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दो कविताएं - डॉ. उत्तिमा केशरी
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बदरू कुम्हार
बदरू कुम्हार
झरझरी टूटी मचिया पर बैठे
बनाता है-
रंग-बिरंगी छोटी मूर्तियाँ
अपने कमजषेर
और
थिरकती उंगुलियों से
घूमते चाक पर,
चलनी की थिरकन सी।
बदरू की पत्नी
कमियाँ
गूँथती रहती है दिन भर
दोमट मिट्टी
खनखनाती चूडयों के मध्य
और
बनाकर देती है
रोटी की गोल-मोल
लोइयों की तरह
बदरू देखते हैं
कभी-कभी
अपनी तिरछी निगाहों से
कमियाँ की थिरकती आँखें, होंठ
और देखते हैं
रूखे उलझे बाल
जिसे बाँधी है कसकर
धोती की मैली, पुरानी
कोरों की कतरन से
मानो उसके जीवन में
पसरे दुख
ही हो
उसका श्ाृंगार।
शाम ढलते ही
कमियाँ
पकाती है
मिट्टी के तवे पर
जुन्हरी और बाजरा की रोटी
टिमटिमाते दिये के
धुँधले प्रकाश में।
कमिया की
इस मलिन मुख की
सौम्यता को देख
बदरू
भूल जाता है
कुछ क्षण के लिए
अपना सब दुख।
ओस से नहाई
जीवन का
हर वह तरंगित पृष्ठ
भरा रहता है
तुम्हारी
अनुपम स्मृतियों से।
तुम्हारी वह
पहली भेंट
खूबसूरत पीली कलम
जब भी लेती हूँ
अपनी अंगुलियों में
और
लिखती हूँ तो
हर अक्षर के साथ
प्रस्फुटित होती है
एक मधुमय सुगंध।
तब तुम्हारी
घनीभूत यादें
झूम उठती हैं
ओस से नहाई
पीली सरसों की फूल सी
और
गूंजने लगती है
लहराती
धान की बालियों
की रूनझुन-सी।
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Comments to this Article |
Name: |
Rajesh (09/06/2007 09:02:13) |
59.95.176.66 |
Comment: |
Nice Poems. |
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