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’वर्तमान परिवेश में साहित्यकार की भूमिका‘ - हरीश बेताब
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’’आज रचना छोटी हो गई है और रचनाकार का दंभ बडा होता जा रहा है। साहित्य के माफियाओं को समाज की कम अपनी प्रतिष्ठा-सम्मान की चिन्ता ज्यादा है। लेकिन साहित्य फिर भी ंजंदा है। यह कोई बडी बात नहीं क्योंकि पुराने समय से ही साहित्य दो धाराओं में बंटा हुआ है, एक शासक वर्ग का साहित्य तो दूसरा जनता का साहित्य। कबीर और प्रेमचन्द की परंपरा का निर्वहन व विकास सच्चे साहित्यकार का धर्म है।‘‘ उक्त कथन राजकीय औद्योगिक व कृषि प्रदर्शनी में आयोजित साहित्योत्सव कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध समीक्षक व जनप्रिय पत्रिका वर्तमान-साहित्य के संपादक प्रो. के.पी. सिंह ने कही। वर्तमान साहित्य की संपादक एवं कहानीकार डॉ. नमिता सिंह ने कहा कि साहित्यकार को कथनी-करनी का फर्क मिटाकर जनता व समाज के बची सीधे विमर्श करना चाहिए। आधुनिक युग में हो रही वैज्ञानिक तकनीकी प्रगति का लाभ उठाकर साहित्यकार को सामाजिक-चेतना के विकास में योगदान देना चाहिए। वर्तमान परिदृश्य में साहित्यकार के दायित्व और अधिक बढ गये हैं। ’वर्तमान परिवेश में साहित्यकार की भूमिका‘ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में विषय प्रवर्तन करते हुए सुप्रसिद्ध गीतकार डॉ. नरेन्द्र तिवारी ने कहा कि साहित्यकारों को गंभीरता से दृष्टव्य करना होगा कि एकता का संकट और विघटनवाद की समस्या से केवल हमारा देश ही नहीं अपितु पूरा विश्व, सभी समाज जूझ रहे हैं। साहित्य जनजागरण का सर्वोत्तम साधन है। स्वतंत्रता की लडाई में जलसों जुलूसों से आगे कविता व गीत ही जन जागृति का हथियार था। सुप्रसिद्ध गजलगो सुरेश कुमार ने कहा कि साधनों से हीन होने के बावजूद बिना कोई समझौता किए साहित्य की मशाल को जलाए रखना ही साहित्यकार का लक्ष्य होना चाहिए। बाल साहित्य के लब्ध प्रतिष्ठित हस्ताक्षर प्रेम किशोर पटाखा ने कहा कि दुरुह-पुस्तक केन्दि्रत साहित्य धर्मिता व मंचीय छिछोरेपन से इतर भी समाज-निर्माण के साहित्य की रचना ही साहित्यकार का धर्म है। कवि रामगोपाल वार्ष्णेय ने कहा कि छल कपट के इस माहौल में साहित्यकार के सामने किंकर्तव्य विमूढता की जो स्थिति बन गई है उसे तोडना आवश्यक हो गया है। समाज के प्रतिनिधि के रूप में उपस्थित सासनी के विधायक देवकी नन्दन कोरी ने कहा कि साहित्यकार का स्थान राजनेताओं से बहुत ऊपर है। कार्यक्रम का संचालन कर रहे युवा रचनाधर्मी यशभान ने कहा कि अब वक्त आ गया है कि साहित्यकार सीधे समाज की बीच जाये और उनके सुखःदुख को बांटकर नई दिशा के विषय में सोचें। कार्यक्रम में संक्षिप्त काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें अनमोल, भारती, कृपाशंकर वार्ष्णेय, गिरजेश तोमर, मुर्शरफ हुसैन, महशर, रज्जाक, ललित सविता, छत्रपाल ताऊ, नूर साहब, बशीर अहमद, डॉ. अजीर्जुरहमान खान ’पुत्तन‘ आदि ने कविता पाठ किया। काव्य गोष्ठी का संचालन कवि हरीश बेताब ने किया।
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