिया, परंतु उन्हें गिरफ्तार कर होशंगाबाद भेज दिया गया। जब गॉसन फौज के साथ मालथोन पहुंचा, जो कि झांसी मार्ग पर है, तो यह देखकर उसके होश उड गये कि उत्तरी दर्रे पर बानपुर के बुन्देला विद्रोहियों का कब्जा है। उसने अतिरिक्त सैन्य सहायता के लिए सागर खबर भेजी। सागर से मेजर सेज ने तुरंत ३१वीं बंगाल पैदल सेना और ४२वीं बंगाल रेजीमेंट के क्रमशः २५० और १०० सैनिक साथ ही ५० घुडसवार गॉसन की मदद के लिए भेजे, तब गॉसन ने संयुक्त फौजी टुकडी के साथ बालाबेहट के किले पर, जो कि स्वातंत्र्य सैनिकों के कब्जे में था, आक्रमण किया। एक मुठभेड के बाद २३ जून को किले पर अंग्रेजों ने कब्जा कर लिया और दुर्गरक्षक १६ सैनिक बंदी बना लिए गये। अर्सकिन ने अपनी रिपोर्ट ’नेरेटिव‘ में लिखा है कि-राजा मर्दनसिंह ने ब्रिटिश फौज के भारतीय सैनिकों को आश्वासन दिया था कि बुन्देला उनके मित्रा हैं। पत्रा द्वारा बानपुर राजा ने ्रप्रत्येक विद्रोही सैनिक को १२ रुपये प्रतिमाह वेतन देने का भी भरोसा दिया था, यदि वे अंग्रेजों का साथ छोडकर उनके विरुद्ध संघर्ष में शामिल हो जाएं। राजा मर्दनसिंह के पत्रा ने पहले से ही उत्तेजित सैनिकों के निश्चय को दृढ कर दिया। मालथोन स्थित ३१वीं और ४२वीं बंगाल सेना के सैनिकों ने खुली बगावत कर दी। उन्होंने मेजर गॉसन को घेर लिया और आक्रामक तेवर में उसे बालाबेहट किले से बन्दी बनाये गये सैनिकों को रिहा करने के लिए धमकाया। विद्रोही सैनिकों को भय था कि यदि बन्दियों को सागर भेजा गया तो वहां उन्हें फांसी पर लटका दिया जायेगा। विप्लवी सैनिकों की धमकी से घबराकर गॉसन को बन्दियों को छोडने पर विवश होना पडा। विद्रोही सैनिकों ने इतनी भलमनसाहत दिखायी कि गॉसन को बिना कोई क्षति पहुंचाये सागर लौट जाने दिया। मालथोन में सैनिकों के विद्रोह के बाद क्रांतिकारी सैनिकों की शक्ति में इजाफा हुआ। बानपुर के राजा मर्दनसिंह और शाहगढ के राजा बखतबली सागर जिले में क्रांतिकारी सैनिकों का नेतृत्व कर ही रहे थे। अब उन्हें नरहट के ठाकुरों और अन्य अनेक विद्रोहियों का सहयोग भी मिल गया। अंग्रेजी राज को समाप्त करने के लिए क्रांतिकारी कभी एकजुट होकर और कभी अलग-अलग मोर्चों से ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देने लगे। अंग्रेजों को भय सताने लगा कि सागर की जनता उठ खडी हुई है तो दमोह और जबलपुर भी उसी पर चल पडेंगे। सागर की चिन्ताजनक परिस्थिति को देखते हुए ब्रिगेडियर सेज ने, जो सागर स्थित सेना का कमाण्डर था, सागर शहर में तालाब के किनारे स्थित पुराने बुन्देला किले में जिले का सारा खजाना यूरोपीय परिवार और तोपची, मय गोला-बारूद के २९ जून को सुरक्षित कर लिए। कमिश्नर अर्सकिन और भारत सरकार ने भी ब्रिगेडियर सेज के इस निर्णय को गलत करार दिया। उनका मत था कि भारतीय सैनिकों को बिना यूरोपियन आफीसरों के किले के बाहर छोडने से न केवल सागर, वरन नागोद, दमोह और जबलपुर के भारतीय सैनिकों पर खराब प्रभाव पडा। हुआ वही जिसकी अंग्रेजों को आशंका थी। एक जुलाई १८५७ को सबेरे-सबेरे पूरी तीसरी सेना ने सागर में विद्रोह का झण्डा बुलंद कर दिया। केवल भारतीय अधिकारी और ५० घुडसवार सैनिक ही डरपोक निकले। वे विद्रोह से किनारा कर गये। अर्सकिन ने ’नेरेटिव‘ में लिखा है कि-’एक जुलाई को सागर स्थित ’तीसरी अनियमित सेना के केन्टेनमेन्ट में खुली बगावत कर दी, वह मस्जिद में गयी और अपनी तलवार पैनी की। उसी समय शेख रमजान ४२वीं सेना के वरिष्ठ सूबेदार ने नगाडे की चोट पर अपने अनुयायियों का आह्वान किया और विद्रोह का झण्डा उठा लिया। ४२वीं के पूरे और ३१वीं सेना के कुछ सैनिक उसके साथ हो गये। तीसरी अनियमित घुडसवार सेना के पूरे सैनिक भी उससे मिल गये। विद्रोहियों ने और सदर बाजार के लोगों ने केन्टेनमेन्ट में अधिकांश आफिसरों के निवासों को लूट लिया और उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया।‘ अगले दिन दो जुलाई को विप्लवी सैनिक दमोह की ओर चले गये। क्रांतिकारी सेना के नेता सूबेदार रमजान खान जो कि ४२वीं भारतीय सेना में ’जनरल‘ की उपाधि धारण कर ली। आर्टिलरी हिल की बडी तोप पर कब्जा कर लिया और ४२वीं सेना के क्वार्टर गार्ड ले आया गया क्योंकि क्रांतिकारियों का वह मुख्यालय बना दिया गया था। इसी बीच ३१वीं सेना के ४५ विद्रोही, ४२ वीं पैदल सेना और तीसरी अनियमित घुडसवार विप्लवी सैनिकों से जा मिले। तीन जुलाई को सागर के डिप्टी कमिश्नर ने कमिश्नर अर्सकिन से सहायता भेजने की अपील की, परंतु कमिश्नर ने सहायता भेजन में असमर्थता व्यक्त की। नागपुर के कमिश्नर प्लाउडन ने भी कोई भी मदद भेजने से साफ इन्कार कर दिया। ऐसी परिस्थिति में जबकि अंग्रेजी हुक्मरानों की हालत सागर में पतली थी, क्योंकि एक अपवाद को छोडकर सागर स्थित सभी भारतीय सैनिक बगावत कर चुके थे। वह अपवाद थी ३१वीं सेना। उसके अधिकांश सैनिक अंग्रेजों के प्रति वफादार बने रहे और सागर शहर में विद्रोह को कमजोर करने का कलंक उनके माथे पर लगा। विप्लवी सैनिकों और अंग्रेज परस्त ३१वीं सेना में रात-भर बन्दूकों से लडाई चलती रही। विप्लवी सैनिकों को आशंका थी कि सागर किले में सुरक्षित तोपों का अगली सुबह उनके विरुद्ध इस्तेमाल होगा, रात में ही उन्होंने जल्दी में बन्दूकें और रसद विभाग के हाथी लेकर सागर छोड दिया। कुछ क्रांतिकारी सैनिकों ने दमोह की राह पकडी, जबकि कुछ अन्य छतरपुर की ओर रवाना हुए। लेकिन क्रांतिकारी संघर्ष केवल सागर शहर तक सीमित नहीं था। विद्रोह की लपटें पूरे सागर जिले में फैल चुकी थीं। क्रांतिकारियों ने सारे जिले में ब्रिटिश सत्ता के परखचे उडा दिये थे। राहतगढ के किले पर भोपाल रियासत में गढी-अम्बापानी के नवाब आदिल मोहम्मद खान और फाजिल मोहम्मद खान ने अधिकार कर लिया था। मुगल खानदान का शाहजादा फिरोजशाह और अन्य विद्रोही सरदार भी राहतगढ में इकट्ठे हो गये थे। यह जानकारी ’फ्रीडम स्ट्रगल इन यू.पी.‘ जिल्द दो में दी गयी है। राजा बानपुर, मर्दनसिंह और राजा शाहगढ बखतबली पहले ही अंग्रेजी राज के विरुद्ध क्रांति का डंका बजा चुके थे। उन्होंने बुन्देलखण्ड के राजाओं और जागीदारों को पत्रा लिखकर विद्रोह में शामिल होने का आह्वान किया। बखतबली ने पांच जुलाई को नरहट और मालथोन पर अधिकार कर लिया। सात जुलाई को उन्होंने बंडा और घामोनी और आठ जुलाई को बिनैका और पंचमनगर अंग्रेजों से छीन लिया। १४ जुलाई को शाहगढ राजा ने गढाकोटा पर अपना झण्डा फहरा दिया। बखतबली वीर बुन्देला छत्रासाल महाराज के वंशज थे और गढाकोटा उन्हीं के राज्य में था। बाद में गढाकोटा उनसे छिन गया। बखतबली अपने पूर्वजों की इस विरासत को पुनः पाने की जो-तोड कोशिश में लगे थे। १८५७ की क्रांति के अवसर पर उन्हें अपनी आकांक्षा पूरी करने में सफलता मिली। उधर बानपुर के राजा मर्दनसिंह अपनी तलवार के जौहर दिखा रहे थे। उन्होंने छह जुलाई को खिमलासा, अगले दिन खुरई और फिर आठ जुलाई को एरण को अपने अधिकार में ले लिया। साथ ही नरयावली पर चंद्रपुर के जवाहर सिंह ने १४ जुलाई को कब्जा कर लिया। वास्तव में मर्दनसिंह और बतखबली योजनाबद्ध तरीके से जिले के अलग-अलग क्षेत्राों में पूरे मनोयोग और सहयोग से संघर्ष कर रहे थे। उन्होंने जागीरदारों को जो पत्रा लिखे थे, उनका गहरा असर हुआ। अनेक विदेशी सत्ता उखाड फेंकने के लिए जी-जान से जुट गये। सागर में इनमें सागर के जंगासिंह, बलभद्र सिंह, बखतबली के भाई लक्ष्मण ंसह, नवाब कादर खांन पिंडारी और दौलत सिंह के नाम उल्लेखनीय हैं। इस प्रकार जुलाई के अंत तक सागर के किले को छोडकर पूरे जिले पर क्रांतिकारियों का कब्जा हो गया। संघर्ष जारी था। सात अगस्त को लक्ष्मण सिंह के नेतृत्व में गढाकोटा के विद्रोहियों ने रहली को अपने अधिकार में ले लिया। इसी बीच बानपुर का राजा सागर केन्टोनमेन्ट पर हमला करने के लिए सागर के निकट रतौना तक आ गये, परन्तु ब्रिगेडियर सेज ने एक बडी सेना भेज दी, जिससे उन्हें पीछे हटना पडा। ब्रिटिश शासन विकट परिस्थिति का सामना कर रहा था पुलिस थाने खाली हो गये थे और डाक और तार व्यवस्था पूरी तरह ठप्प हो गयी थी। इंदौर स्थित सीतामऊ रियासत के दूत वजीर बेग ने १७ सितंबर, १८५७ को पत्रा लिखकर बुन्देलखण्ड की स्थिति का खाका खींचा है। वह लिखता है, ’बुन्देलखण्ड रजवाडे बदल रहे हैं, सो बम्बई से फौज गोरों की लेकर सिकत्तार साहब, बन्दोबस्त में सागर में आये हैं और लामबन्द रहा है और मुकाबले पर राजे स्मागढ (शाहगढ) और बानपुर वाले तैयार हैं।‘ वजीर बेग ने बम्बई से फौज आने की सूचना भी दी है। वह दो फरवरी, १८५८ के पत्रा में लिखता है ’और बुन्देलखण्ड में दो-एक रईस और बदले, सुना है और उधर बडा गदर है, परसों गोरे काले सवार पैदल पांच हजार फौज बम्बई से इस जगह (इन्दौर) आयी। रात रहकर सागर की तरफ गयी। कल पांच हजार गाडी, ऊंट, बैल, दारू गोला, मैग्जीन तोप छह-आठ छोटी, दो बडी। ये सामान बम्बई से आया है।‘ वास्तव में अंग्रेजी शासन के सामने मऊ और कामठी (नागपुर) की फौजी छावनी से सेना बुलाने के सिवाय बुन्देलखण्ड में बचने का कोई रास्ता नजष्र नहीं आ रहा था। इंदौर स्थित सेन्ट्रल इण्डिया के एजेन्ट टू दि गवर्नर जनरल सर राबर्ट हेमिल्टन से सेन्ट्रल इण्डिया की सेनाओं के कमाण्डर सर ह्यू रोजष् को सागर भेजने का फैसला किया। मऊ से रवाना होकर आठ जनवरी, १८५८ को राबर्ट हेमिल्टन के साथ ह्यू रोजष् सीहोर पहुंचा। ह्यू रोजष् एक प्रतिष्ठित सैनिक था। उसे यह समझते देर नहीं लगी कि यदि सागर को क्रांतिक

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