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Vartmaan Sahitya ::February, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner छः कविताएँ
सुरेन्द्र काले
सलाम
सलाम साहब सलाम माफ करेंगे जब भी सलाम करता हूं मेरी जीभ दातों में दब जाती हैं और मन एक भद्दी सी गाली के चारों ओर घूमने लगता है
प्रतीक्षा
मेरी चिडया बार बार तुम्हारी सीमा में चली जाती है और लौट कर मेरी हथेली पर रख देती है कुछ और
प्रतीक्षा एम.आर.पी.
एक सेवानिवृत्त
रोगग्रस्त व्यक्ति को कविता मिल गई दवा की दुकान पर और समझाने लगी एम.आर.पी. का अर्थ इसमें उत्पादक और दुकानदार का लाभ शामिल होता है, तुम मोलभाव तो कर ही सकते हो
नेमप्लेट
किसी दिन मेरे अन्दर तुम जंगले से कूद आई थी और मेरे अन्दर अपना नेमप्लेट लगाकर चली गई स्त्राी जब मैं लिखता हूं
स्त्राी,
कई गुना वजनी हो जाता है कागज, नदी बहती चली आती है पन्नों पर समुद्र फैल जाता है
शब्द
मेरे शब्द तुम्हारी रगों की नदी में नहाना चाहता हैं देखना इन्हें तैरना नहीं आता नवाब कॉटेज, पुर्दिलपुर, गोरखपुर
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