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Vartmaan Sahitya ::April, 2007
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संतप्त : यातना और संघर्ष की एक और आपबीती - वेद प्रकाश अमिताभ
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डॉ. काशीनाथ सिंह का यह कथन सही है कि सूरजपाल चौहान की दोनों आत्मकथाएं (’तिरस्कृत‘ और ’संतप्त‘) जुडवाँ हैं, अतः तिरस्कार की पीडा महसूसनी हो तो ’संतप्त‘ पढए और उसकी वजहें जाननी हों तो ’तिरस्कृत‘ पढये। दोनों आत्मकथाओं में बचपन के अभाव, माता-पिता को अपमानित होते देखने की तकलीफ, शिक्षा-प्राप्ति में कठिनाइयां, कदम-कदम पर जाति-व्यवस्था की निचली सीढी पर होने का त्राासद अहसास, नौकरी मिलने पर जाति की बैसाखी के सहारे का आरोप आदि वे सभी जाने-पहचाने संदर्भ हैं जो प्रायः सभी दलित लेखकों की आत्मकथाओं में कमाये हुए सत्य और भोगे हुए यथार्थ के रूप में केन्द्रस्थ हैं। हिन्दू समाज की संकीर्णता और सवर्ण हिन्दी लेखकों की मानसिकता पर कठोर टिप्पणियां भी इनमें यथास्थान हैं। दलित पीडा के दंश के अंतर्गत कहा गया हैः हिन्दुओं की संकीर्ण मानसिकता के विषय में जितना लिखा जाए उतना ही कम है। चाहे धार्मिक क्षेत्रा हो, सामाजिक, आर्थिक या साहित्यिक, हरेक क्षेत्रा में उनकी संकीर्ण मानसिकता प्रकट हो ही जाती है।’ इसी तरह गैर दलित लेखकों पर यह टिप्पणी भी गौरतलब है’ कभी गैरदलित लेखकों ने अपने गिरेबान में झांक कर देखा है कि आज तक इन्होंने ऐसी रचना का सृजन किया हो, जिसे दलित समाज ने स्वीकार किया हो और उसे सहर्ष अपना माना हो।‘ लेकिन ’संतप्त‘ की विशेषता है कि इसमें केवल सवर्णवाद और ब्राह्मणवाद पर ही प्रहार नहीं हुआ है, बल्कि दलितों में पनपती उच्चावचता या पहले से ही मौजूद भेदभाव को भी सूरजपाल चौहान ने अनदेखा नहीं किया है। इसके ’यह गाँव है‘ शीर्षक खंड में दिखाया गया है कि भंगी तो दलितों में भी दलित हैं। गाँव के चमार, भंगियों को हरिजन कह कर पुकारते हैं, उन्हें अम्बेडकर जयंती पर बाबा साहब की मूर्ति पर फूल नहीं चढाने देते हैं। दलित समाज के कई कथित सुधारक भी कहते रहे हैं-’सारी दुनिया सुधर जायेगी, लेकिन ये भंगी नहीं सुधरने वाले।‘ लेखक ने दलित लेखकों में व्याप्त ऊँचनीच की भावना पर ’तस्वीर का दूसरा रूप‘ में कुछ सवाल उठाये हैं। उसे आश्चर्य होता है कि हिन्दी के कई दलित लेखक दिन-रात छुआछूत और ऊँचनीच के विरोध में लिखते-बोलते हैं लेकिन वे स्वयं आकंठ जातिवाद में सराबोर हैं। एक अध्याय में डा. तेजसिंह, डॉ. श्योराज बेचैन, ओमप्रकाश वाल्मीकि आदि के दोहरेपन, दोहमुंहेपन को अनावृत किया गया है। विशेषतः श्री वाल्मीकि की धनलिप्सा और अहं भावना बहुत निराश करती हैं। वरिष्ठ दलित साहित्यकार‘ कहे जाने की सनक रखने वाले मोहनदास नैमिशराय के अन्तर्विरोध भी लेखक के निशाने पर हैं। इन सभी प्रसंगों में लेखक की निर्भीकता और वस्तुनिष्ठता ’आत्मकथा‘ के लिए वांछित ईमानदारी से समर्थित हैं। ’संतप्त‘ की चर्चा श्री चौहान की पत्नी विमला के साथ चौहान के भतीजे जय के अनैतिक-अस्वाभाविक देह संबंध के विस्तृत बयान को लेकर ज्यादा हो रही है। विडम्बना यह है कि जय, ’श्री चौहान का दत्तक पुत्रा भी है। कानूनी बेटा बनकर वह भी चौहान के घर में रहने का अधिकार और माँ की हैसियत की नारी को भोगने का अवसर पा लेता है। लेखक सब कुछ देख कर भी इस व्यभिचार-प्रसंग पर काबू नहंी पाता। उसका बेटा भी उसके हाथ से निकल जाता है, उसका साथ केवल उसकी बिटिया मधुर देती है। ’भूमिका‘ में काशीनाथ सिंह की इस टिप्पणी से सहमत हुआ जा सकता है-’जिस ईमानदारी से सूरजपाल ने इस पूरे घटनाक्रम का वर्णन किया है, उस पर निछावर तो हुआ जा सकता है, हमदर्दी नही जताई जा सकती है। एक व्यवस्था-विरोधी लेखक को घर में भी विरोध की आवाज उठानी चाहिए थी। इस पूरे प्रसंग में विमला के व्यभिचारिणी होने के कारण स्पष्ट नहीं है। उसके पक्ष या मानसिकता को जानने का कोई उपाय नहीं है, इसलिए उसके पतन को एक अपवाद के रूप में लेना होगा। इस सुखद प्रसंग का अंत लेखक ने इस सूचना के साथ किया है कि अब मुझे नहीं पता कि विमला और भानु कहाँ हैं, हाँ, जयप्रकाश अपनी पत्नी पूनम के साथ सुखी जीवन बिता रहा है। आखिरकार, इस प्रसंग में भी दुख भोगना नारी के हिस्से में ही आया, पुरुष तो पल्ला झाडकर अलग चैन की वंशी बजाने लगा। इस आत्मकथा में ’मुलाकात एक जुलाहे से में‘ डॉ. धर्मवीर की भूरि-भूरि प्रशंसा हुई है, उनके कथित मानववाद में डॉ. अम्बेडकर, रैदास, माक्र्स सबके चिंतन को संश्लिस्ट बताया गया है। उनके सीधे ’ब्राह्मण‘ पर प्रहार करने को भी चौहान बहुत मूल्यवान मानते हैं। ’दलित‘ को हरिजन कहे जाने का जातिसूचक वाक्यों के प्रयोग से उन्हें पीडा होती है, लेकिन ’ब्राह्मण‘ जैसे जातिवादी संबोधन से वे आश्वस्त और प्रसन्न होते हैं। ’वर्ग चेतना‘ की जगह ’वर्णचेतना‘, ’प्रतिरोध‘ की जगह ’प्रतिक्रिया‘ से इसी तरह को अंतर्विरोध सामने आते हैं। ’आत्मकथा‘ के समापन-चरण में सूरजपाल चौहान इस ’मिथ‘ को तोडते हैं कि पाकिस्तान में जातिवाद और छूआछूत की समस्या नहीं है। वे एक अफसानानिगार की कहानी ’चूहडा‘ और इंतजार हुसैन से बातचीत के हवाले से बताता है कि वहाँ छुआछूत को लेकर भारत से भी बुरा हाल है। ’संतप्त‘ में अप्राकृतिक-अस्वाभाविक यौन संदर्भों के विवरण जहाँ-तहाँ है। सूरज रूसी मेम, संतो ताई, मुंशी मामा, मिसेज शर्मा के पतन का खुद गवाह है। लैम्बर्ड साहब की यौन-क्षुधा का पता उसे पिता और मामा की बातचीत से चलता है लेकिन ये भी प्रसंग वैयक्तिक विकृति के रूप में ही उभरे हैं, दलितों की संघर्ष-यात्राा से इनका सीधा जुडाव नहीं है।‘ सूरजपाल चौहान की यह कृति उनकी आपबीती के साथ जगबीती भी है। शायद ’आपबीती‘ अधिक है, जगबीती का प्रतिशत इसमें कम है। आशा कर सकते हैं कि ’आत्मकथा‘ के अगले खंड में श्री चौहान, समाज और साहित्य से जुडे कुछ अन्य अनछुए मुद्दों और सरोकारों को इसी साहस, पठनीयता और विश्वसनीयता के साथ लिपिबद्ध करने के लिए कृतसंकल्प रहेंगे। नफरत को प्यार से जीतने में उनका विश्वास बना रहेगा।



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Comments to this Article

Name:  Dr. S.Gangrade 7/20/2009 7:33:20 PM
117.196.179.7
Comment: surajpal chouhan kahan se prakashit hue hai.
  

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