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Vartmaan Sahitya ::April, 2007
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दुग्गल की आत्मकथा : पुस्तक का लोकार्पण - नुज्हत हसन, निदेशक
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कर्तार सिंह दुग्गल वह शख्स हैं कि जिनसे मिलकर जिंदगी से इश्क हो जाए,‘‘ पूर्व प्रधानमंत्री श्री इंद्र कुमार गुजराल के ये शब्द थे। वे नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया से प्रकाशित श्री दुग्गल की आत्मकथा-पुस्तक के अंग्रेजी संस्करण ’हूम टू टेल माई टेल‘ के लोकार्पण सह पुस्तक-चर्चा गोष्ठी में अध्यक्षीय संभाषण कर रहे थे। अपने संक्षिप्त उद्बोधन में उन्होंने ट्रस्ट के कामों की प्रशंसा भी की। विशिष्ट अतिथि श्री एल.एम.सिंघवी ने कार्लाइल को उद्धृत करते हुए कहा कि ’अच्छी जिंदगी जीना और अच्छी आत्मकथा लिखना दोनों ही मुश्किल है।‘ श्री सिंघवी ने कहा कि दुग्गल साहब दोनों ही मोर्चे पर सफल रहे। उन्होंने उन्हें ’हमारे समय का बडा साहित्यकार‘ निरूपति करते हुए कहा कि उनकी यह आत्मकथा एक तरह से जीवंत स्मरण है, एक खूबसूरत दस्तावेज; धर्मनिरपेक्षता की गवाही भी है यह आत्मकथा। यह आत्मकथा जिंदगी का अर्थ, उसके मायने खोलती है। श्री सिंघवी ने कहा कि इन्होंने वहां पर वृक्ष लगाए जहाँ कोई वृक्ष पैदा नहीं होता। पुस्तक पर चर्चा करते हुए विद्वान लेखक और साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष प्रो. गोपीचंद नारंग ने श्री दुग्गल की आत्मकथा को ’एक आर्टिस्ट का बयान‘ बताते हुए कहा कि महबूबा के खत में जैसी महक होती है वैसा ही इस किताब ये हर्फ-हर्फ में है। उन्होंने आप बीती लिखने को ’मुश्किल काम‘ बताते हुए कहा कि आत्मकथा लिखना अपने आपसे मुलाकात करने के बराबर है। पुस्तक में श्री दुग्गल द्वारा बंटवारे के पहले के पंजाब के मंजर की साफगोई के साथ चर्चा करने के साथ-साथ अपने जीवन के अंतरंग हिस्से का भी खुलासा करने की विशेषता को रेखांकित करते हुए श्री नारंग ने कहा कि यह किताब एक ’नॉवेल‘ की तरह चलती है। विदित हो कि श्री दुग्गल सत्तर के दशक में एनबीटी में निदेशक के रूप में थे। लोकार्पित आत्मकथा के उर्दू अनुवादक और उर्दू के वरिष्ठ साहित्यकार श्री रतन सिंह ने अनुवाद के राह में आने वाली कठिनाइयों पर बात की। उन्होंने कहा कि इस आत्मकथा में उपन्यास की खूबी इस तरह से आ गई है कि पता ही नहीं चलता। इन्होंने पुस्तक में आए इनके प्रेम प्रसंग को ’सूफियाना‘ बताते हुए उनके साथ बिताए अपने समय तथा उनके संबंध में कई संस्करण सुनाए। आत्मकथा के हिन्दी अनुवादक श्री फूल चंद मानव ने कहा कि अनुवादक जब अनुवाद कर रहा होता है तो वह पुनर्पाठ ही नहीं बल्कि पुनर्लेखन भी करता है। हिन्दी में ’किस पहि खोलऊं गंठडी‘ नाम से अनूदित आत्मकथा के अनुवादक ने इसे एक ’ईमानदार‘ और ’श्रेष्ठ‘ कृति बताते हुए कहा कि १६० अध्यायों में अपने संस्मरण को लेखक ने बडी खूबसूरती से पिरोया है। श्री मानव ने श्री दुग्गल को ’इतिहास पुरुष‘ की संज्ञा देते हुए कहा कि अपनी आत्मकथा में उन्होंने अपने बचपन, किशोरावस्था तथा यौवन से लेकर बंटबारा और प्यार तथा नफरत आदि सबको छुआ है। उन्होंने कहा कि दुग्गल साहब का ’कंफेशन‘ एक नया ’ट्रेंड‘ स्थापित करता है। पद्मभूषण से सम्मानित राज्यसभा के पूर्व सदस्य और आत्मकथा के लेखक श्री कर्तार ंसह दुग्गल ने अपने संबोधन में इस आम धारणा से अपनी असहमति जताई कि जब लेखक के पास कहने के लिए कुछ नहीं रहता है तो वह आत्मकथा लिखता है। ८४ वर्षीय उपन्यासकार, कथाकार, नाटककार और साहित्य की अनेक अन्य विधाओं में भरपूर लेखन करने वाले बुजुर्ग साहित्यकार श्री दुग्गल ने प्रख्यात पत्रकार लाला जगतनारायण, जिनकी आतंकवाद की दौर में हत्या कर दी थी, के साथ बिताए अपने दिनों को याद किया। उन्होंने कहा कि उनकी आत्मकथा की अगली कडी तैयार है। उसके बाद आत्मकथा का उपसंहार भी लिखने की उनकी योजना है। कार्यक्रम की शुरूआत में श्री दुग्गल की आत्मकथा का लोकार्पण श्री इंद्र कुमार गुजराल द्वारा किया गया। ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री विपिन चंद्र द्वारा आगंतुकों के स्वागत के बाद पुस्तक चर्चा की औपचारिक शुरूआत हुई। इस चर्चा का संचालन प्रो. गोपीचंद नारंग ने किया। कार्यक्रम के अंत में ट्रस्ट के मुख्य संपादक श्री बलदेव सिंह बद्दन ने आगंतुकों का धन्यवाद ज्ञापन किया। उन्होंने अपने संक्षिप्त उद्बोधन में लोकार्पित आत्मकथा-पुस्तक के प्रकाशन की स्थितियों और कठिनाइयों का जिक्र करते हुए श्री दुग्गल की लेखनी की प्रशंसा की। कार्यक्रम में बडी संख्या में लेखक, पत्रकार, बुद्धिजीवी तथा साहित्यप्रेमी उपस्थित थे।



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