KhbarExpresswww.khabarexpress.com

Job Seeker from Rajasthan,Jaipur,Jodhpur,Ajmer,Bikaner,Mumbai,Delhi,

Welcome Guest Sign In New user! Sign Up Now
Search Photo  
RSS Wednesday, February 15, 2012



Vartmaan Sahitya ::March, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner

प्रवासिनी के बोल देवी नागरानी
More Articles

डॉ. अंजना संधीर ने एक अनोखी विचारधारा को इस संग्रह के रूप में साकार करके अनूप और अनोखा स्वरूप दिया है और एक सूत्रा में पिरोकर प्रस्तुत किया है। लग रहा है जैसे नारी जाति के सम्मान में एक नया मयूर पंख लगा है, उनका दृढ संकल्प ही इस काव्य संग्रह ’प्रवासिनी के बोल‘ के रूप में प्रकाशित हुआ है। ’’ख्याल उसका हरेक लम्हा मन में रहता है / वो शम्मा बन के मेरी अंजुमन में रहता है मैं तरे पास हूँ, परदेस में हूँ, खुश भी हूँ, मगर ख्याल तो हर दम वतन में रहता है।‘‘ अंजना जी के इस कथन में एक निचोड है, एक अनबुझी प्यास का अहसास जो सीने में कहीं न कहीं पनपता तो रहता है पर खिल नहीं पाता, खिलता है तो महक नहीं पाता। उस अनजान तडप को उन्होंने शब्द दिये हैं ’प्रवासिनी के बोल‘ संकलन में परदेस में रहने वालों की भरी आँखें और तडपती हृदय-वेदना उनकी कलम की नोक से पीडा स्वरूप बहती सरिता बन कर सामने आई है, मुझे अपनी एक गजष्ल के चंद शेर याद आ रहे हैं-’’इल्म अपना हुआ तो जान गई / मैं ही कुरआन, मैं ही गीता हूँ।‘‘ ’दर्द साँझा जो सबका है देवी/ मैं उसी दर्द की कविता हूँ।‘ अपने देश और संस्कृति से कट कर प्रवासी जीवन में जो उपलब्धि और विघटन होता है, उसे नारी हृदय महसूस करता है। शल्फ वाल्डो एमरसन के शब्दो में ’’सीधा-सीधा रास्ता पकडकर न चलो, वहाँ चलो, जहाँ कोई रास्ता या सडक न हो, चलो और अपने पीछे एक पगडंडी छोड जाओ।‘‘ इस विचारधारा को अंजना जी ने मूर्त किया है। अपने श्रम-परिश्रम के बलबूते पर और साहित्य साधना की इस नई पगडंडी पर है प्रवासी कवयित्रिायों का यह संकलन। उन्होंने नारी-जाति के मनोबल व सामर्थ्य को एक मुकाम पर लाने का बखूबी प्रयास किया है। सारा आकाश नाप लेती है/ कितनी ऊँची उडान है।‘‘ (देवी) जो स्वप्न अभी तक आँखों में तैरता रहा, उसकी नींव इस किताब के रूप में रखी है, देश से बाहर, परदेस में, विरोधी वातावरण में, हिन्दी भाषा को कविता के माध्यम से जिष्ंदा रखना अनुकूल किया है। भाषा हमारे पास आने वाली पीढयों की धरोहर है। भाषा जिष्न्दा है तो हम भी जिष्न्दा रहेंगे। स्त्राी मन को जागृत करके उसके मनोबल को पहचान देना एक साहसपूर्ण प्रयास है जो इतिहास के पन्नों पर उल्लेखनीय बन जाता है। भारत व अमरीकी हिन्दी रचनाकारों के बीच एक सेतु बाँधने का श्रेय भी उन्हें जाता है। ’प्रवासिनी के बोल‘ कुल मिलाकर ६२२ पन्नों में मनोभावों से भरपूर सामने आया है, जिसमें अमेरिका में रहने वाली ८१ अमरीकी भारतीय हिन्दी कवयित्रिायों की ३२४ कविताएं पहले भाग में दी गई हैं। हिन्दी से जुडी ३३ प्रतिभाशाली महिलाओं का सचित्रा परिचय दूसरे भाग में है। तीसरे भाग में अमरीका में अब तक प्रकाशित महिला साहित्यकारों की प्रकाशित पुस्तकों की सूची भी शामिल है। हमारा घर, उसका वातावरण, दिनचर्या में हमारा चलन, आपसी व्यवहार, भाषा और संस्कृति को बरकश्रार रखने के लिये हिन्दी भाषा का अनुकूल उपयोग एक योगदान है। श्रीमती स्नेह ठाकुर ने बडी खूबी के साथ प्रस्तुत किया है। नारी/ अशक्त हूँ/ वक्त की पलकों पर टिकी हूँ/ नहर हूँ/ सागर की बाहों में थमी हूँ/ शबनम हूँ/जष्मीं के आगोश में बसी हूँ/ चिंगारी हूँ/ शोला बन कर भडकी हूँ/किरण हूँ/ सूरज में समाई हूँ/लता हूँ / तन के सहारे बढी हूँ / नदी हूँ /कगार के बँधन में बँधी हूँ/ फूल हूँ / काँटों से उलझी हूँ / कोमल हूँ / रूई के फाहों से सहेजी जाती हूँ / धरती हूँ / अंबर के चँदोबे तले फली फूली हूँ /अबला हूँ / पुरूष की संरक्षता में रहती हूँ / नारी हूँ / पुरुष व पुरुषार्थ की जन्मदात्राी हूँ। (पृ. ६७) नारी मन आकाश से ऊँचा व पाताल से गहरा होता है। एक कविता ’प्रदर्शन‘ का एक चित्रा कुछ इसी तरह का है। उन भूखी आँखों के सामने /जो आर पार होकर/ छेद जाती है निरंतर/ पर देख नहीं पाती/ उस नारी का स्वरूप / जो एक जन्मदाता है/ जीवन को बनाये रखती है/ उसको सजाने के लिये/ बलि तो दे सकती है / पर, ले नहीं सकती। (पृ. २०३) इलेन लाइनर का कहना है ’’अगर लेखक ये न लिखते कि उन्हें क्या महसूस हुआ तो बहुत सारे कागज खाली होते‘‘ इसी सच को यदि सामने रखा जाये तो देखने को मिलेगा, उन कवयित्रिायों के मन का मंथन, उनके अंदर की कोमलता दृढता, वेदना, संघर्ष, दुख, सुख, यादों की परछाइयाँ, मजबूरियों, तन्हाइयों के साथ बातें करने का अनुभव, देश की प्रति उमडता उन पर जज्ष्बा। अँतर्मन की वेदना कुसुम टँडन की ’बनवास‘ नामक कविता से छलकती हुई। रच गया एक इतिहास नया। फिर से इस जमाने में/ दे दिया है बनवास राम ने/माता पिता को अनजाने में। (पृ. १६५) डॉ. प्रियदर्शिनी का अनुभव जिंदगी के बारे में उनकी जफश्बानी। जिष्ंदगी/ नदी पर बना हुआ / लकडी का वह अस्थाई पुल है,/ जिस पर हम /डगमगाते-डोलते/ हिलोरें खाते/ भयभीत/नीचे खाई में न झाँकने का प्रयास करते/उस पार पहुँचने की ललक लिये/चलते जाते हैं। (पृ. ३५) बीना टोडी ’मेरा अस्तित्व‘ में मन को टटोल रही है। करता है प्रश्न अचानक मेरा मन/ साये से क्या वजूद है मेरा / या है अस्तित्व साये का मुझसे? (पृ. ३१२) अँजना संधीर के अपने अहसास कुछ यादों की परछाई बने हैं। चलो / एक बार फिर लिखें / खुशबू से भरे भीगे ख्ात/ जिन्हें पढते-पढते भीग जाते हैं हम/ इन्तजषर करते थे डाकिये का हम/ बंद करके दरवाजष/ पढते थे चुफ चुफ / वे भीगे ख्ात तकिये पर सर रखकर। (पृ. ८४) ’फिर गा उठी प्रवासी‘ की रचनाकार लावन्य शाह का कोमल मन झूमता हुआ प्रतीत होता है। पल पल जीवन बीता जाए/ निर्मित मन के रे उपवन में/कोई कोयल गाये रे।/सुख के दुख के, पँख लगाये/केाई कोयल गाये रे। (पृ. ४१५) सारिका सक्सेना की कल्पना इँद्रधनुषी रूप धारण करती हुई उड रही है। तितली बन मन पँख पसारे/ बिखरे रंग घनक के सारे/ शोख हवा से लेकर खुशबू/ लिख दी पाती नाम तुम्हारे। (पृ. २६०) रजनी भार्गव के कोमल मन के अछूते अहसास ’अभिमान‘ (पृ. ३७०) कविता में देखा जा सकता है। आँगन में किलकती वीरानियाँ/ जब तुलसी के आगे लौ में सुलगती है/ कार्तिक की खुनक और लौ की गरमाहट-सा है/ये अभिमान मेरा। (पृ. ३७०) इला प्रसाद की जुबानी ’’यह अमेरिका है‘‘ रात भर चमकता रहा जुगनू/ रह रह कर/किताबों की अलमारी पर/ हरी रोशनी, जलती रही, बुझती रही/ मैं देखती रही, जब भी नींद टूटी/ सोचती रही/ ’’कल सुबह पकडूंगी/ रख लूंगी शीशे के जषर में/ जैसे बचपन में रख लेती थी।‘‘ (पृ. १२१) याद आ रहा है कालिदास का ’मेघदूत‘ जो सालों पहले पढा था, मेघ अर्थात बादल जो दूत बनकर संदेशा ले कर आते हैं। अँजना जी का सफलतापूर्ण प्रयास कविता की जुबानी पूरब और पश्चिम के बीच का सेतु बनकर यही सरमाया देगा। उन्होंने अमेरिका में एक छोटा भारत निर्मित करने का सफल प्रयास किया है। डॉ. कमल किशोर गोयनका का कहना है ’’इस संकलन का सब से बडा कार्य यह है कि इतनी प्रवासी हिन्दी कवयित्रिायाँ पहली बार हिन्दी संसार के सम्मुख आ रही हैं और इतनी प्रकार की अनुभूतियां हमें मिल रही हैं, मेरे विचार में यह प्रयास स्तुल्य हैं। स्वागत के योग्य हैं।



Discuss this topic on KhabarExpress Forum 

Post Your Comments to this Article Posting Rules
Name*:
Comment*:
 


October, 2006 <br> Sponsered by : Decor Home, BikanerOctober, 2006
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
January, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerJanuary, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
February, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerFebruary, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
March, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerMarch, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
April, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerApril, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
May, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerMay, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
June, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerJune, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 

All right reserved by Khabarexpress.com
Contact Us | Archives | Sitemap | Can't see Hindi ? | News Ticker
Special Edition: Lakshchandi Mahayagya, Camel Festival 2007, Vartmaan Sahitya, Nagar Ek - Nazaare Anek, Bikaner Udyog Craft Mela
Our Network rajb2b.com | khabarexpress.com | uniqueidea.net | PelagianDictionary.com | hindinotes.com
Developed & Designed by Pelagian Softwares