कोयल विरुदावलि कहें, भ्रमर बजाएं साज।
गजरे ले शाखें खडीं, आते हैं ऋतुराजड्ड
जाडे को कर पराजित, लीनीं सत्ता छीन।
मनमोहक ऋतुराज अब, गद्दी पर आसीनड्ड
फूल-फूल शाखें हुईं, झरें गंध-मकरन्द।
बौराई डोले हवा, रचे सुरभि के छन्दड्ड
दुर्जन के भी आचरण, मधुऋतु में प्रतिकूल।
फूल सुकोमल झर रहे, कांटों भरे बबूलड्ड
पेटी भर कर सुरभि की, फेरी करत बयार।
मुफत बांटता हो इतर, ज्यों कोई अत्तारड्ड
सिगडी सुलगाए हवा, धौंके बारम्बार।
सेमल की डाली खिले, पोर-पोर अंगारड्ड
फूल गलीचे से बिछे, बैठे बिरछ महन्त।
ज्ञान गंध का बांटते, जब से लगा बसन्तड्ड
गुस्साई-सी लग रही, देखो लाल कनेर।
क्यों बसन्त ने लगा दी, अब की इत्ती देरड्ड
उनके मन को छू गई, जाने किस की बात।
चुफ-चुफ से झरा, महुआ सारी रातड्ड
कलियों में सिन्दूर भर, पिचकारी में आग।
ऊंचे बिरछ पलास के, खेलें अद्भुत फागड्ड
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