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Vartmaan Sahitya ::March, 2007 Sponsered by : Decor Home, Bikaner साजिश्श - डॉ. प्रभा मजुमदार
अंधेरे तिलिस्म के
दरवाजे पर थाप मार रही हूँ कबसे
और निगाहें ढूँढ रही हैं
किसी बंद पडे दरवाजे की चाभी को
पिंजरे में बंद तोता
जिसमें किसी दैत्य के प्राण बसे हैं
या जादूगरनी द्वारा
भेड बना दी गई है राजकुमारी...
मायालोक का अन्त नहीं है
किसी बेताल की तरह
कंधों पर उलटी लाश को टाँगे हुए
बेतहाशा, अनजान दिशाओं में
बढती जा रही हूँ
अंधेरे तिलिस्मी कमरे
पूरे नगर में फैल गये लगते हैं
और हर पत्थर, खम्भे
और पेडों के झुरमुट
कुछ कहते हुए लगते हैं
नहीं समझ आती मुझे
पक्षियों की भाषा
घटनाओं का पूर्वाभास देने के लिए
इंदि्रयों की संवेदना
कब से खो चुकी है
बचाव में पूरी तरह असमर्थ मैं
परछाइयाँ
अनजाने ही घेर कर मुझे
एक बुत में बदल देती हैं।
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