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घर की उपेक्षित
वह धूल में सनी
अँधियारी कोठरी,
फटे पुराने बदरंग परदे
दीवार की उचडी पपडयाँ
टूटी कुंडी की चर-चर करती किवाड
छोटे-मोटे रेंगते कीडे,
पुराने बेकार सामान के लिए
बने स्टोर रूम में
डगमगाते पाँव वाली चारपाई पर
वे दोनों कोने में
बैठकर अपनी जिष्न्दगी के
खुशनुमा पल याद कर
अब अपनी जिष्न्दगी बिताते हैं
अखबार के पन्नों की तरह
फडफडाती है जिष्न्दगी,
सहारे को है अब सिर्फ एक
चटकी छडी जिससे वह थोडा ही
झुक कर चल पाते हैं
आज अंडे के छिलके की
तरह चटकाकर, टुकडों में नोंचकर
फेंक दिया जिन्हें,
उन्हीं की बदौलत वे अपना सर
समाज में बडी शान से उठाते हैं।
वो बूढे माँ-बाप खोज रहे
रिश्तों के वे दस्तावेजष्
जिनपर आकर कोई प्यार की
मोहर लगा दे।
सिसक कर खोखली हो गई हैं आँखें
अब तो दुःख से आँसू भी नहीं
निकल पाते
रिश्तों के टूटते दायरों में अब वे
सिर्फ मुक्ति ही चाहते हैं,
इस खोखली अंधी पीढी की दौड में
अब माँ-बाप भी स्टोर रूम का
पुराना-बेकार सामान नजष्र आते हैं।
नरपिशाच
लम्बे तीखे नाखूनों से
नोंचते,
कुरेदे जा रहे
हादसों में सहमती
कलपती मासूमियत
लील रहे नरपिशाच
क्रूरता और जूनून की
अंधी अजूबी दुनिया
इंसानी जामे पहनी
खंडित होती मानवता
असीसती, कलपती माताएँ
ज्वालामुखी में दहक रहीं।
लील रहे वो मासूम बचपन
दबे पाँव
किस जुर्म की सजष में न जाने
मसलते जा रहे हैं वो फूल
परमात्मा की छाया हो रही
कलंकित
मानवीय रिश्ते गिराता, फिर
आदमी आदिम
होता जा रहा,
इस पनपते समाज में आज भी
अजीब सी दहशत है।
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