KhbarExpresswww.khabarexpress.com

Free online form to add company in Raj2b.com - Business Directory of India

Welcome Guest Sign In New user! Sign Up Now
Search Photo  
RSS Wednesday, February 15, 2012



Vartmaan Sahitya ::April, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner

कहानी में स्त्राी : प्रेम के संदर्भ और मुक्ति के प्रश्न - डॉ. नीरज खरे
More Articles

आजकल हिन्दी कहानी में लम्बी कहानियाँ लिखने का चलन बढ गया है। ऐसी कहानियों ने कहानी के संक्षिप्त कलेवर को धता बताकर उपन्यासों से होड कर ली है। इधर छप रहे कहानियों के संकलन लंबी-लंबी कहानियों से अटे होते हैं। अमूमन हर साहित्यिक पत्रिाका में लंबी कहानियाँ छप रही हैं। यही नहीं एक-एक लंबी कहानी भी अब पुस्तक के रूप में छपने लगी हैं। यहाँ हमारा आशय लंबी कहानियों की आलोचना करने का नहीं है। पर आज की ऐसी कहानियों असाधारण विस्तार को लेकर ही कहानी के विधागत स्वरूप पर भी सवाल उठने लगे हैं। ऐसे समय में युवा कथाकार पराग कुमार मांदले का पहला कहानी-संग्रह, ’राजा, कोयल और तन्दूर‘ का आना एक आश्वस्ति है कि जैसे यह कहानी के लघु कलेवर की वापिसी का संकेत लेकर आया हो। सामान्यतः कहानी-संग्रहों के आकार से भी छोटे नौ कहानियों के इस संग्रह का आकार-प्रकार स्वयं इस बात का प्रमाण है। अपनी रचना-प्रक्रिया के जरिए ये कहानियाँ अनायास ही इसलिए आकर्षित करती हैं कि यहाँ कहानी के विवरणात्मक गद्य के विरुद्ध कविता के सधे हुए शिल्प का सहारा लिया गया है। इसीलिए इन कहानियों की विशेषता है-लघुता का खिंचा हुआ वितान और काव्यात्मक गद्य पढने का उपलब्ध सुख। हम इन कहानियों को पढते हुए अपने निर्मम समय और बाजारवादी संस्कृति के आवेगों की आमानवीयता भूलकर मानवीय संबंधों के ऊष्म और तरल आवेगों में खो जाते हैं। वैसे भी इस संग्रह की धुरी संसार की अनुपम अनुभूति ’प्रेम‘ है। इसके दो ध्रुव, स्त्राी और पुरुष-दोनों प्रेम के अभिलाषी हैं। लेकिन जीवन की वास्तविकताओं में बंधनों से घिरती है-स्त्राी। इसलिए स्त्राी की आकांक्षा है-बंधनों से मुक्ति। मांदले की इन कहानियों के केन्द्र में यही स्त्राी है। ये कहानियाँ प्रेम और मुक्ति के द्वन्द्व में खडी स्त्राी के इर्द-गिर्द ही घूमती हैं। तीन-चार कहानियाँ अवश्य इतर संदर्भों की हैं गो कि वे इस संग्रह की महत्वपूर्ण कहानियाँ भी नहीं हैं। वे अगर न होती तो इसे प्रेम कहानियों का संग्रह कहने में अधिक सुविधा होती। पर संख्या में अधिक जो स्त्राी और प्रेम संबंधित कहानियाँ हैं उनसे इस सिलसिले में छेडी गयी बहस के रूप में तो इस संकलन को अवश्य देखा जा सकता है। यहाँ प्रेम के बहाने स्त्राी-पुरुष संबंधों के बीच बंधन और मुक्ति के प्रश्नों को भिन्न-भिन्न कोणों से देखा गया है। आज वैश्वीकरण के बाजारवादी दौर में स्त्राी-पुरुष संबंधों के समीकरण बदल रहे हैं। मांदले अपनी कहानियों में इन्हें रोचक सजगता से उठाते तो हैं लेकिन उनकी ठीक-ठीक पडताल करते नहीं दिखते। इसके बावजूद तीन कहानियाँ ’मृगनयनी‘ ’बोध‘, और ’राजा, कोयल और तंदूर‘ इस संग्रह की उपलब्धियाँ हैं। ’मृगनयनी‘ में ’प्रेम‘ बंधन और मुक्ति के प्रश्नों के बीच घिरा है। कहानी में मिथक और स्वप्न है। कथा में फैंटेसी का कुशल प्रयोग है-मृगनयनी की प्रेम पाने की यात्राा। उसे सीमाएँ और बंधन पसंद नहीं है उसे आकाश जैसी मुक्ति पसंद है। कहानी में उठाए प्रश्न, निगूढ प्रश्न ही बनकर रह गये हैं। कहानी का अंत इस प्रकार होता है-’’उसे सीमा पसंद नहीं थी। उसे बंधन पसंद नहीं थे। उसे प्रेम पसंद था। मगर प्रेम की भला कोई सीमा होती है?‘‘ (पृ. २३) ’बोध‘ इससे अधिक परिपक्व रचना है-शिल्प-कौशल में भी और प्रेम की गहन भावात्मक अनुभूति की दृष्टि से भी। यहाँ प्रेम की जमीनी सच्चाई पहचानने की कोशिश है। सहज हुए परिचय को नायक-नायिका प्रेम समझने लगते हैं। जब वे इस प्रेम को जीवन के यथार्थ प्रश्नों के साथ देखते हैं तो उन्हें महज आकर्षण ही लगता है-वे दोनों इस बोध से एक-दूसरे को मुक्त कर देते हैं। नायक एक जगह कहता है-’’कुछ पलों और सारे जीवन में बहुत अंतर होता है। कुछ पलों के सत्य को हम सारे जीवन पर लागू नहीं कर सकते है। लागू करने की कोशिश करेंगे तो मुँह की खाएँगे।‘‘ (पृ. ३८) जीवन की वास्तविकताएँ भिन्न प्रकार की और जटिल हैं। प्रेम के रोमानी क्षणों से उनका समाधान नहीं निकलता। प्रेम करना ओर जीवन जीना दो भिन्न पहलू हैं। उनके बीच उपजा प्रेम, क्षणिक आया समुद्री ज्वार है, जो थम जाएगा। प्रेम का रोमानी दैहिक क्षण कहानी में आया है-मांदले उसकी अभिव्यक्ति में पूरा सँयम बरतते हैं इसीलिए वह मार्मिक-दार्शनिक उक्ति की तरह ही उल्लेखनीय भी है-’’कोई पत्थर चाहे जितनी ताकत से ऊपर उछाला जाए, एक सीमा तक ऊपर की यात्राा करने के बाद वह फिर नीचे ही गिरता है। हर उत्तेजना से, जो कि एक बिन्दु तक व्यक्ति को बहुत प्रिय होती है, व्यक्ति को वितृष्णा होने लगती है।‘‘ (पृ. ३९-४०) इस क्षण उपजे वैराग्य का मूल्यांकन भी यहाँ है। कहानीकार की टिप्पणी है-’’लेकिन स्खलन से उत्पन्न वैराग्य भाव टिकाऊ नहीं होता। वह एक और उत्तेजना के लिए शक्ति एकत्रिात करने की तैयारी भर होता है।‘‘ (पृ. ४०) लोक-कथा-शैली का प्रयोग हिन्दी कहानियों में होता रहा है। मांदले ने इस तकनीक का काव्यात्मक प्रयोग संग्रह की सर्वाधिक ध्यान आकर्षित करने वाली कहानी ’राजा, कोयला और तंदूर‘ में किया है। यह लोक-कथा की पारम्परिक शैली में व्यक्त है, लेकिन अव्यक्त यथार्थ पर सीधे निशाना करती है। इसका यह अद्भुत शिल्प है। कहानी के गद्य में यह अन्योक्ति है-नैना साहनी प्रकरण के प्रेम समीकरण की आमानवीय परिणति को लक्ष्य करती हुई। कहानीकार के कथा-कौशल की सम्भावनाएँ भी यहाँ स्पष्ट हुई हैं। कहानीकार की भाषायी काव्यात्मक अभिरुचि का बोध इस कहानी में अधिक उभर कर आया है। आजकल कहानी में भाषा के प्रति सचेत होने की कमी दिखाई पडती है। यह अच्छा है कि मांदले इस ओर सतर्क हैं। शब्दों के किफायती और यह कविता का शिल्प जो उन्होंने इन कहानियों में अपनाया है, यही उनका वैशिष्ट्य है। कहीं-कहीं तो वस्तु की अपरिपक्वता भी इसके आवरण में ढक जाती है। मसलन ’नीरजा‘ और ’अपेक्षा‘ कहानियाँ। ’नीरजा‘ का सन्दर्भ भी स्त्राी स्वातंत्र्य है-इस कहानी की स्त्राी नीरता के इतिवृत्त में नदी का रूपक मिश्रित है। नीरजा को रूढवादी बंधनों से मुक्ति पसंद है और इसी के लिए छटपटाहट है। इसके लिए वह पहले पिता और बाद में पति बन चुके प्रेमी से संबंध तोडती है। उसे नदी की तरह बहना है-किसी भी अवरोध में भी, नई राह बनाकर। नदी और नीरजा का बचपन से गहरा मित्रावत् संबंध है। स्त्राी और नदी, प्रकति के दो जीवनदायी पहलू हैं। नीरजा के बहाने यहाँ एक आख्यान को आवृत्त किया है। जब आज के बाजारवादी मूल्यों से प्रेम और मानवीय संबंध तहस-नहस हो रहे हैं और जटिल सामाजिक संरचना के बीच खडी स्त्राी की मुक्ति के प्रश्न क्या नीरजा की ही तरह सरल रेखीय हो सकते हैं? प्रेम और मुक्ति का अधूरा सा आख्यान ’अपेक्षा‘ कहानी में भी है। प्रेम पाने की अभिलाषा एक स्त्राी यहाँ मनीषा के रूप में है। पिता द्वारा सौंपे तथा पति और ससुराल की छाया तले जीवन जीने को विवश एक स्त्राी। उसे दैहिक प्रेम नहीं, आत्मीय प्रेम चाहिए। नैरेटर के दो प्रेम भरे शब्द उसे अभिभूत कर देते हैं और उसकी अपेक्षा पूरी हो जाती है। ’चलो मुनिया‘ नामक कहानी की नायिका अपने प्रेमी नरेश को विवाह के पूर्व एक अनायास हुई घटना के दरम्यान परख लेती है और उससे संबंध तोडने का निर्णय ले लेती है। यह एक अल्पप्रभावी कहानी है। इस संग्रह को पढते हुए, जिन कहानियों ने कुछ निराश किया, उनके लिए भी कहानीकार से उन संभावनाओं की अपेक्षा थी, जिससे होकर उन्होंने वे तीन महत्वपूर्ण कहानियाँ लिखी हैं, जिनकी चर्चा पहले की ही गयी है। वरिष्ठ कथाकार चित्राा मुद्गल ने भी ऐसा ही संकेत फ्लैप पर किया है। पहले ही कहा जा चुका है कि इस संग्रह की पहचान उन प्रेम आधारित कहानियों से ही बनती है। उनमें मुक्ति की आकांक्षी स्त्राी की विभिन्न छवियाँ भी हैं। अगर मांदले कहानी के अपने रचना-लोक से बाहर आकर, जरा दर ठहर कर संबंधों की वास्तविकताओं से रू-ब-रू होने की जगह खोजते, तो शायद स्त्राी के प्रेम और मुक्ति के विमर्श की इन कहानियों को ठीक मुकाम तक पहुँचा पाते। जहाँ इस बात का ध्यान रखा गया है, वहाँ कहानीकार सुस्त भी हुआ है। वस्तुतः उन्हें कहानी के प्रभाव और रचनात्मक गद्य के प्रति फिक्र अधिक है। इसके लिए फिक्रमंद होना भी चाहिए लेकिन कहीं-कहीं इस हेतु अपनायी परिकलिपत राह चलकर कहानी अपना ठीक-ठीक मुकाम तय करते-करते रह जाती है। पर यह कहने में गुरेज नहीं कि इन कहानियों की छवि संभावनाशील कहानीकार के रूप में उभरी है। साथ ही, यह उम्मीद भी बंधती है कि वे भविष्य में कहानी विधा के साथ अपने रचनात्मक सरोकार अवश्य प्रगाढ करेंगे।



Discuss this topic on KhabarExpress Forum 

Post Your Comments to this Article Posting Rules
Name*:
Comment*:
 


October, 2006 <br> Sponsered by : Decor Home, BikanerOctober, 2006
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
January, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerJanuary, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
February, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerFebruary, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
March, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerMarch, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
April, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerApril, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
May, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerMay, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
June, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerJune, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 

All right reserved by Khabarexpress.com
Contact Us | Archives | Sitemap | Can't see Hindi ? | News Ticker
Special Edition: Lakshchandi Mahayagya, Camel Festival 2007, Vartmaan Sahitya, Nagar Ek - Nazaare Anek, Bikaner Udyog Craft Mela
Our Network rajb2b.com | khabarexpress.com | uniqueidea.net | PelagianDictionary.com | hindinotes.com
Developed & Designed by Pelagian Softwares