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Vartmaan Sahitya ::April, 2007
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कृष्ण कुमार कृत ’’अनुभूतियाँ और विमर्श‘‘ का लोकार्पण - कृष्ण कुमार यादव
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कानपुर नगर मण्डल के वरिष्ठ डाक अधीक्षक एवं युवा रचनाकार कृष्ण कुमार यादव के द्वितीय निबन्ध संग्रह ’अनुभूतियाँ और विमर्श‘ का लोकार्पण प्रख्यात साहित्यकार पद्मश्री गिरिराज किशोर द्वारा उत्तर प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के पूर्व अध्यक्ष पं. बद्री नारायण तिवारी की अध्यक्षता में २३ जनवरी, ०७ को जिला परिषद हॉल, कानपुर में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम मे हुआ। कार्यक्रम का आरम्भ श्री प्रवीण वर्मा व डी.एन. सिंह ’अटल‘ द्वारा सरस्वती-वन्दना से हुआ। कार्यक्रम के आरम्भ में कृष्ण कुमार यादव ने श्री गिरिराज किशोर, पं. बद्री नारायण तिवारी, डॉ. ऊषा रत्नाकर शुक्ला, डॉ. एस.सी.शुक्ल, श्री श्याम लाल यादव, श्री एच.एस.यादव का माला पहनाकर व शाल ओढाकर स्वागत किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रख्यात साहित्यकार पद्मश्री गिरिराज किशोर ने ’अनुभूतियाँ और विमर्श‘ का लोकार्पण करते हुए कहा कि-’’हर रचनाकार विमर्श को जीता है, पर कृष्ण कुमार यादव ने अपनी अनुभूतियों को इस विमर्श से जोडकर एक नया अध्याय रचा है एवं आने वाले दिनों में साहित्यकाश के चमकते सितारे के रूप में वे रोशन होंगे।‘‘ गिरिराज किशोर ने कहा कि आज हर लेखक पुस्तक के माध्यम से सिर्फ अपने बारे में बताना चाहता है पर अनुभूतियाँ और विमर्श इनसे सर्वथा अलग है क्योंकि इसमें प्रेमचन्द, राहुल सांकृत्यायन, मनोहर श्याम जोशी और अमृता प्रीतम जैसे साहित्यकारों के बारे में भी लिखा गया है और इस प्रकार युवा पीढी को इनसे जोडने का प्रयास किया गया है।‘‘ कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे पं. बद्री नारायण तिवारी ने कृष्ण कुमार यादव की रचनावृत्ति को सराहा और इस बात की प्रशंसा की कि एक प्रशासक होने के साथ-साथ वे मानवीय संवेदनाओं से गहरे रूप से जुडे हुए हैं और इस निबन्ध-संग्रह के सभी लेखों में उक्त बात झलकती है। इस अवसर पर डॉ. एस.पी.शुक्ल, डॉ. उषा रत्नाकर शुक्ला व सर्वेश कुमार ’सुयश‘ ने अनुभूतियाँ और विमर्श की समीक्षा पढी। डॉ. एस.पी. शुक्ल ने कहा कि ’’कृष्ण कुमार यादव ने इस पुस्तक में साहित्य और साहित्यकार, व्यक्ति और समाज, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, वैश्विक चेतना तथा सांस्कृतिक अध्ययन के अनेक आधुनिक और उत्तर आधुनिक तत्वों को व्याख्यायित करने का प्रयास किया है।‘‘ वहीं डॉ. ऊषा रत्नाकर शुक्ला ने पुस्तक की समीक्षा करते हुए कहा है कि ’’कृष्ण कुमार यादव की यह पुस्तक पढकर जीवन्तता का एहसास होता है और ऐसा लगता है कि मानो सब कुछ पन्ने पर नहीं वरन् वास्तव में घटित हो रहा हो।‘‘ शोध पत्रकार सर्वेश कुमार ’सुयश‘ ने कहा कि ’’निबंध के स्वरूप विवेचन में ही नहीं बल्कि उनके सम्पादन में भी लेखक ने अपनी शोधपरक दृष्टि द्वारा विषय-वस्तु को ऐतिहासिक तारतम्य की चासनी के साथ परोस कर अपनी लेखनी के कौशल का परिचय दिया है, जो निश्चय ही पाठकों के लिए उपयोगी बन पडा है। यह संग्रह हिन्दी निबंध के जिस पूरे परिदृश्य का एहसास कराता है वह निबंध कला के भावी विकास का सूचक है। यह एक दस्तावेजी निबंध-संग्रह है, जो विचारों की धरोहर होने के कारण संग्रहणीय भी है।‘‘ कार्यक्रम में वरिष्ठ कवि डॉ. सुरेश अवस्थी, सुश्री आकांक्षा यादव, श्री श्याम लाल यादव, अपर जिला अधिकारी, श्री एच.एस. यादव, श्रमायुक्त कानपुर, वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सत्यकाम, डॉ. विजय प्रकाश त्रिपाठी, श्री एम.एस. यादव, सहित तमाम साहित्यकार, शिक्षाविद् व प्रशासक उपस्थित थे। कार्यक्रम के अन्त में लेखक कृष्ण कुमार यादव ने सभी को स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया। कार्यक्रम का संचालन कवि जवाहर सिंह ’जलज‘ ने किया।



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