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जनवादी लेखक संघ की संगोष्ठी में सुरेश उजाला की कविताओं पर चर्चा
एम.इलियास अन्सारी
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जनवादी लेखक संघ की एक संगोष्ठी लखनऊ में आयोजित हुई जिसमें वरिष्ठ कवि एवं ’उत्तर प्रदेश‘ के सम्पादक श्री सुरेश उजाला ने अपनी इस सशक्त कविताओं-’चिंगारी‘, ’बोधिपत्रा‘, ’व्यूह चक्र‘, ’प्रतिकार‘, ’भीड‘, ’गणित‘, ’कुछ लोग‘, ’वास्तविकता‘, ’जीवन का गणित‘-शीर्षकों से पाठ किया। तत्पश्चात् सुरेश उजाला की कविताओं पर चर्चा हुई। चर्चा के प्रारम्भ में चर्चित कवि भगवानस्वरूप कटियार ने उजाला की कविताओं पर अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि उजाला जी की कविताओं में सामाजिक विद्रूपताओं के विरुद्ध गहरा आक्रोश परिलक्षित होता है। युवा कवि एवं समीक्षक वीरेन्द्र सारंग ने कहा कि उजाला की कविताएँ एक गणितज्ञ की तरह हैं। उनकी कविताएँ पीडा, दुःख, संत्राास से होते हुए भोगे हुए अनुभव, पढे हुए और देखे गये सत्य से साक्षात्कार करती हैं। चर्चा में भाग लेते हुए युवा कहानीकार अखिलेश श्रीवास्तव ’चमन‘ ने कहा कि उजाला ने इन कविताओं के माध्यम से ठहरे जल में कंकड फेकने का कार्य किया है ताकि उनमें ठहराव, सडांध और काई न पैदा हो सके। रचनाकार ज्ञानेश श्रीवास्तव ने कहा कि उजाला की कविताओं में उनके जीवन-दर्शन की झलक मिलती है। युवा कवि-कहानीकार लक्ष्मीकांत ने कहा कि उजाला की कविताओं में क्रान्तिधर्मिता के साथ ही आम आदमी के जीवन से सम्बन्धित विविध चित्रा मौजूद हैं। कहानीकार एम. इलियास अन्सारी ने अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि उजाला की सभी कविताओं के मूल में कहीं न कहीं प्रतिरोध की चिंगारी झलकती है। उनकी यह कविताएं वर्तमान भ्रष्ट व्यवस्था के विरुद्ध कारगर हस्तक्षेप हैं। युवा कवयित्राी विनीता अवस्थी ने कहा कि उजाला की कविताएं चिंगारी बोती हैं और आग की फसल उगाती हैं। युवा कवि पवन उपाध्याय ने कहा कि उजाला की कविताएं अत्यन्त मार्मिक हैं और आम आदमी के मन-मस्तिष्क को स्पर्श करती हैं। संगोष्ठी के संचालक एवं वरिष्ठ कथाकार गिरीशचन्द्र श्रीवास्वत ने रेखांकित किया कि उजाला की कविताओं में ओज विद्यमान है। वास्तव में उनकी कविताएं प्रतिरोध की चेतना जगाती हैं। साथ ही उनकी कविताओं के स्रोत गहरे तौर पर सामाजिक है एवं इनके मूल स्वर मनुष्यधर्मी हैं। अध्यक्ष पद से बोलते हुए वरिष्ठ कवि एवं कथाकार राजेन्द्र वर्मा ने इस बात का समर्थन किया कि उजाला की कविताओं में जनाक्रोश के साथ-साथ जागृति की चिंगारियां भी मिलती हैं। उनके सरोकार वृहद हैं। सामयिकता से लबरेजष् उनकी कविताओं के बिम्ब-प्रतीक ऐतिहासिक हैं। परन्तु आगे उन्होंने यह भी कहा कि भाषा की दृष्टि से कहीं-कहीं रचनाकार की सजगता शिथिल हो गयी है। इन कमियों के बावजूद उजाला अत्यन्त संवेदनशील कवि हैं। चर्चा में कवि-कथाकार अवधेश कुमार श्रीवास्तव एवं राजेन्द्र प्रसाद ने भी भाग लिया। संगोष्ठी के दूसरे सत्रा में उपस्थित कवियों ने अपनी ताजष कविताओं के पाठ द्वारा श्रोताओं को अभिभूत किया।
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