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Vartmaan Sahitya ::March, 2007
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मनुष्य की अस्मिता और मुक्ति की कविताएं गोपाल कृष्ण शर्मा
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चिंतन और सृजन के धरातल पर जिन रचनाकारों ने हिन्दी कविता में सामाजिक प्रतिबद्धता की परम्परा को गतिशील और विकसित किया है उनमें एक महत्त्वपूर्ण नाम मलखान सिंह सिसौदिया का है, जो छियासी वर्ष की उम्र में भी निरन्तर लेखन से जुडे हैं और हमारे समय व समाज की गतिविधियों, परिस्थितियों तथा बदलावों के प्रति जागरुक हैं। उनका हस्तक्षेप और नयी पीढी के लेखकों के साथ निरन्तर संवाद इस बात की गवाही देता है कि उम्र के इस पडाव पर भी वे न थके हैं और न हारे हैं। ’सोशल कमिटमेंट‘ के साथ वे हिन्दी कविता के साथ जुडे हैं, जबकि उनकी पीढी के लोगों ने प्रायः पढना-लिखना बंद कर दिया है या फिर आकांक्षा से अधिक पाने की दौड में असफल होकर हताश मानसिकता के साथ जी रहे हैं। सिसौदिया जी इन सब चीजों से दूर कविता के माध्यम से प्रगतिशील और जनवादी विचारधारा को निरन्तर आगे बढा रहे हैं। यह हमारे लिये सुखद है। ’बंगाल के प्रति और अन्य कविताएं‘, ’सूली और शान्ति‘, ’दीवारों के पार‘, ’कुँआ बोलता नहीं है‘, ’अँधियारों से लडता हुआ‘, ’बात की चिडया‘ (काव्य संग्रह), ’घर वापसी‘, ’प्रगतिशील साहित्य की चिंताएं‘, ’आधुनिक हिन्दी नाटकों में नायक एवं नायिकाओं की परिकल्पना‘ तथा ’बेहतर दुनिया के लिये संघर्षों के सहयात्राी‘ (गद्य रचनाएं) आदि प्रगतिशील आन्दोलन और राष्ट्रीय स्वाधीनता के इतिहास और परम्परा को जानने और समझने के लिये महत्त्वपूर्ण रचनाएँ हैं। ’कुछ कहा कुछ अनकहा‘ सिसौदिया जी की सद्यः प्रकाशित काव्य कृति है, जिसमें कुल बावन कविताएं हैं। इस संग्रह की कुछ रचनाएं स्वतंत्राता-पूर्व की राजनीतिक एवं सामाजिक परिस्थितिय के संदर्भ में गवाही देती है और कुछेक रचनाएं आजादी के बाद के बदलावों और सामयिक यथार्थ पर केन्दि्रत हैं। कुछ रचनाएं स्वयं कवि के निजी संघर्षों और संदर्भों से सम्बद्ध है। इसके अतिरिक्त संग्रह की नदी, पेड, धरती, बादल, बबूल, धरती की पहली संतान, सागर आदि रचनाएं प्रकृति के वरदान और अभिशाप की ओर इंगित करती हैं साथ ही मनुष्य के साथ उसके रिश्तों और संवेदनाओं को भी प्रकट करती हैं। प्रकृति और मनुष्य के बीच प्रदूषण और पर्यावरण तथा पशु-पक्षी जगत की समस्याओं और मु्द्दों पर कवि की दृष्टि विशेष प्रयोजन को साधती है। प्रस्तुत संग्रह में यद्यपि विषय की विविधता और व्यापकता देखी जा सकती है लेकिन संग्रह की केन्द्रस्थ संवेदना मनुष्यता और देश-समाज के उन श्रेष्ठ मूल्यों और परम्पराओं को संरक्षित, पल्लवित और विकसित करने की है जिन्हें वैश्वीकरण और भूमंडलीकरण के द्वारा ध्वस्त किया जा रहा है। व्यक्ति को न केवल विचारविहीन और संस्कृतिविहीन किया जा रहा है वरन् उसे अपनी जडों से भी अलगाया जा रहा है। बाजारवाद, उपभोक्तावाद, उत्तर-आधुनिकतावाद, सांस्कृतिक-राष्ट्रवाद तथा धार्मिक कट्टरतावाद आदि के मायाजाल में भटकाकर मनुष्यता के विरुद्ध साम्राज्यवाद का घिनौना खेल कितनी तीव्र गति से चल रहा है। यह ’देश की तलाश‘, ’बदलती हुई शताब्दी-सहस्त्रााब्दी‘, ’उलट बाँसी‘, ’धर्म रक्षक‘ आदि रचनाओं में देखा जा सकता है। दरअसल कवि सिसौदिया का समूचा साहित्य मनुष्यता के प्रति समर्पित है। आदमी की स्वतंत्राता, अस्मिता, मुक्ति तथा प्रगति और विकास की चाहत रखने वाला रचनाकार कब चाहेगा कि मनुष्य का जीवन ख्ातरे में पड जाए। मनुष्य जाति, सम्प्रदायों और वर्गों-वर्णों में विभाजित हो जाए। उसे घर परिवार तथा रोजगार से वंचित किया जाए या फिर उसे अतीतगामी, अँधविश्वासी, स्वार्थी और अमानवीय बनने के लिए स्वतंत्रा छोड दिया जाए या फिर सिर्फ उपभोक्ता बनाकर बाजार की एक चीजष् बना दिया जाए या कि मनुष्य को धर्म के नाम पर तांडव करने वाला एक आदमखोर और आतंकवादी बनने पर मजबूर किया जाए। कवि उपर्युक्त रचनाओं में मनुष्य अस्तित्व के खतरों के प्रति चेतावनी देता है और इक्कीसवीं सदी के भटकावों से मुक्ति दिलाने का प्रयास करता है। मनुष्यता की मुक्ति के लिए कवि स्वयं ’आग‘ बनता है, क्योंकि अग्नि में ऊर्जा है जो भीषण स्फोट बनकर अनय का नाश करती है। ’मैं आग हूँ‘ कविता में क्रान्ति की आग दरअसल जनता के संघर्ष शक्ति का पर्याय है जिसके द्वारा उसने विजय पायी है। मानव-मुक्ति के प्रयास में कवि अभी भी हारा नहीं है। उसका यह आशावाद ’मैं न हारा हूँ‘ रचना में सिर चढकर बोलता है। जमीन से जुडा कवि कैसे अपनी जडों से शक्ति और ऊर्जा को ग्रहण करता है यह संग्रह की ’बबूल‘ और ’धरती की पहली संतान‘ रचनाओं से व्यक्त होता है। कवि मनुष्यता की मुक्ति और समतामूलक समाज के निर्माण का संकल्प लेता है- ’’मैं अभी तो मनुष्यता के शत्राुओं से ले रहा लोहा कलम का अस्त्रा लेकर मुक्ति-समता की नई दुनिया बनाने, रह सकें जिसमें सभी जन शक्ति से भय, रहित होकर आखिरी जय से प्रथम मैं मोरचे से हट न सकता।‘‘ वर्तमान समाज का वातावरण कितना भ्रष्ट, विषाक्त, भयावह और दूषित हो गया है कि देखते हुए भी कोई व्यक्ति प्रतिरोध नहीं करता, हस्तक्षेप नहीं करता फलतः असुरक्षा, भय, आतंक और उदासीनता सर्वत्रा व्याप्त है। मनुष्यता छटपटा रही है, सत्ताधीश वंशी बजा रहे हैं। ऐसे मुश्किल दौर में कवि सिसौदिया शहर बचाने की बात करते हैं। ’परिदृश्य‘ रचना में उनकी प्रतिरोधी क्षमता का संकेत मिलता है, वहीं व्यवस्था विरोध की पहल कवि के जीवित होने का सबूत देती है- ’’अगर्चे बडे शक्तिशाली सभी वे, न आसां उन्हें इस शहर से हटाना। मगर, यह शहर रोशनी का शहर है, इसे रात की साजिशों से बचाना‘‘। (परिदृश्य) रचना की इन काव्य-पंक्तियों में समकालीन परिदृश्य और यथार्थ की सशक्त अभिव्यक्ति हुई है। राष्ट्र और समाज को षडयंत्राकारियों के चंगुल से बचाना मौजूदा वक्त की जरूरत भी है। यह सच है कि स्वातंत्र्योत्तर भारत में बहुत बदलाव आये हैं क्योंकि यह भी वास्तविकता है कि अपना समाज और देश कहीं खो गया है। स्वतंत्रातापूर्व ब्रिटिश प्रभुओं के आधीन गुलाम देश में देशीपन की गंध बाकशी थी। लेकिन आजादी के बाद बहुआयामी परिवर्तनों की अंधी दौड में राष्ट्र क्या समूचा परिवेश और परिदृश्य ही विदेशी हो गया है। सामाजिक मूल्य, सभ्यता और संस्कृति तिरोहित हो गयी है। कवि सिसौदिया ’देश की तलाश‘ में निकलते हैं, तो उन्हें भूमण्डलीकरण के मायावी महाप्रसार में विदेशी चैनलों के दूरदर्शन के रंगीन परदे पर उन्मादक वासना के उन्मुक्त प्रदर्शन एशो-आराम और उपभोग की अनगिनत वस्तुओं से अटा बाजार और निरूद्देश्य जीवन जीते लोग दिखलायी पडते हैं- ’’कोई पराया-जैसा देश पौराणिक इन्द्रलोक की तरह जहाँ श्रम से परहेज करने वाले जीवन के प्रश्नों से विमुख मानव की व्यथा पीडा से निरपेक्ष देव-संस्कृति के अनुयायी अपने को भुलाये रहते हैं मदहोशी में जीवन को एक मोहक सपना मानकर।‘‘ (देश की तलाश) कवि इन पंक्तियों के माध्यम से उच्च शिक्षित मध्यवर्ग के जीवन मूल्यों पर चिंतन करता है कि अमेरिका जैसे देश का आदर्श और वैश्विक मूल्यों के बीच क्या स्वदेश और स्वदेशी संस्कृति जीवित रह सकेगी? सामाजिक सरोकारों का कवि अपने समाज को पतन की गर्त में नहीं गिरने देगा। वह बाजारवाद के बढते प्रभाव में व्यक्ति को जब उपभोक्ता बनते देखता है तो उसे चिंता होती है। वह बाजारवाद, उत्तर-आधुनिकता और उपभोक्तावाद को मानव-विरोधी विचारधारा मानता है। वह भूमण्डलीकरण और वैश्वीकरण के उल्टे चिंतन और इक्कीसवीं सदी की यात्राा के भटकाव और दिशाहीनता की संज्ञा प्रदान करता है और मानव-विरोधी बताता है- ’’शायद उल्टा घूमता हुआ काल-चक्र लौट रहा है उसी दिशा में सभ्यता-मनुष्यता की राह पर जहाँ से चला था आगे के लिए या समय अज्ञात भूमियों को टोहता हुआ आगे बढ रहा है, या फिर केवल चलता दिख रहा है बिना आगे बढे।‘‘ (बदलती हुई शताब्दी-सहस्त्रााब्दी) इक्कीसवीं शताब्दी में ज्ञान-विज्ञान और संचार क्रांति का दावा करने वाले लोग दरअसल विकास के उच्चतम सोपान तो छू गये लेकिन मानवता की दिशा में उनके कदम उल्टे ही पड रहे हैं। ’बदलती हुई शताब्दी-सहस्त्रााब्दी‘ और ’उलट बाँसी‘ दोनों ही रचनाओं के संदर्भ में कवि का चिंतन मुखर हुआ है। ये महत्त्वपूर्ण वैचारिक कविताएं हैं जिनके माध्यम से विश्व साम्राज्यवाद के चेहरे की परतें उघडी हैं। साम्राज्यवाद दूसरे देशों में लोकतंत्रा, राष्ट्रवाद, विकासवाद और बाजारवाद तथा उत्तर आधुनिकतावाद आदि के नए-नए चेहरों और विचारों के माध्यम से घुसपैठ करता है। उसकी घुसपैंठ प्रत्यक्ष और परोक्ष होती है। भारत, खाडी के देश, एशिया के देश इसके उदाहरण हैं जहाँ बडी तेजी से मल्टीनेशनल्स विकास का धमाल मचाये हुये हैं और वहीं अपना कल्चर भी प्रचारित कर रहे हैं। मल्टीनेशनल और बाजारवाद का जादू आज विकासशील देशों में धूम मचा रहा है। ’’देश में चीजें फैशनपरस्त/ आधुनिकता की तरह / लुभावने अंदाजष् में/ अपने रूप का विज्ञापन करती/ समुद्र पार से आ रही है / चाहत जो जगा रही हैं / रूपहीन देशी चीजों को मुंह चिढा रही हैं/ देश वासियों को उत्तर-आधुनिक बनाकर/ विदेशीपन की बारातें सजा रही हैं/ पिछडेपन को हटा रही हैं/ उदारता का मुखौटा लगाकर/ वेश बदले हुये साम्राज्यवाद से/ पूंजी की शादी रचा रही हैं।‘‘ (उलट बाँसी)। विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को माया जाल और बाजारवाद ने हमारे देश को ग्रामोद्योग, लद्यु उद्योग, ग्राम संस्कृति और भारतीयता सभी को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया है। वहीं व्यक्ति, घर-परिवार और समाज के स्वरूप को भी विकृत कर दिया है। विज्ञापन और बाजार के दाम के मोह में प्रत्येक सिर्फ और सिर्फ चीज बनकर रह गया है और भूमंडलीकरण के मगरमच्छ उन्हें निगल कर आराम से पसरे हैं। कवि की यही मूल चिंता व्यापक संवेदना के रूप में उभरी हैं। आम आदमी की मुक्ति कवि का; क्योंकि मुख्य सरोकार है इसलिये उसने ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था पर प्रभुत्व जमाये उन नवधनाढ्य वर्ग के शोषण तंत्रा पर भी दृष्टिपात किया है जिसमें गांव के भोले और सरल लोगों को आजादी के बाद घर-गांव से बेदखल होना पडा है। कवि ने ग्रामीणों की संघर्ष गाथा को बडी शिद्दत के साथ ’भजुआ-गाथा‘ कविता में अभिव्यक्ति दी है। यह कविता जन-विरोधी सरकार के समूचे तंत्रा को बेनकाब करती है। कवि ग्रामीणों को संघर्ष का रास्ता दिखाकर उनमें शक्ति, साहस और आत्म विश्वास भरता है-’’आस नहीं छोडी थी उसने/ गांव लौटकर/ घर, घरनी, धरती को / बलवानों से मुक्त करा लेने की/ ठान लिया था उसने मन में/ हार नहीं मानेगा उनसे/ दम में दम तक।‘‘ (भजुआ गाथा) ग्रामीण उत्पीडन की यह कविता सत्य पर आधारित है। कवि की विश्वसनीय अभिव्यक्ति और जन प्रतिबद्धता की ओर भी यह रचना इंगित करती है। इसी तेवर की ’कविता का मेरा मैं‘, ’धूप-मजूरिन‘, ’झुनिया‘, ’अरुणोदयम‘, ’देश की तलाश‘, ’हो गयी सुबह‘, ’छतरी‘, ’श्रम की सहचरी‘, आदि रचनायें हैं जिनमें गरीबों, मजष्लूमों, श्रमिकों, स्त्रिायों की बेबसी दुःख-दर्द और कठिन जीवन जीने की नियति को कवि ने संवेदना के साथ उकेरा है। ’कुछ कहा कुछ अनकहा‘ काव्य-संग्रह में प्रकृति को भी मानवीय संदर्भों में देखा परखा गया है। मनुष्य के साथ उसके भावनात्मक रिश्तों को अभिव्यक्ति मिली है। वहीं दूसरी ओर प्रकृति के साथ मनुष्य का अमानवीय और क्रूर व्यवहार तथा धोखा देने की कुत्सित प्रवृत्ति को भी उजागर किया गया है। कवि का सोच है कि यदि मनुष्य प्रकृति का अतिशय दोहन और उसके साथ छेड-छाड जैसे दुर्गुण को नहीं छोडेगा तो मनुष्य अपनी आफत स्वयं मोल लेगा, यह सच्चाई है। पर्यावरण प्रदूषण मानवीय अस्मिता के लिये ख्ातरा बना हुआ है। ’सार्थकता की खोज‘, ’पेड शहीद‘, ’दूब‘, ’बादल और ’धूप‘, ’बबूल‘, ’दर्द भरी दहाड‘, ’पृथ्वी का डर‘, ’गुलाब का फूल‘ आदि रचनाओं में प्रकृति और पर्यावरण का चिंतन मानव तथा प्रकृति के अन्तः सम्बन्धों की ओर संकेत करता है। प्रकृति के माध्यम से दरसअल कवि ’जियो और जीने दो की शिक्षा देना चाहता है जिससे मनुष्य का भविष्य और अधिक सुखद बन सके। मनुष्यता के उद्धार और विकास के लिये जो चीजें वरेण्य हैं वह सब कुछ इस संग्रह की रचनाओं में सहज रूप में उपलब्ध हैं।



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