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Vartmaan Sahitya ::February, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner चार कविताएं
अनामिका शिव
ईर्ष्या सूर्ख लाल कडाह में तैरता गोल मांस का टुकडा सूर्योदय का पाखण्ड है अंधेरे में खो जाती है औरत की देह बिंदु के विषाद में स्खलित हो जाती है चेतना और जो बच जाता है वह मैं नहीं/औरत मेरे अलावे सब कुछ है स पहचान हां दिये हैं तुमने ढेर सारे सुख आनंद/ऐश्वर्य टांग दिया मैंने या टंग गया मेरा अस्तित्व सलीब पर परख जरूरी है आश्वस्त होना है और फिर करना है खुद से एक सवाल कि इनमें कौन सा सुख मेरा है स रिश्ते रिमोट कन्ट्रोल की तरह आखों से निकली तंरगे देह पर फैल जाती है कुलबुलाते रेंगते कीडो से सारी देही सपसपाती है रिश्ते गठिया के पुराने रोग से जोडो में बस गये हैं आस्तीन के सांप आस्तीन की जरूरत बन गये हैं। स अखबार और मैं मैं रोज के अखबार की तरह तलाशी जाती हूं और पूरे दिन खबरों में बनी गुजरी हुई रात के बाद बासी हो जाती हूं फिर समाप्त हो जाती है मुझे पाने या पढने की तलब और नियति से जूडी तब्दील हो जांऊगी पैकेट बंडल या रद्दी के ढेर में स
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