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Vartmaan Sahitya ::March, 2007
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उच्चतम न्यायालय के आदेशानुसार १० अक्टूबर २००६ से बाल श्रम पर कानूनी रोक लगा दी गई है। कहना न होगा कि रातोंरात सामाजिक स्थितियां नहीं बदलतीं। स्थिति जस की तस है लेकिन इस दिशा में आगे प्रयास करने के लिये कानून की मदद का रास्ता बना है। सरकारी आंकडों के अनुसार २५ करोड बच्चे बाल श्रमिक के रूप में आज काम कर रहे हैं। इनकी आयु ५-६ साल से लेकर १४ साल तक हो सकती है। बहरहाल कानून ने अपना काम कर दिया है। यक्ष प्रश्न यह है कि समाज क्या करेगा ? ये विशुद्ध आर्थिक स्थितियों से जुडे सामाजिक सवाल हैं जिनका हल भी केवल समाज की इच्छा पर निर्भर करता है। कानून के रखवाले कभी कभार छापामार पद्धति अपनाकर ’गुडवर्क‘ दिखाना चाहते हैं। एकाध छोटी मछली जाल में पकड जाती है। किसी फैक्टरी से तीन चार, या दुकान अथवा ढाबों से एकाध बालश्रमिक बरामद किये और पुलिसिया छवि चमकी। अब इसके बाद ? फैक्टरी, दुकान या ढाबा मालिक ने मोटी रकम दी, कुछ तो इसी खाकी बर्दी की जेब में गया और कुछेक नेता या मध्यस्थता कराने वालों की जेब में। जहाँ करोडों की संख्या में बालश्रमिक काम कर रहे हैं वहां दो-चार ऐसे छापों से कितना उद्देश्य पूरा हो सकता है। फिर कानून भी बिना सामाजिक चेतना के बिल्कुल मखौल है। कुछ फैक्टरी मालिकों ने बताया कि इससे कुछ फर्क नहीं पडने वाला। सिर्फ पुलिस द्वारा वसूली की जाने वाली चौथ के रेट बढ जायेंगे। वर्ना जब पुलिस आती है या कोई अधिकारी ’’मित्रावत‘‘ जांच के लिये आता है तो खुद ये बाल श्रमिक अपने को पन्द्रह साल का प्रमाणित कर देते हैं।
जहां स्वयं सेवी संस्थाएं सक्रिय हैं केवल वहीं पुलिस बाल श्रमिकों को मुक्त कराती है और अपनी टोपी में एक पंख खोंस लेती है। लेकिन यहाँ भी एक संकट है। एक बाल श्रमिक की मुक्ति, उसके पूरे परिवार की भूख से जुडी हुई है और बच्चे के परिवार का आर्थिक आधार छिन्न-भिन्न होने लगता है।
इसमें सबसे कारगर तरीका वही है जो बालश्रम कानून बनाते समय बहस में आते रहे। यानि काम के घंटे निर्धारित करना, बालश्रमिकों के लिये स्कूल में पढने की व्यवस्था सुनिश्चित करना तथा बीच में उन्हें पौष्टिक आहार देना।
बाल श्रमिकों के लिये स्कूल के नाम पर अनेक स्वयं सेवी संस्थाओं को अनुदान दिया गया ताकि पढने वाले बच्चों की पढाई, लिखाई ठीक तरह से हो सके। ये नितान्त अव्यावहारिक और फ्रॉड साबित हुए हैं। इस बारे में बीच का रास्ता ही कारगर है। बच्चों के काम के साथ उनके कार्यस्थल पर ही स्कूल की व्यवस्था कर उनके पढने का समय सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इसके अलावा कार्य स्थल पर ही उनके लिये पौष्टिक आहार की व्यवस्था की जानी चाहिए। यही बालश्रम को क्रमशः हटाये जाने की प्रक्रिया का व्यावहारिक पक्ष है। बाल श्रमिकों के लिये जो पिछले वर्षों से सामान्य स्कूल खोले गये वे इसीलिए सिर्फ कागजी होकर रह गये हैं।
ऐसे में बुद्धिजीवियों तथा समाज के संवेदनशील वर्ग से सिर्फ अपील ही की जा सकती है कि वे आगे आकर उन बच्चों की शिक्षा तथा काम के बीच सामंजस्य स्थापित करने हेतु आगे आयें और अपना योगदान दें। कहना न होगा कि स्वयं अपने घरों और पडोस के घरों में भी श्रमिक बच्चों के शोषण की घटनाएं न हों, इसके लिये भी सजग रहने की आवश्यकता है। बाल श्रम से मुक्ति का अर्थ बालश्रमिक की भुखमरी नहीं होनी चाहिये।
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इसी सन्दर्भ में अपने लिये न्याय मांग रही मुजफ्फरनगर की इमराना का प्रसंग फिर उठ खडा हुआ  है। यह केवल सामाजिक दबाव और स्वयं सेवी संस्थाओं की सक्रियता के कारण ही संभव हुआ कि उसके बलात्कारी ससुर को सेशन कोर्ट से दस साल की सजा हुई। लेकिन उसकी राह भी अभी आसान नहीं है। जीवन का संकट उसके सामने मुंहबाये खडा है। धार्मिक अदालत और फतवे उसे अभी भी जीने नहीं दे रहे हैं। फिर यहाँ दुहराना पडेगा  कि कोई धर्म अपनी औरतों का हमदर्द नहीं है। हर धर्म पुरूष सत्ता का ही समर्थन करता है धर्म पर आधारित सामाजिक नियमों और कानूनों का निर्माता और प्रवक्ता भी पुरूष समाज ही होता है। इमराना अभी भी भंवर में है। इन्हीं संवेदनहीन फतवों के कारण कारगिल युद्ध से जीवित लौटे पति आरिफ की गुहार पर गुडया के जीवन के साथ खिलवाड किया गया और उसे अपनी जान की कीमत देकर मुक्ति मिली। इमराना को एक बार फिर व्यापक समाज का समर्थन चाहिये, सहारा चाहिये ताकि उसको जीने की राह मिले।
इसके साथ ही धार्मिक अदालतों के औचित्य पर फिर से सवाल उठ खडा होता है। देश में दो कानून एक साथ कैसे चल सकते हैं। शाहबानों से लेकर इमराना तक ये हालिया प्रसंग इस संवेदनहीन धार्मिक व्यवस्था पर बहस की मांग करते हैं क्योंकि इस दुहरी व्यवस्था की शिकार अन्ततः औरतें ही होती हैं।
अधकचरे और अनपढ मौलवियों द्वारा दिये गये फतवों की नीयत का खुलासा हमारे टी.वी. चैनल पहले ही कर चुके हैं। सबसे अफसोसनाक बात यह है कि कोई औरत अपने मर्द के साथ रहे या न रहे, इसे  पूरा समाज बतायेगा, धार्मिक नेता बतायेंगे लेकिन उस गरीब औरत से कोई नहीं पूछेगा कि ऐ बन्दी, तू किसके साथ रहना चाहती है। यही गुडया के साथ हुआ और यही इमराना के साथ होने जा रहा है। हराम और हलाल की लडाई में औरत लगातार जबह हो रही है।
यही वे प्रसंग हैं जो नितान्त सामाजिक हैं लेकिन हमारे बुद्धिजीवियों की चिन्ताओं से शायद बहुत दूर हैं।

 

(नमिता सिंह)



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Comments to this Article

Name:  Anila Kumar 10/15/2007 9:21:40 AM
69.125.235.90
Comment: How could I read "Pravasi MahaVisheshank- 1" on web.
  

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