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Vartmaan Sahitya ::February, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner बहिश्त का सफर
अल्तमश मोतिमुलअश्बाल
मीर साहब का बहुत छोटा सा परिवार था। दो बेटियां, चार बेटे पत्नी और मां। गांव छोडकर बच्चों की पढाई के ख्ायाल से शहर आ गये थे। जहां एक चार-पांच कमरों का मकान खरीद लिया था। जष्मींदारी में अब पहले जैसी बात नहीं थी। असामियों में जागरूकता फैलने लगी थी और इक्का-दुक्का असामी यहां-वहां सिर भी उभारने लगे थे। शहर छोटा जष्रूर था। पर लोगों में आपस में मेल-मुहब्बत बहुत थी। सामने के मकान में अजष्हरूद्दीन वकील और उनके बेटे इकश्बाल रहते थ्ेा। घर क्या थ कशलीन का कारख्ााना था। ऊन रंगे जाते। करघों पर खटाखट हाथ चलते। गुल-बूटे बुने जाते और चबूतरे पर बिछाकर कशलीन की गुलतराशी की जाती। दक्खिन तरफश् के मकान में अकेली रमदेई बुआ दिन-रात एक खाट पर पडी रहतीं। बच्चों को कहानियां सुनातीं और लाई गुड के लड्डू खिलातीं। उत्त्र का मकान खण्डहर था और उससे सटे मकान में पगली रहती थी। नंग धडंग। जष्मीन पर पडी बीडयां उठाकर उनकी सुरती निकालती और हथेली पर मसलकर फांक जाती। फिर इस तरह डकार ती कि पास खडा आदमी सहम जाय। टट्टी पेशाब सब बाहर ही चबूतरे से लगी नाली में सबके सामने बैठकर करती। बच्चों के लिए एक तमाशा थी वह। उसको छेडने और गालियां सुनने में बच्चों को बडा मजष आता। पगली के मकान से लगा मास्टर दीनानाथ का मकान था। कशैम के कायस्थ थे। फशरसी में एम. ए.। गोश्त-मछली का बेइन्तेहा शौकश्। लेकिन जब से हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के नारे लगना शुरू हुए, विशुद्ध शाकाहरी बन गये। शायद मन में कही डर था कि कायस्थों को आधा मुसलमान समझा जाता है। अगर सचमुच पाकिस्तान बन गया तो उन्ह भी मुसलमानों के साथ खदेड दिया जायेगा। मीर साहब का पूरे मोहल्ले में बडा रोब था। छोट-बडे सभी उनका आदर करते थे। किसी के घर कैसी भी परीशानी हो मीर साहब जी जान से घरवालों के साथ शरीक रहते थे। रमदेई बुआ उनसे उम्र में बडी थीं और मीर साहब उन्हें अपनी बडी बहेन मानते थे। पर रमदेई बुआ हमेशा उन्ह अपना सरपरस्त समझती थीं। यही हाल मास्टर दीनानाथ और दूसरे पडासियों का भी था। बच्चे गली में कैसा भी कोई खेल क्यों न खेल रहे हों मीर साहब अगर दूर से भी दिखाई दे जाते तो सब फश्टाफश्ट घरों में घुस जाते। मुस्लिम लीग या कांग्रेस से मीर साहब को कोई दिलचस्पी नहीं थी और यह बात मुहल्ले में किसी से ढकी-छुपी नहीं थी। फिर भी मुस्लिम लीग का झण्डा मीर साहब के तिमंजिष्ले पर लहरा रहा था और लीग की सभाओं में भी मीर साहब की शिरकत देखी जा सकती थी। शहर के हिन्दुओं में मीर साहब के जितने भी जानने वाले थे, सभी उन्हें एक देशभक्त मानते थे और मुस्लिम लीग से उनके लगाव को हकीम ख्ाालिद से उनकी दोस्ती का प्रतीक समझते थे। गांधी जी के प्रति मीर साहब के मन में जष्बरदस्त इज्जष्त थी और वो उनके लिए बापू के अलावा किसी अन्य शब्द का इस्तेमाल नहीं करते थे। खुद भी गांधी जी की तरह सफेद खादी के साधारण कपडे पहनते थे। शहर के जुलूसों की देखा-देखी गली के बच्चों ने भी अपने-अपने जुलूस निकालना शुरू कर दिये थे। चांद-सितारे और तिरंगे की छाप वाले झण्डे इफश्रात थे। लेकिन मुसलमान हिन्दू जैसा कोई बटवारा बच्चों में नही था। अगर हिन्दुस्तानी जुलूस ज्यादा जोरदार होता तो पाकिस्तानी पाले के बच्चे अपना झण्डा फेंक कर हिन्दुस्तानी पाले में आ जाते। इसके उलट अगर पाकिस्तानी नारों की गूंज अधिक धारदार होती तो हिन्दुस्तानी पाले से निकलकर कुछ बच्चे पाकिस्तानी जुलूस में शामिल हो जाते। मीर साहब के बच्चों में केवल अल्लन ऐसा था जिसकी दिलचस्पियां इन जुलूसों में बहुत बढ चढकर थीं। उम्र तो मुश्किल से सात-आठ वर्ष की थी। लेकिन बातें बडों की तरह करता था। कफशील, सुग्गा, छोटे, मुन्ना और कल्लू उसके झुण्ड में थे। दामोदर, बिपिन, नन्हें, बाबू और ढुनमुन दूसरे झुण्ड में। बच्चे तो और भी बहुत से थे। लेकिन सबके नाम गिनाना बहुत जरूरी नहीं है। नये-नये नारे गढ पाना बच्चों के बस में नहीं था। बस इधर-उधर सुनकर जो नारे रट गये थे वही उनके लिए पर्याप्त थे। मुस्लिम लीगी झुण्ड के बच्चे जब पूरी आवाजष् से नारा लगाते-’लेके रहेंगे पाकिस्तान/देंगे तुम्हारे दादा जान।‘ कांग्रेसी बच्चों के तेवर देखते ही बनते थे। चांद-सितारे वालों से तिरंगे वालों की आवाजष् नीची नहीं होनी चाहिए। इसलिए और भी दोगुनी ताकश्त से इधर का झुण्ड जवाब देता-’नहीं मिलेगा पाकिस्तान/चाहे दे दो अपनी जान।‘ अल्लन चांद-सितारे वालों के साथ नारे लगा रहा था। एक बार उसके झुण्ड ने जब नारा लगया-चार चवन्नी तेल में / गांधी बेटा जेल में।‘ अल्लन का चेहरा लाल हो गया और वह चांद सितारे का झण्डा फेंककर तिरंगे की तरफश् आ गया। उसने ढुनमुन और बाबू के कान में कुछ कहा और फिर वह बात कानों-कान सभी तक पहुंच गयी। चांद-सितारे का जवाबी नारा जष्रूरी था। और वह भी तेज-तर्रार आवाजष् में। तिरंगे वालों ने पूरे दम से जषेरदार नारा लगाया-’चार चवन्नी चांदी की / जय बोलो महात्मा गांधी की।‘ उस दिन मिशन स्कूल के मास्टर शकील अहमद अपने चबूतरे पर बैठे बच्चों का ये तमाशा देख रहे थ्ेा। उन्होंने अल्लन को आवाजष् दी और अपने पास बुलाया। अल्लन जी ’मासाब‘ कहता हुआ उनके सामने अदब से खडा हो गया। ’तुम गांधीजी वाला नारा सुनकर इतना नाराजष् क्यों हो गये?‘ ’इसमें नाराजष् होने वाली बात तो थी ही।‘ वह कैसे? हमारी रमदेई बुआ कहती हैं-गांधी जी अवतार हैं, महापुरूष हैं, हमें उनका सम्मान करना चाहिए। लेकिन मुसलमान तो ये नहीं मानते। मैं ये सब नहीं जानता। तुम्हारे अब्बा क्या कहते हैं? अब्बा वही कहते हैं जो रमदेई बुआ कहती हैं। अब्बा ने घर में गांधी जी की बडी सी तस्वीर लगा रखी है। तुम्हारे अब्बा तो मुस्लिम लीगी हैं? मुस्लिम लीगी नहीं हैं, मुस्लिम लीग का साथ दे रहे हैं। जब लीगी नहीं हैं तो साथ क्यों दे रहे हैं? आप जानते हैं कि हकीम ख्ाालिद साहब अब्बा के कितने गहरे दोस्त हैं। फिर दोस्त का साथ देना तो जष्रूरी होता है। अच्छा ये बताओ कि अगर पाकिस्तान बन गया तो क्या तुम लोग पाकिस्तान चले जाओगे? पाकिस्तान क्यों चले जायेंगे? पाकिस्तान वो लोग जायेंगे जिन्हें यहां तकलीफश् है। जिन्हें सताया जा रहा है। हमें तो यहां कोई तकलीफश् नहीं है। अल्लन जब घर लौटा तो उसने देखा कि पगली को घेर कर कुछ लोग खडे हैं और वह हाथ नचा-नचाकर चीख्ा रही है-तोर पूत काटी, तोर भतार काटी। अल्लन को ’पूत‘ और ’भतार‘ का अर्थ नहीं मालूम था। लेकिन इन शब्दों की ध्वनियां उसे बहुत अच्छी लगीं। घर में घुसते ही उसकी पहली मुलाकशत दादी से हुई। आंगन में खटोला डालकर मुडी-चुडी लेटी थीं। गोरे चिट्टे रंग वाली उसकी दादी के बाल सफेद हो चुके थे और उनमें से एक चमक फूटती थी। अल्लन दादी के ठीक सामने खडा हो गया और हाथ नचा-नचाकर पगली की नकश्ल उतारने लगा -तोर पूत काटी, तोर भतार काटी। दादी का चेहरा गुस्से से लाल हो गया और उन्होंने लपक कर अल्लन को पकडना चाहा। लेकिन अल्लन दादी से बचकर साफश् निकल गया था। वहीं बैठे-बैठे दादी ने अम्मां को आवाजष् दी-दुल्हन देख रही हो, साहबजषदे बाहर से क्या-क्या लन्तरानियां सीख कर आते है। अम्मां ने अल्लन को बहुत प्यार से समझाया -बेटा! बडों की इज्जष्त करना सीखो। मैं तो दादी की बहुत इज्जष्त करता हूं। फिर वो तुमपर नाराजष् क्यों हो रही थी ं? वह बाहर पगली लोगों से कह रही थी-तोर पूत काटी, तोर भतार काटी। यही बात आकर मैंने दादी से दोहरा दी। अम्मां को गुस्सा आने के बजाय हंसी आ गयी और उन्होंने अल्लन को सीने से लिपटा लिया। अल्लन का छोटा भाई अहसन रमदेई बुआ से बहुत हिला हुआ था। अम्मा जब भी उसे प्याले में बकरे का कशेरमा और प्लेट में दो रोटियां रखकर देतीं, वह सीधा रमदेई बुआ के पास पहुंच जाता और उनके हाथ से खाने की जिष्द करता। रमदेई बुआ को मास-मछली से घृणा थी। उनका ख्ायाल था कि इसे छूने से भी पाप लगता है। लेकिन सारी बातें भूलकर वह अहसन को प्यार से कशेरमा रोटी खिलातीं और जब अहसन खाली प्लेट और प्याला लेकर चला जाता, एक साडी बगष्ल में दबाकर और पीतल का लोटा हाथ में लेकर सीधे गंगा जी चली जातीं। सुन्दर घाट पास में ही था। मुहल्ले के और भी बहुत से लोग स्नान के लिए गंगा जी जाया करते थे। रमदेई बुआ दो चार लोटे पानी सिर पर डालतीं तो उनकी आत्मा तक भीग जाती और सारे पाप धुल जाते। अल्लन कभी कभी बुआ से सवाल करता -’बुआ आप घर में क्यों नहीं नहातीं? रोजष्-रोजष् गंगाजी जाती हैं। बुआ हंस देतीं और उसे प्यार से लिप्टा कर कहतीं -’बेटवा, गंगाजी में नहाने से पाप धुल जाते हैं। ’क्या पाप मैल की तरह शरीर में लिपटे होते हैं जो घर के पानी से साफश् नहीं होते? ’नहीं , शरीर का मैल तो किसी भी पानी से छूट सकता है, गंगा जी का पानी आत्मा के मैल को धोता है। ये आत्मा क्या होती है? आत्मा वो होती है जिसका हमारे तुम्हारे दिमागष् और दिल पर शासन होता है। आत्मा न हो तो शरीर कुछ नहीं कर सकता। क्या आत्मा सम्राट अकबर की तरह शरीर के भीतर राजगद्दी पर बैठती है? हां, बस ऐसा ही समझ लो। लेकिन बुआ सम्राट अकबर तो मर गया। क्या आत्मा भी मर जाती है? नहीं बेटवा, जो दुष्ट होते हैं उनकी आत्मा मर जाती है। अच्छे लोगों की आत्मा नहीं मरती। फिर क्या सम्राट अकबर दुष्ट था? नहीं, वह तो एक महान शासक था। तो मर क्यों गया? मरते तो सभी हैं। एक दिन मैं भी मर जाऊंगी। अल्लन का चेहरा तमतमा गया। आप कैसे मर जायेंगी। अल्ला मियां से मैं साफश् कह दूंगा, रमदेई बुआ के लिए मौत का हुक्म हटा दें। अल्ला मियां मेरी बात जष्रूर मानेंगे। बुआ अल्लन की बातों पर मुग्ध हो जातीं। और उसके लिए न जाने कितनी दुआएं उनके मन से सहज ही फूट पडतीं। शहर में आज महासभा का बहुत बडा जलसा था। घण्टाघर का टाउन हाल सुबह से भरने लगा था। हिन्दू महासभा के बडे-बडे नेता आ रहे थे। अल्लन भी मास्टर दीनानाथ के बेटे सुग्गा के साथ टाउन हाल पहुंच गया। हर तरफ केसरिया झंडे। चिकने ऊंचे तंदुरुस्त घोडों पर बैठे सिपाही जिनकी पगडयों पर चमकते सुनहरे रेशमी झुब्बे। भाषण का अधिकतर हिस्सा अल्लन की समझ में नहीं आया। वह ’अखण्डता‘ का अर्थ नहीं जानता था और बार-बार वहां अखण्डता की बात की जा रही थी। उसकी समझ में बस इतना आ रहा था कि इस जलसे में पाकिस्तान बनने का विरोध किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि देश के दो टुकडे नहीं होने देंगे। ये भी कहा जा रहा है कि बंटवारा हमारे लिए अभिशाप है। वह सोंच रहा था कि यह अभिशाप कोई बुरी चीजष् जष्रूर होती है। लेकिन बंटवारे से इन लोगों को क्या परीशानी है। दीनानाथ चच्चा के मकान का जब बंटवारा हुआ तो उस समय कोई नहीं बोला। किसी ने बंटवारे का विरोध नहीं किया। उनके छोटे भाई दयानाथ चच्चा ने अपना हिस्सा अलग कर लिया। अगर ये कोई बुरी बात होती तो दीनानाथ चच्चा ऐसा क्यों होने देते। जलसे से लौटकर अल्लन सीधा दीनानाथ चच्चा के पास पहुंच गया। चच्चा, एक बात पूछूं? हां, पूछो बेटा। चच्चा देश कोई रोटी है जिसके दो टुकडे कर दिये जायें और अलग-अलग लोग दोनों टुकडे खा जायें। या शीशे का गिलास है कि दो टुकडे हो जाने पर दोनों टुकडे बेकार हो जायें और कूडे में फेक दिये जायें? नहीं बेटा, देश न रोटी है न शीशे का गिलास। फिर देश उसी को तो कहते हैं जिसमें हम आप सभी रहते हैं? हां बेटा हमारा देश वही है जिसमें हम सभी रहते हैं। तो बंटवारे से देश टूट किस तरह जायेगा? आफ घर का बंटवारा हो गया लेकिन आपका घर नहीं टूटा? घर नहीं टूटता बेटा, मन टूट जाता है। कमाल है। जब घर सही सलामत है, दयानाथ चच्चा भी मजे में हैं और आप भी मजष्े में हैं फिर मन किस तरह टूट जाता है। मास्टर दीनानाथ ने अल्लन के गाल थपथपाए और बहुत प्यार से कहा-बेटा अभी तुम बहुत छोटे हो। ये बातें तुम्हारी समझ में नहीं आयेंगी। अल्लन वहां से चला तो आया लेकिन उसे एक बात लगातार खटक रही थी। बडे लोग जब कोई बात समझा नहीं पाते तो सीधे- सीधे कह देते हैं ’तुम छोटे हो, ये बात तुम्हारी समझ में नहीं आयेगी। बस एक रमदेई बुआ हैं जो हर बात अच्छी तरह समझा देती हैं। अल्लन वहां से सीधे रमदेई बुआ के पास गया। बुआ! ये मन का टूटना क्या होता है? क्यों? किसी ने कुछ कह दिया क्या? नहीं बुआ, मैं जानना चाहता हूं। देखो, जब मनुष्य किसी चीजष् को चाहता है, पसन्द करता है और वह चीजष् उससे छिन जाती है या उसकी इच्छा के मुताबिकश् नहीं होती तो उसका मन टूट जाता है। आप जानती हैं कि मुझे मिठाई बहुत पसन्द है? हां। आप ये भी जानती हैं कि मैं हमेशा मिठाई खाना चाहता हूं? हां। मेरा छोटा भाई अहसन मौकश मिलते ही मेरी मिठाई उठाकर खा जाता है। लेकिन मेरा मन तो नहीं टूटता। इसलिए कि तुम मिठाई से कहीं ज्यादा अहसन का चाहते हो। अगर तुम अहसन को न चाहते तो मिठाई उठाने पर या तो लड पडते या अम्मा के डर से चुप रह जाते। फिर तुम्हारा मन टूट जाता। अब मैं समझा। दीनानाथ चच्चा दयानाथ चच्चा से कहीं ज्यादा मकान को चाहते हैं। इसलिए बंटवारे से उनका मन टूट गया। दूसरे दिन शहर में मुस्लिम लीग का जलसा था। मीर साहब हकीम खालिद के साथ सुबह सुबह से इन्तजषम में लगे थे। सुग्गा जलसे में जाने के लिए तैयार नहीं था। अल्लन ने ढुनमुन और बाबू के साथ जाने की योजना बना ली। इस जलसे में और भी मुसीबत थी। भाषण देने वाले बडी गाढी उर्दू बोल रहे थे-’हिन्दुस्तान हमारे लिए दारूलहरब है। पाकिस्तान मुसलमानों का बहिश्त है।‘अल्लन कुछ भी समझ नहीं पा रहा था। मोलवी सख्ाावत उसे फशरसी पढाने घर आते थे। उनको भी कभी ऐसी उर्दू बोलते उसने नहीं सुना था। ’हो सकता है ये लोग हमारे मोलवी साहब से ज्यादा कशबिल हों।‘ वह अपने मन को समझाने लगा। मौलवी साहब ने एक बार उसे बताया था -’शैतान के बहकाने पर हजष्रत आदम को अपनी गष्लती की सजष मिली और वो बहिश्त से निकाल दिये गये। ‘ उसकी समझ में इतनी बात आ गयी थी कि बहिश्त जन्नत को कहते हैं। लेकिन ये दारूलहरब क्या है, हो सकता है दोजष्ख्ा का दूसरा नाम दारूलहरब हो। जलसे से वापस लौटकर अल्लन बहुत उदास था। घर में भी अजीब सी हलचल मची हुई थी दादी की तबीयत अचा
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