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पूजा लक्जमबर्ग फाउन्डेशन‘, जर्मनी के सहयोग से निदेशक प्रो. रूपरेखा वर्मा के नेतृत्व में ’’साझी दुनिया‘‘ लखनऊ, की टीम द्वारा एक अध्ययन किया गया। अध्ययन की रिपोर्ट पर आधारित है यह लेख। -संपादक)
१. रीति-रिवाजों का बाजषरीकरण और मीडिया
रीति-रिवाजों से सम्बन्धित खबरें, लेखों, उनसे जुडे चित्राों की अधिकता हमें इलेक्ट्रानिक तथा प्रिंट मीडिया दोनों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। कौन सा व्रत कब होगा, उसे कब मनाना ज्यादा उचित होगा, पूजा-विधि, उसका सबसे अच्छा मुहूर्त आदि की जानकारी हमें मीडिया द्वारा दी जाती है। ’वट-सावित्राी व्रत आज, बहुला चौथ आज, करवा चौथ कल, मनायी गयी तीज, ७ः४५ पर दिखेगा चाँद, सूर्य उपासना का व्रत छठ, पुत्रादा एकादशी आदि की सूचना निश्चित रूप से आम मध्यवर्गीय परिवार की स्त्राी की अखबार की पठनीयता को बढाता है। प्रातः उठकर स्त्राी इन सूचनओं के माध्यम से तिथि/व्रत का पुख्ता प्रमाण पाती है तथा इन खबरों पर निर्भर करती है।
व्रत-त्योहार छोटा हो या बडा हमें कोई न कोई सूचना अवश्य अखबार में दिखाई देती है। राखी, करवा चौथ से लेकर सकठ चतुर्थी, हरछठ, बहुला चौथ तक की जानकारी इनमें मिलती है। यही नहीं पथवारी माता, पुत्रादा एकादशी, जो कि बहुत सीमित क्षेत्रा का त्योहार है, की सूचना भी दी जाती है।
अखबारों में रीति-रिवाज के धार्मिक पहलू को बहुत बढावा दिया जाता है। सूचना देने का काम तो मीडिया करता ही है व्रत करने की विधि व कारण बताता है कि यह व्रत कैसे तथा क्यों किया जाता है। पूजन विधि दी जाती है करवा की पूरी कथा बतायी जाती है। विवरण सहित इन व्रतों को दिया जाता है। वट-सावित्राी व्रत के बारे में मीडिया लिखता है कि स्त्रिायों ने पूडी-पकवान बनाकर जहाँ वृक्ष की परिक्रमा की वहीं पति की दीर्घायु की कामना की। व्रत विधान में यह भी कहा गया है कि यदि वृक्ष न हो तो पर्व की अल्पना का भूमि अथवा दीवार पर अंकन करके पूजन हो सकता है।
इन व्रतों का केन्द्र महिलायें होती हैं। करवा, बहुला चौथ, हरछठ, तीज, गुडया, वट सावित्राी व्रत में महिलाओं को बताया जाता है कि वे क्या तथा कैसे करें। इन खबरों में मीडिया की भाषा जेण्डर भेद-भाव पूर्ण होती है। पूजावट की कामना सौभाग्य की, पति की दीर्घायु के लिए रखा व्रत, करवा व्रत रखकर की पति की दीर्घायु की कामना, ढलते सूर्य को अर्ध दे पुत्राों की दीर्घायु की कामना की, पुत्रावती महिलाओं ने हरछठ मनायी, अचल सौभाग्य देता है करवा चौथ, हर सुहारिगन बाट जोहती है करवाचौथी की, सिन्दूर खेलती सुहागिनें।‘
पति/पुत्रा की उम्र का सारा दायित्व औरतों का है। औरतें ये सारे व्रत रखें तभी पति/पुत्रा की उम्र बढेगी अन्यथा नहीं। अपनी उम्र बढाने का औरतों के पास कोई रास्ता नहीं। किसी ऐसे व्रत की सूचना हमें नहीं मिलती जो औरतों की उम्र बढाता हो क्योंकि ऐसा व्रत धार्मिक परम्पराओं में प्रचलित ही नहीं है लेकिन मीडिया कभी इस पर सवाल भी नहीं उठाता।
स्त्राी को उम्र की नहीं सौभाग्य की जरूरत होती है इसी मानसिकता को मीडिया भी बढावा देता है। सौभाग्य यानी पति की उम्र। ’सौभाग्य‘ अर्थ यहाँ मात्रा पति का जिन्दा रहना होता है। अच्छे या सुखमय, प्रेमपूर्ण जीवन का सौभाग्य से कोई लेना-देना नहीं होता है। ’सौभाग्य‘ तथा ’सुहागिन‘ दोनों शब्दों को मीडिया लगभग समानार्थी अर्थ में ही प्रयोग करता है।
’सुहागिन‘ शब्द से मीडिया को इतना ज्यादा प्रेम है कि मीडिया व्रतों के बारे में बिना गहरी छानबीन किये गलत जानकारी भी देता है। सभी व्रतों/त्योहारों का एक ही रूप, एक ही भाव, तथा एक ही तरीका हर जगह नहीं पाया जाता। लेकिन मीडिया इनका सार्वभौमीकरण कर देता है। ’कजली, तीज का व्रत उत्तर प्रदेश के ज्यादातर हिस्सों में कुंआरी तथा विवाहित स्त्रिायाँ, चाहे पति जिन्दा हो या नहीं, रखती हैं। वैवाहिक स्थिति से इस व्रत पर कम से कम कुछ हिस्सों में कोई फर्क नहीं पडता लेकिन मीडिया ’सुहागिनों‘ ने रखा कजली, तीज जैसी भाषा का प्रयोग तथा गलत जानकारी देकर इसे सीमित ही नहीं करता बल्कि औरतों के बीच वैवाहिक स्थिति का स्पष्ट विभाजन करते हुए अन्य औरतों को वंचित की श्रेणी में डाल देता है।
इस प्रकार गोरखपुर, बस्ती, जिलों में औरतें सिर्फ माँ बनने पर, चाहे वह पुत्राी की माँ या पुत्रा की, डाला छठ का व्रत रखती हैं लेकिन यहाँ भी मीडिया ’पुत्रावतियों‘ शब्द पर ही जोर देता है। यह न सिर्फ जानकारी का अभाव है बल्कि जेण्डर भेदभाव के साथ बहुलतावादी संस्कृति को खत्म करने तथा समान बनाने का प्रयास भी है।
खबरों के अलावा लेखों में भी समाज में प्रचलित धार्मिक पहलू को ही बढावा दिया जाता है। वे भी पूरी तरह जेण्डर भेदभावपरक भाषा से भरे होते हैं। लेखों के माध्यम से इन व्रतों, रीति-रिवाजों को सार्वभौमिक बनाया जाता है तथा एकरसता की तरफ लाने का प्रयास दिखाई देता है जो कि नीरसता के साथ ही उबाऊपन को भी दर्शाता है।
रीति-रिवाज से सम्बन्धित खबरों में वैज्ञानिकता का प्रायः अभाव रहता है। सूर्यषष्ठी की महिमा का गुणगान सिर्फ ’पुत्रावतियों‘, ’सुहागिनों‘ के सन्दर्भ में किया जाता है। इससे जुडी खबरों में पूजा करने वाली औरतों के माथे से बहता सिन्दूर चित्राों मे दर्शाया जाता है। पुत्रावती स्त्रिायाँ अनिवार्यतः आजन्म सुहागिन रहें ऐसा किस वैज्ञानिक नियम के अन्तर्गत आता है? सूर्य षष्ठी की पूजा स्त्रिायाँ ही नहीं पुरुष भी करते हैं। ढलते सूर्य को अर्घ्य/जल देना दार्शनिक/वैज्ञानिक अवधारणा हो सकती है इसका मीडिया से कोई लेना-देना नहीं दिखता।
रीति-रिवाजों के तहत जेवर से जुडी चीजों को वैज्ञानिक साबित करते प्रयास अवश्य मीडिया के लेखों में दिखाई देते हैं। बिन्दी लगाने से क्या होता है, बिछिया पहनने से कौन सी नस दबती है, उससे क्या लाभ है, ऐसे लेख अक्सर देखने को मिल जाते हैं। पर ये सुहाग चिह्न सिर्फ हिन्दू स्त्राी के लिए ही क्यों है? अन्य धर्म की स्त्रिायाँ इसे धारण क्यों नहीं करतीं? क्यों सिर्फ ’सुहागिन‘ स्त्राी ही इन सुहाग चिह्नों पर कब्जा किये बैठी हैं? क्यों नहीं इसको अन्य धर्मों/वैवाहिक स्थिति की औरतों तक बढावा दिया जाता? इसका कोई उत्तर ऐसे लेख कभी नहीं देते। न ही ये लेख कोई प्रत्यक्ष वैज्ञानिक सम्बन्ध जोडकर दिखा पाते हैं। वे सिर्फ इतना ही बताते हैं कि ऐसा करने पर ऐसा होता है और निष्कर्ष, में यह कह दिया जात है कि ये वैज्ञानिक हैं।इसके बीच के कार्य-कारण सम्बन्ध/ वैज्ञानिकता हमें नहीं बताई जाती है।
रीति-रिवाजों का पूरी तरह बाजारीकरण मीडिया द्वारा किया जाता है। दुर्गा-पूजा के अवसर पर सजना-सँवरना तथा आभूषण खरीदने के तरीके बताये जाते हैं। प्रथम दिन से लेकर नवमी तक अलग-अलग कपडे पहनाने के लिए रिवाज का बहाना लिया गया है। पर इस सजने-संवरने में भी सुहागिन व अन्य औरतों के बीच विभाजन किया गया है। पायल पहनने व जीन्स का घालमेल किया गया है यानी साडी ही नहीं, जीन्स पर भी पायल। दोहरी मार। साडी को ग्लैमरस बताया गया है। साडी के बारे में पूरा ब्योरा एक तरह से मीडिया द्वारा किया गया विज्ञापन है।
मीडिया द्वारा हर त्योहार-व्रत पर उससे जुडी चीजों /वस्तुओं की उपलब्धता की जानकारी दी जाती है। करवा चौथ पर कैसे-कैसे करवे मिलते हैं। दीवाली पर झालरें, दीये, उनके प्रकार, बाजार के अन्य सामान्य कपडे, जेवर की पूरी जानकारी आम व्यक्ति को मिलती है। राखी के मौके पर चाँदी-सोने की राखी तथा उनके मूल्य भी बताये जाते हैं। नौलखा हार तर्ज पर अब नौ रत्नों वाली राखी भाई-बहन के स्नेह के त्योहार रक्षाबन्धन के मौके पर सराफा बाजार में उपलब्ध है। कीमत है सिर्फ साढे छह हजार रुपये। तनिष्क शोरूम में नौ रत्नों वाली राखी में तराशे गये पुखराज, पन्ना, मोती, मूंगा, हीरा, लहसुनिया व गारनेट जडे हुए हैं। करवा चौथ पर पीतल का करवा सौ रुपये से लेकर एक सौ बीस रुपये तक, फूल का करवा एक सौ पचास रुपये से लेकर तीन सौ रुपये तक जबकि स्टील का करवा साठ रुपये से लेकर नब्बे रुपये तक है। इसी तरह अन्य त्योहारों पर भी व्यक्ति को बाजार की तरफ आकर्षित किया जाता है।
प्रेम को भुनाने का प्रयास किया जाता है। यह प्रेम प्रमुख रूप से करवा-चौथ व राखी में भुनाया जाता है। यदि आप अपनी पत्नी से प्रेम करते हैं तो करवा चौथ पर उसे गिफ्ट दीजिये और यदि बहन को प्यार करते हैं तो राखी पर गिफ्ट दीजिए। इसमें दाता पुरुष है जो ताकतवर है जिसकी खरीदने की सामर्थ्य है जो बाजार तक पहुँच सकता है। उसे मीडिया द्वारा बार-बार सलाह दी जाती है उकसाया जाता है। प्रेरित किया जाता है कि वह अपने प्रेम को ’गिफ्ट‘ द्वारा प्रदर्शित करें यानी जहाँ प्रदर्शन नहीं, वहाँ प्रेम नहीं। क्या यह भी मान लिया जाय कि जहाँ राखी या करवा चौथ नहीं होती वहाँ प्रेम नहीं होता? शायद इसीलिए इन त्योहारों को राष्ट्रीय त्योहार जैसे हो जाने का दावा किया जाता है। (बाध्य किया जाता है )
सारे हिन्दू-मुसलमान भाइयों ने राखी मनायी। बडे-बडे चित्रा इसी के दिये जाते हैं। सेना में सभी हिन्दू-भाइयों को राखी भेजी जाती है। करवाचौथ सभी (अविवाहित भी ) मनाने लगे हैं। सगाई के बाद भी इसे रखे जाने के दावे किये जाते हैं। राखी और मंगलसूत्रा दोनों रक्षा के प्रतीक हैं। एक में रक्षक पिता होता है दूसरे में भाई। ऐसी खबरों के ठीक बगल में मंगलसूत्रा की बाजार में उपलब्ध वेराइटी की चर्चा की जाती है। दाम बताये जाते हैं। पति के प्रेम का एक रूप यह भी होता है कि वह इस खास मौके पर एक दिन पत्नी के घरेलू कामों में हाथ बंटाता है। चाँद निकल आने की सूचना पत्नी को देता हे तथा अपने हाथ से कुछ खिलाकर पत्नी का व्रत तुडवाता है।
जिन औरतों के पति उनके पास नहीं होते या जो पति पत्नी से किसी तरह का रिश्ता नहीं रखते या जो हिंसा का शिकार होती हैं, उनकी कोई जानकारी करवा चौथ के संदर्भ में मीडिया द्वारा नहीं दी जाती। यह बात अलग है कि ये औरतें फिर भी व्रत रखती हैं। बाजार ने अंधविश्वास का सबसे ज्यादा फायदा उठाया है। एक शहर में अफवाह फैली कि इस वर्ष, गौरी माता कुपित होने वाली हैं इसलिए उन्हें फूल अगबत्ती के साथ बिछिया, चूडी, पायल आदि चीजें भी चढाई जाँय। कुछ घन्टों में ये सारी चीजें बिक गयीं। हमारे रीति-रिवाजों त्योहारों ओर परम्परओं का बाजार से गहरा रिश्ता है। वह इनका इस्तेमाल करते हैं। मीडिया में रीति-रिवाजों के नाम पर सचित्रा आने वाली खबरें सबसे ज्यादा प्रतियोगिताओं की होती हैं जो कभी तीज के नाम पर होती हैं तो कभी करवाचौथ के नाम पर। राखी और मेंहदी प्रतियोगितायें होती हैं। प्रथम, द्वितीय, तृतीय पुरस्कार दिये जाते हैं। विवाहितों-अविवाहितों की अलग-अलग प्रतियोगितायें होती हैं। प्रतियोगिता में एक तरफ मेंहदी लगाये हाथ होते हैं तो दूसरी तरफ ’’सुहाग‘‘ गाती औरतें। तरह-तरह के कपडों में मिस-मिसेज करवा चौथ चुनी जाती हैं जो मॉडल जैसी दिखती हैं। यह वह बाजार है जो परम्परा भुनाता है, आधुनिकता सिखाता है, और दोनों को मिलाकर खुद कमाता है।
मीडिया रीति-रिवाजों का री-इन्वेशन व इन्वेशन दोनों करता है। दूर्वा अष्टमी नामक व्रत जो उत्तरांचल में मनाया जाता है जिसके बारे में मीडिया स्वयं स्वीकार कर रहा है कि यह व्रत किसी धर्मग्रन्थ में नहीं दिया गया है, करने की सलाह दी गयी है। ’पथवारी‘ माता की पूजा अर्चना जो कि मारवाडी समाज का हिस्सा है उसे सबको करने की भी सलाह दी गयी है। दुर्गापूजा पर दुर्गा प्रतिमा के सामने ’सिंदूर खेलती सुहागिनें‘ शीर्षक से काफी बडा स्पेस देते हुए प्रथम पृष्ठ पर छापा गया है। इसने एक नयी परम्परा को ग्लोबलाइज किया है।
इसी तरह अमित-वनिशा मित्तल की शादी के सारे रीति-रिवाज मीडिया ने री-इंवेन्ट किये। मुख्य रूप से रीति-रिवाज के संदर्भ में हिन्दू रीति-रिवाज को मीडिया द्वारा काफी स्पेस दिया जाता है और इसका बाजारीकरण भी किया जाता है। लेकिन ईद के मौके पर काफी अखबारों ने विस्तार से इसकी जानकारी दी धार्मिक दृष्टि से और बाजार की दृष्टि से भी। खाने की कौन-कौन सी चीजें तथा कपडों में कहाँ क्या उपलब्ध है इसकी सम्पूर्ण जानकारी मीडिया ने दी।
विज्ञापनों के माध्यम से बाजार पूरा फायदा उठाता है जिस त्योहार का समय होता है उस कैप्शन के साथ मुबारकबाद दी जाती है और सामान खरीदने की सलाह। गिफ्ट करने की सलाह भी चाहे बहन को हो या पत्नी को।
इलेक्ट्रानिक मीडिया त्योहारों पर ’लाइव‘ टेलीकास्ट करता है पर उसका भी उद्देश्य फायदा उठाना ही होता है जो कि बाजार से संचालित होता है। कार्यक्रम के बीच विज्ञापन की भाषा भी उसी तरह की होती है।
२. मीडिया की नजर में स्त्राी-हिंसा
हिंसा सम्बंधी खबरों का विश्लेषण करने पर यह कह पाना कठिन पाते हैं कि मीडिया द्वारा स्त्राी हिंसा पर जो भी खबरें दी जा रही हैं उनमें कितनी खबरें सकारात्मक हैं और कितनी नकारात्मक। दोनों तरह की स्थिति हमें मीडिया में देखने को मिलती हैं।ऐसी खबरों के बारे में प्रतिशत निकाल पाना तो नितान्त मुश्किल है पर इतना निश्चित है कि मीडिया स्त्राी हिंसा की खबरें कवर करने में अपना दायरा काफी बढा चुका है।
स्त्राी हिंसा की खबरें स्थानीय पन्नों पर ज्यादा होती हैं। पाँच-छः पन्नों की स्थानीय खबरों में हमें दहेज, बलात्कार, चेन छीनने, यौन उत्पीडन, आत्महत्या, हत्या या अन्य कई प्रकार की खबरें देखने को मिलती हैं। दहेज उत्पीडन और हत्या की खबरें लगभग रोज होती हैं। संक्षिप्त खबर के रूप में ’दहेज हत्या‘, दहेज उत्पीडन, दहेज के लिए जलाया, दहेज के लिए मारा, आदि सामान्य भाषा में ही सूचनात्मक शैली में होती हैं।
मीडिया की विवरणात्मक शैली हमें कई बार तब मिलती है जब मीडिया की नजर में ये खबर थोडी ’वजनदार‘ हो अर्थात् यदि मामला ज्यादा पढे-लिखे या पैसे वालों से जुडा हो। मीडिया की सकारात्मक दृष्टि भी इसमें दिखाई देती है जो यह दर्शाता है कि समाज में किस तरह का विरोधाभास व्याप्त है। लडकी चाहे जितनी पढ-लिख जाये समाज का उसके प्रति नजरिया इतनी आसानी से नहीं बदलने वाला।
बलात्कार, योन उत्पीडन, छेड-छाड आदि की खबरों के बारे में यह कहा जा सकता है कि मीडिया यहाँ कोई गम्भीर भूमिका नहीं निभाता लेकिन जब रिश्तों की सामाजिक मर्यादा का प्रश्न होता है तो मीडिया अपराधी के प्रति काफी कटु होता है तथा इसे समाज के लिए गम्भीर खतरा मानता है। यूँ तो मीडिया प्रायः दहेज, बलात्कार सम्बन्धी खबरों का फालोअप न के बराबर करता है लेकिन हाई प्रोफाइल मामलों जैसे मधुर भण्डारकर रेप केस, हन्ना कोहली रेप केस, जेनी केस का फालोअप काफी ज्यादा किया गया। मीडिया लगातार सचित्रा इन खबरों को जगह देता है। अक्कू यादव केस में मीडिया पूरी तरह महिलाओं के समर्थन में रहा। ग्रेट रोमन सर्कस की अबोध बच्चियों के यौन उत्पीडन को मीडिया ने लगातार केन्द्र में रखा तथा उत्पीडन के विरोध में अपने नजरिये को व्यक्त किया।
कई बार मीडिया द्वारा नियमों-कानूनों का उल्लंघन किया जाता है जैसे किसी कालगर्ल या अन्य दुर्घटनाओं की शिकार महिलाओं का चेहरा दिखाना तथा उसकी पहचान बताना गैर कानूनी है लेकिन मीडिया कई बार ऐसा करता है तथा खबर को इस तरह गाँव-नाम आदि के वर्णन सहित देता है कि उससे पहचान छुप नहीं पाती।
भाषा की दृष्टि से मीडिया कुछ स्थितियों, खबरों में काफी नकारात्मक दिखाई देता है। चेन छिनने की घटनाओं में स्त्राी की पहचान मात्रा पुरुष से होती है। उसका अपना नाम भी प्रायः नहीं होता। उदाहरणार्थ इंजीनियर की पत्नी की चेन छीनी गयी, व्यापारी की पत्नी की चेन, दरोगा की पत्नी...। यहाँ ’दरोगा‘ बडे-बडे शब्दों में होता है जो कहना चाहता है कि जिस पर समाज की सुरक्षा की जिम्मेदारी है उसकी पत्नी भी सुरक्षित नहीं है।
विधवा शब्द मानवाधिकार तथा विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा प्रतिबन्धित हने के बावजूद मीडिया द्वारा बेझिझक परिचय की तरह मुख्य हेडिंग बनाते हुए इस्तेमाल किया जाता है। ’जिन्दा रहते ही विधवा को मार डाला‘, शहीद की बेवा अभिभूत‘, ’विधवा के संरक्षण को लेकर तनाव‘। मीडिया ’अबला‘ शब्द का इस्तेमाल भी निरर्थक रूप से करता है। ’अबला से छीनी जमीन‘ यहाँ जष्मीन किसी पुरुष से भी छीनी जा सकती है जो कमजोर हो पर तब मीडिया की भाषा व नजर होती है ’दबंगों ने छीनी जष्मीन‘। तब मीडिया पुरुष के लिए ऐसे किसी विश्लेषण का इस्तेमाल नहीं करता। ’लडकी भागी/लडकी भगाई, जहाँ लडकी ही ऐसी वस्तु है जो भगायी जा सकती है या भाग जाती है, मीडिया की प्रिय हेडिंग है। देह व्यापार की काफी खबरें आती हैं। ये खबरें ज्यादातर सूचनात्मक ही होती हैं। ज्यादातर ई-मेल इंटरनेट आदि आधुनिक तकनीकी का महिलाओं के खिलाफ हिंसा में काफी इस्तेमाल हो रहा है। यह हिंसा प्रायः अश्लीलता के रूप में सामने आती है। यहाँ किसी की निजता को आधार बनाया जाता है। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरीकों से आपराधिक प्रवृत्ति व मनःस्थिति को बढावा दिया जाता है।
अन्य प्रकार की हिंसा की खबरें भी हमें देखने को मिलती हैं। जिसमें शराब पीकर पति द्वारा पीटने, हत्या करने, मायके चले जाने पर उसके घर में घुसकर मारने या अवैध सम्बन्धों पर प्रताडत करने की खबरें होती हैं। दूसरी शादी करने के लिए उसे सताने, बच्चे न होने पर या बेटा न होने पर तंग करने यानी कि हिंसा के अनेक रूप मीडिया के पृष्ठों पर प्रायः सूचनात्मक, कभी-कभी विवरणात्मक तथा कई बार आलोचनात्मक शैली में मिलते हैं।
औरतों पर घरेलू हिंसा होती है, जैसे-जैसे उनका दायरा बढा है वैसे-वैसे उनपर बस-टैम्पो स्टैण्ड, ऑफिस, स्कूल, सडक पर भी हिंसा है। शरीरिक तथा मानसिक दोनों तरह की हिंसा की खबरें हमें दिखाई देती हैं। तलाक-तलाक-तलाक कहकर उसे हमेशा के लिए बेघर कर देना बहुत बडी हिंसा है। मीडिया ऐसी खबरों पर सिर्फ सूचना नहीं देता बल्कि वाद-विवाद की जंग भी चलाता है, विचार भी देता है और बडे-बडे सम्पादकीय भी लिखता है। यही काम मीडिया तब भी करता है जब कट्टरतावादी ताकतें अपना शिकंजा कसती हैं, इस्लाम के नाम पर ’गुडया‘ को फतवा दिया जाता है। जब गोत्रा के नाम पर ’सोनिया-रामपाल‘ को अलग करने की साजिश की जाती है या किसी प्रेमी-प्रेमिका को पंचायत फासी दे देती है, मार देती है या बेइज्जत करने के अनेक क्रूर तरीके निकालती है।
कानूनी अपराध होने के बाद भी डाक्टरों द्वारा ’जीवन लेने‘ के गोरखधन्धे की पोल मीडिया खोलता है। सामाजिक सच्चाई तथा माँ-बाप की मानसिकता से रूबरू कराता है। जिस पुत्रा की कामना में पूरा समाज पागल है, धर्म से लेकर तकनीकि तक का सहारा लेता है उसी समाज की सच्चाई यह भी है कि ’पुत्रा की प्रताडना से त्रास्त वृद्धा ने मिट्टी का तेल डालकर आग लगा ली और गम्भीर रूप से झुलसी वृद्धा के निर्दयी पुत्रा ने उसकी जिन्दा ही चिता जला डाली।‘
स्त्राी गर्भ से लेकर बुढापे तक, गैरों से लेकर अपनों तक के बीच कहीं भी सुरक्षित नहीं है। कई बार मीडिया स्वयं स्त्रिायों के लिए मानसिक हिंसा की स्थिति में आ जाता है ’मायके जाने की जिद से पति ने आत्महत्या की‘। यहाँ मीडिया की सोच मायके जाने की स्वाभाविकता को जिद समझने की है। कई लेखों में मीडिया स्त्राी की जागरूकता, शिक्षा, आर्थिक स्वावलम्बन को हिंसा का कारण मानता है। विवाह की बढती उम्र या विवाह न करने की प्रवृत्ति के लिये स्त्राी को ही दोषी ठहराता है बजाय इसके सामाजिक विश्लेषण के। घर की जिम्मेदारियों को एकतरफा स्त्राी का उत्तरदायित्व मानता है या घर के उपेक्षित होने की शिकायत बाहर काम करने वाली स्त्राी से करता है। मीडिया स्त्राी पर सीधे-सीधे हिंसा तब भी करता है जब दहेज की एक-आध झूठी खबर या बेजा इस्तेमाल पर अत्यन्त चिन्तित होकर लेख सम्पादकीय और आँकडे एक साथ देने लगता है।
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