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Vartmaan Sahitya ::March, 2007
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युवा कवि अग्निेशखर ’’सूत्रा सम्मान‘‘ से सम्मानित। विजेन्द्र पर केन्दि्रत ’’लेखन सूत्रा‘‘ का लोकार्पण शाकिर अली
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प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिाका ’लेखन सूत्रा‘ द्वारा प्रतिवर्ष दिया जाने वाला ठाकुर पूरनसिंह स्मृति सूत्रा सम्मान दिनांक २४ दिसम्बर २००६ को रायपुर के शहीद स्मारक भवन में महत्वपूर्ण रचनाकारों की उपस्थिति में चर्चित युवा कवि अग्निशेखर को नौंवाँ ’’सूत्रा सम्मान‘‘ प्रदान किया गया। आयोजन में मुख्य अतिथि के रूप में चर्चित कवि एवं कथाकार श्री विनोद कुमार शुक्ल उपस्थित थे। अग्निशेखर की कविताओं पर युवा आलोचक शाकिर अली ने विस्तार से अपनी बातें रखीं और अग्निशेखर की लम्बी कविता ’सतीसर‘ को केन्द्र में रखते हुए, इस कविता में आये मिथकों को कश्मीर के मिथकों का संग्रहालय बताया। उनकी लम्बी कविता की तुलना जयशंकर प्रसाद के महाकाव्य ’’कामायनी‘‘ से करते हुए, अग्निशेखर के महत्वपूर्ण काव्यात्मक योगदान को सराहा। उनकी रचनाओं में कश्मीर के शरणार्थियों की यातना, विस्थापन का दर्द, धर्मनिरपेक्षता एवं वैज्ञानिक सोच को भी रेखांकित किया। इस अवसर पर युवा कवि रंजन कृष्ण ने अग्निशेखर की कविताओं पर अपने विचार रखते हुए कहा कि, उनकी कविताओं से गुजरते हुए एक ओर अपनी जडों से बिछुडने की चिन्ता परिलक्षित होती है, तो वहीं स्थानीयता का दर्द उभर कर सामने आता है। सूत्रा सम्मान के अवसर पर अग्निशेखर ने आत्मविभोर होकर कहा, कि आज के इस समारोह में मैं एक साथ कई‘-कई प्रेरणाओं, चिन्ताओं, और विचारों से खुद को आन्दोलित हुआ पा रहा हूँ। आपने एक रचनाकार के सच को, उसके समय, समाज और इतिहास के अन्तर्विरोधों, छद्मों, मनुष्य विरोधी साजिशों तथा क्रूरताओं से मुठभेड करने वाली उसकी रचनाधर्मिता को ’सूत्रा सम्मान‘ के योग्य समझा, इसके लिए मैं आप सब का आभारी हूँ। अग्निशेखर ने अपनी कविता ’नाक का सवाल‘ का पाठ किया। सूत्रासम्मान के पश्चात् अग्निशेखर को दिये गये प्रशस्ति पत्रा का वाचन शरद कोकास के द्वारा किया गया। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित जीवन सिंह ने कहा कि अग्निशेखर की कविताएँ मनुष्य और जीवन की कविताएँ हैं, और सूत्रा पत्रिाका ने उस जनपद के कवि को सम्मानित किया है, जो कश्मीर जैसे जनपद में जीवन संघर्ष से लगातार जूझता आ रहा है। उन्होंने अग्निशेखर की कविताओं के महत्वपूर्ण पक्ष को रेखांकित करते हुए कहा कि, आज जिस ढंग की कविताएँ लिखी जा रही हैं, उनमें अग्निशेखर अपनी कविताओं के माध्यम से अलग से पहचाने जाते हैं। इस अवसर पर अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए प्रेमशंकर रघुवंशी ने अग्निशेखर की कविताओं पर अपने विचार व्यक्त किये और कहा कि, विस्थापन का दर्द उनकी कविताओं में उभर कर सामने आता है। यह विस्थापन अग्निशेखर की कविताओं का जीवनतत्व है। विनोद कुमार शुक्ल ने अग्निशेखर को सूत्रा सम्मान पाने पर बधाई दी साथ ही सूत्रा द्वारा किये जा रहे रचनात्मक कार्यों की मुक्तकण्ठ से सराहना की। इस कार्यक्रम में अग्निशेखर पर केन्दि्रत मुक्तिबोध पत्रिाका का विमोचन भी किया गया। इस कार्यक्रम का संचालन सुरेन्द्र रावल ने किया। कार्यक्रम के द्वितीय सत्रा में प्रख्यात कवि एवं कृतिओर के सम्पादक विजेन्द्र पर केन्दि्रत ’लेखन सूत्रा‘ का लोकार्पण, उपस्थित अतिथियों द्वारा किया गया। उल्लेखनीय है कि लेखन सूत्रा का सम्पादन विजय सिंह करते हैं किन्तु विजेन्द्र पर केन्दि्रत ’लेखन सूत्रा‘ का सम्पादन प्रेमशंकर रघुवंशी ने किया है। इस अंक के सम्बन्ध में प्रेमशंकर रघुवंशी ने विजेन्द्र के काव्य संसार को रेखांकित करते हुए विस्तार से चर्चा की। युवा कवि विजय सिंह ने विजेन्द्र जी के लिखे पत्रा का वाचन किया जो उन्होंने इस समारोह के लिए विशेषतौर पर लिखकर भेजा था। विजेन्द्र पर केन्दि्रत इस अंक पर चर्चा करते हुए, युवा आलोचक जयप्रकाश ने कहा कि, आज के समय में ऐसी ताकतें क्रियाशील हैं जो कि हमारी परम्परा को, जनपदीय आकांक्षाओं को पसन्द नहीं करतीं, बल्कि वैश्वीकरण के माध्यम से समाज का विखंडन करते हुए बाजार का एक अंग बनाना चाहती है, जिसका प्रतिरोध सृजनात्मक भाषा में कवि विजेन्द्र के द्वारा अपनी रचनाओं के माध्यम से लगातार किया है। इस अंक पर चर्चा करते हुए एकांत श्रीवास्तव ने कहा कि, विजेन्द्र हिन्दी के एकमात्रा विरल कवि हैं जो कि जनपद एवं लोक को अपनी रचना में संरक्षित करते हैं तथा उसे हिन्दी कविता के बडे संसार से जोडकर जनपद के जीवन को समृद्ध करते चले आ रहे हैं। विजेन्द्र हिन्दी के उन विशिष्ट कवियों में से एक हैं, जिन्होंने हिन्दी कविता को एक नई दृष्टि दी है। सत्रा की अध्यक्षता करते हुए डॉ. जीवन सिंह ने कहा कि ’’कृतिओर‘‘ के माध्यम से जनपद के कवियों को लगातार शीर्ष में रखने का महत्वपूर्ण का कवि विजेन्द्र ने किया है। कार्यक्रम के अन्तिम सत्रा में कविता पाठ का आयोजन किया गया, जिसमें प्रेमशंकर रघुवंशी, अजीत चौधरी, अग्निशेखर, एकांत श्रीवास्तव, बसंत त्रिापाठी और रवि श्रीवास्तव ने अपनी कविताओं का पाठ किया। कविता पाठ का संचालन नासिर अहमद सिकन्दर के द्वारा किया गया। निरंजन महावर, कनक तिवारी, रमेश नैय्यर, राजनारायण मिश्र, संजीव बक्शी, रमेश अनुपम, विजय राठौर, विजय सिंह, बुद्धिलाल पाल, नासिर अहमद सिकन्दर, कमलेश्वर साहू, मांझी अनंत, पथिक तारक, आलोक वर्मा, संजय शाम, देवांशू पाल, नन्द कंसारी, घनश्याम त्रिापाठी, सूरज प्रकाश राठौर, भगत सिंह सेनी, आनन्द हर्षुल, सुभाष मिश्र, अंजन कुमार, त्रिाजुगी कौशिक, सतीश कुमार सिंह, तिलक पटेल, मांगीलाल यादव, रमेश शर्मा, निर्मल आनन्द, शरद कोकास, रजत कृष्ण, रजनीश उमरे, शाकिर अली, सुबोध देवांगन, अशोक तिवारी, मोईन कपासी, मिनहाज असद, किशनलाल, एस. अहमद, जयप्रकाश मानस, पूनम साहू, भास्कर चौधरी, नंदन, छगनलाल सोनी, पुष्पा तिवारी, संतोष झांझी, डूमनलाल ध्रुव आदि भारी संख्या में महत्वपूर्ण वरिष्ठ एवं युवा रचनाकार उपस्थित थे



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