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06 July 2008
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गुठली के भी दाम
डॉ. पद्मा पाटिल

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शहर के रास्ते भीड में बह रहे थे। हर कोई दूसरे से कह रहा था, ’जल्दी चल‘। आज की भिडन्तें देखने स्वयं महाराजा हाजिर रहने वाले हैं.... हमें जगह अच्छी चाहिए.... भिडंत भी और महाराजा भी देखने मिलेंगे।‘ नए राजभवन के पिछवाडे वाले मैदान में आज सींगवाले बकरों की भिडतों का आयोजन था। सभी ओर से लोगों का शोर शराबा हो-हल्ला सुनाई दे रहा था। बकरों की तेज सांसें, उनके शरीर की गंध, उडती धूल लोगों की आपसी बातों की संमिश्र आवाजों से वातावरण स्पर्धा का बन गया था.... तपते सूरज की ओर किसी का ध्यान ही नहीं था। सभी प्रेक्षक भिडंत-मुकाबले देखने आतुर हुए थे कि उनकी जिज्ञासा उन्हें स्वस्थ बैठने नहीं दे रही थी। ’’अरे, देख वह बकरा।‘‘ ’’वो?‘‘ ’’अरे, वो नहीं, काला, उसके बाजूवाला.... देख उसके सींग कितने नुकीले हैं.... जरूर लडनेवाले बकरे की अंतडयां बाहर निकालेगा....‘‘ ’’क्या उसका मालिक तेरा कुछ लगता है?‘‘ ’’नहीं! पर देखता नहीं, कैसा फुरफरा रहा है?‘‘ ’’वो तो कुछ भी नहीं.... वो देख.... अरे वो नहीं, तो सफेद.... जिसके मत्थे पर काला-सा टीका है.... हां वही.... मैं शर्त लगाता हूं.... वही जीतेगा....‘‘ ’’क्या उसका मालिक तेरा कुछ लगता है?‘‘ ’’हां, यार वह हमारे मुहल्लेवाला है.... खुद तो फाकों से लडता है पर बकरे....‘‘ इतने में जयघोष से आकाश गूंज उठता.... ’’होशियाऽऽर.... क्षत्रिायकुलावतस श्रीमंत छत्रापति शाहु महाराजा पधार रहे हैं....ऽऽऽ होशिया ऽऽऽ र हों‘ क्षणभर के लिए भीड स्तब्ध रही.... फिर ’’महाराजा की जय हो‘‘ जयघोष हवा में गूंजने लगा.... महाराजा बग्गी से उतरकर आसनस्थ होने तक की अवधि में जयघोष शुरू ही था। महाराजा शामियाने में आसनस्थ हुए। उन्होंने सामने देखा, भिडंत-मुकाबले हेतु उत्सुक बकरों की पांत खडी थी। उनके मालिक और प्रशिक्षक भी खडे थे। उत्सुक बकरों को पुचकारते-सम्हालते महाराजा की ओर देख रहे थे। बकरे अधीर हुए थे, सिर हिलाकर रस्सी तोडना चाहते थे, जमीन खुरच रहे थे.... उडती धूल की ठसक में भी उत्साही प्रेक्षक जोरजोर से हो-हल्ला मचाने लगे.... बकरे भी इधर उधर प्रतिद्वंद्वी का अंदाजा लेने लगे थे। तालियों की गूंज बढती जा रही थी.... महाराजा की चील जैसी नजर सभी ओर घूम रही थी, उन्होंने हरकारे से कहा, ’’वो दायीं ओर सफेदवाला बकरा लेकर पो्ट्टा खडा है न, उसे बुलाओ....।‘‘ संदेश पाकर हुसन्या का दिल धडका। वह बकरे को रस्सी से खींचते-खींचते भीड से होकर आया.... ’’सलाम माईबाप!‘‘ महाराजा ने बकरे पर टिकायी नजष्र हुसन्या की तरफ फेंकी। ’’क्यों रे हुसन्या, खासबाग में हुई पीछली भिडंत के वक्त तुझे बताया था ना.... तू ऐसे पचडे में मत पड.... बहुत महंगा शौक है। यह.... तू फिर यहां?‘‘ ’’माफी हुजूर.... वो ये हुआ कि.... हुजूर‘‘ ’’अच्छा, अच्छा तूने बकरा तो अच्छा तैयार किया है। हुसन्या.... अब भिडंत में आखिरतक टिका तो....‘‘ इतने में जिवबा ने कहा, ’’धृष्टता की माफी सरकार.... भीड बढ रही है.... शुरू करें?‘‘ ’’हां, हां‘‘ महाराजा के इशारे पर भिडंत शुरू हुई। बकरे प्रतिद्वंद्वी का अंदाजा लेते रहे, एक दूसरे से भिड गए। वातावरण सीटियां, शोर-शराबा, हो-हल्ले, उडती धूल से धुंध हो गया। चारों तरफ हल्ला-गुल्ला मचने की, बकरे को बढावा देने की आवाजों के अलावा बकरों के टकरा जाने और सीगों की आवाजें थीं, सांसें चलने की आवाजें थीं। भीड आहिस्ता-आहिस्ता आगे हो रही थी। हुसन्या के सींगवाले बकरे की तैयारी ऐसी थी कि वह टक्कर लेता तो किंचित भी पीछे हटता नहीं था। एक के बाद एक बकरे पीछे हटे। आधे घण्टे के बाद वह अकेला ही मैदान में था। हुसन्या आनंद से बकरे की पीठ थपथपा रहा था। बकरा थोडा घायल हुआ था.... जख्म से रक्त बह रहा था आंखें लाल सुर्ख-सॉस! मानों धौंकनी चल रही थी.... लोगों का जल्लोष बढता ही रहा था। जिवबा के हाथ ऊपर उठाते ही शांति स्थापित हुई। महाराजा ने परभूत बकरों के मालिकों और प्रशिक्षकों को भी इनाम दिया। कहा कि वे अगली भिडन्त की अच्छी तैयारी करें। महाराजा का जयघोष करते भीड छंट गयी। हुसन्या के बकरे ने महाराजा का मन मोह लिया था। महाराजा इर्द-गिर्द के व्यक्तियों के साथ बतियाते हुए बीच-बीच में हुसन्या की ओर देख रहे थे। हुसन्या का दिल धक-धक करने लगा। जिवबा हुसन्या के पास आया। उसने कहा, ’’चल हुसन्या, हुजूर तुझे याद करने लगे हैं। अरे बकरे के साथ चल.... महाराजा बकरे को देखना चाहते हैं।‘‘ हुसन्या बकरे को लेकर आगे बढा। महाराजा ने बकरे की पीठ पर थपकी दी। बोले, ’’हुसन्या, तेरा बकरा हमें बहुत पसंद आया, हमें बकरा दे.... हम खरीदते हैं तेरा बकरा.... हमारे निजी मुन्शी जी से सौ रुपए लेके जा। कहना हमने भेजा है।‘‘ हुसन्या हर्षोल्लास से पागल जैसा खडा रहा। महाराजा ने डांटा नहीं था, ऊपर से बकरे का सौ रुपयों में सौदा किया था! दौडता-हांकता राजभवन की दायीं ओर के दफ्तर में आया। वहां महाराजा के व्यक्तिगत मुन्शी नागेश पांडुरंग भिडेजी दूसरे क्लर्कों से बातें कर रहे थे। हुसन्या जानता था कि भिडेजी अनुशासन के बहुत ही कठोर और पक्के हैं। वे व्यवहारज्ञान के बादशाह थे। उनका विश्वास जब दृढ होगा तभी वे पैसे देते, कभी-कभी तो महाराजा से भी उलझते थे। हुसन्या पसोपेश में था पर महाराजा की आज्ञा का उल्लंघन भी कैसे करता? साहस बटोरकर वह हलके से खांसा। दफ्तर के अहाते में गया। आहट पाते ही भिडेजी ने बाहर देखा, उनसे नजष्र मिलते ही हुसन्या बोला, ’’जी, सलाम मुन्शी जी, हुजूर ने भेजा है।‘‘ ’’क्यों? तुम कौन हो?‘‘ भिडेजी ने उसका आपदमस्तक निरीक्षण करते हुए पूछा। ’’जी! नाचीज को हुसन्या कहते हैं। अभी बकरों की भिडंत हुई। मेरा बकरा जीत गया। हुजूर ने खरीदा है और कहा है उसकी कीमत सौ रुपए मैं आप से ले जाऊं। बडी कृपा होगी आप की। अगर आज्ञा हो तो यहां सीढियों पर....‘‘ भिडेजी ने हाथ की कलम कलमदाने में रखकर हुसन्या को निहारा। हुसन्या अस्वस्थ हुआ। फिर भिडेजी ने कागजष् की स्याही पर रेत की चुटकी छोडते-छोडते कहा, ’’क्यों रे हुसन्या मियां, बडा अजीबोगरीब दिखता है तेरा बकरा। सौ रुपए कीमतवाला है।‘‘ हुसन्या ने अभिमान जताया। ’’हां मुन्शी जी, मेरा बकरा सींगारा है.... भिडंतवाला है.... जहां टक्कर मारता है वहीं दूसरे बकरे को ढेर करता है।‘‘ ’’पर इसमें और क्या कौशल्य हैं? अरे! सादा बकरा डेढ दो रुपयों में मिल जाता है अगर तेरा बकरा भिडंतवाला है टक्करबाज है तो, लो, समझो कि रुपए दुगुने हो सकते हैं। ज्यादा से ज्यादा चार.... पर सौ रुपए? कहता है कि सौ रुपए दे दो। पर रुपए-पैसों के मामलों में सावधानी की जरूरत होती है.... बेहिसबी तो एकदम गलत बात है।‘‘ हुसन्या चिरौरी करने लगा। ’’पर हुजूर ने ही तो कहा है कि आप से सौ रुपए ले लूं।‘‘ ’’हुसन्या, तेरा बकरा क्या सोने का है? देख, मैं महाराजा से बात करूंगा। उनसे निर्णय करवाऊंगा और फिर‘‘ हुसन्या मायूस होकर लौट आया। जो कुछ हुआ महाराजा से बताया। महाराजा जानते थे कि ऐसा ही होगा। उन्होंने कहा, ’’देख हुसन्या, कल आ जाना।‘‘ रीति के अनुसार महाराजा शहरभ्रमण के लिए जाने वाले थे कि भिडेजी उनसे मिलने आए। ’’हां, हां हमने ही भेजा था उसे।‘‘ ’’हुजूर, का आदेश है सौ रुपयों का.... ऑडिटर ऑब्जेक्शन लेगा.... तब मैं क्या उत्तर दूं हुजूर?‘‘ महाराजा ने तर्क किया कि भिडेजी मानने वाले नहीं। भिडंत-मुकाबले के लिए जानबूझकर तैयार कराया गया है.... तो उसकी कीमत दुगुनी करें?‘‘ हुजूर चार रुपये दे दें.... और....‘‘ ’’और क्या मुन्शीजी, बोलिए....‘‘ ’’तो फिर ऐसा ही करते हैं। उसे बकरे की कीमत के चार रुपए दीजिए और इसके अलावा सौ रुपए इनाम में दीजिए।ऑडिट को चलेगा ना?‘‘ ’’हां। ऐसा हम कर सकते हैं, यह ऑडिट के लिए भी ठीक रहेगा.... कानून के अनुसार भी है।‘‘ ’’और मुन्शीजी, देखिए.... वह बकरा भी हुसन्या को दीजिए। दिया तो चलेगा ना? कोई ऑब्जेक्शन तो नहीं?‘‘ ’’जी, बिल्कुल नहीं.... वैसा करता हूं। भिडेजी दफ्तर गए। दूसरे दिन हुसन्या आया। ड्योढी पर उसे देखते ही महाराजा ने जिवबा से कहा, ’’हुसन्या को बुलाओ।‘‘ ’’सलाम माई बाप ‘‘ हुसन्या ने प्रणाम किया। महाराजा ने कहा, ’’क्यों मुंह लटकाकर खडा है हुसन्या? जा.... जा.... भाग.... दफ्तर में जा। मुन्शी जी तुझे एक सौ चार रुपए देने वाले हैं और ऊपर....‘‘ ’’ऊपर क्या?‘‘ हुसन्या ने जिवबा से पूछा। वह ऐसा खडा था कि कभी भी दौडने का पैंतरा ले सकें। जिवबा के बजाय महाराजा ने ही कहा, ’’ऊपर तेरा वो लडाकू बकरा भी तुझे मुन्शीजी देने वाले हैं....अरे....रुक यहां आ....‘‘ हुसन्या, ये भिडंत-मुकाबला, बकरे तैयार करना छोड बिटवा, बडा महंगा चस्का है यह! तेरे माथे पर ना बाप का साया ना पीठ पर माई का हाथ....अभी तू जवां मर्द है, हाथ-पैर हिला.... काम कर.... बिटवा, तू रिकलगारी-नालबंदी का काम क्यों नहीं सीखता? कल से रहिमतचाचा के पास आ जाना, हम उन्हें बता देंगे। जा भाग....‘‘ हुसन्या की आंखें आंसुओं से भीग गयीं थीं। अपने अनाथ होने का उसका रंज आज कहीं कुर्र हो गया था। दूसरे दिन लोगों ने देखा रहिमतचाचा के यहां हुसन्या धौंकनी चला रहा था। उसका भिडंतवाला बकरा नीम की छाया में बैठकर ऊंघ रहा था। प्रपाठक, हिन्दी-विभाग शिवाजी विश्वविद्यालय, कोल्हापुर



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