www.khabarexpress.com : The news portal of North India
www.khabarexpress.com
Bikaner University Exam Results: M.Sc. (F) Zoology | M.A. (F) Philosophy | M.Sc. (P) Physics (new) | M.Sc. (F) Geography (new) | M.Sc. (P) Geography (new) | M.A. (P) History (new) | M.Com. (P) ABST |
Get Result Alert on your mobile, SMS JOIN khabarexpress to 567678.
Education Special

Education Directory
Exam Results
Who is Who

Article
Tutorial
Information
Quote

Can't see Hindi ?
Welcome Guest Sign In  New user! Sign Up Now | My Favourites (new)
Search Photo  
RSS Feed
09 July 2008
Forum | Wallpapers | Photo Gallery | Business | Entertainment | Education | Sports | Article | City |
Free News on your website
  सम्पादकीय
  बांसवाडा समाचार
  बीकानेर समाचार
  डूंगरपुर समाचार
  हनुमानगढ समाचार
  अर्न्तराष्ट्रीय समाचार
  जयपुर समाचार
  मेड़ता समाचार
  मुम्बई समाचार
  राष्ट्रीय समाचार
  प्रादेशिक समाचार
  श्रीगंगानगर समाचार
  सूरतगढ समाचार
  फोटो दीर्घा
  संग्रहण (new)
--------------------------
 
पुस्तक समीक्षा
 
वर्तमान मुद्दे
 
आर्थिक
 
सम्पादकीय
 
शिक्षा
 
परीक्षा परिणाम
 
प्रदर्शनी
 
खाना खजाना
 
हिन्दुओ के व्रत व त्यौहार
 
इतिहास
 
त्चरित टिप्पणी
 
प्रेरक प्रसंग
 
बातचीत
 
पत्रकारिता
 
व्यक्तित्व
 
दर्शन
 
राजनीति
 
धार्मिक
 
स्मरणांजलि
 
लघु कथाऐं
 
खेलकूद
 
पर्यटन
 
आने वाली फिल्म
--------------------------
  वर्तमान साहित्य
--------------------------
  मतदान
  कार्टून
  फोरम
  ई पत्र
  एस म एस
  वॉलपेपर
  स्क्रीनसेवर
--------------------------
  वर्घीकृत विज्ञापन
  Advertising With Us
  Online Advertising
  व्यापार निर्देशिका
  Rajasthan Webs
  Softwares
 
Hosting Package
  Web Design
 Vartmaan Sahitya :: April, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner

विजय की प्रतीक्षा : वर्तमान एवं भविष्य के प्रति सचेत करती कविताएँ
देवेन्द्र गुप्ता

Add comment    Mail this Story     Write to Editor
More Articles

नाटक साहित्य की सर्वाधिक प्राचीन विधा है, इसने लगभग ढाई हजार वर्ष की यात्राा सफलतापूर्वक पूरी की है। इसके मूल में इसकी गहरी सामाजिकता है। नाटक की लोकप्रियता का अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसने हर काल के बडे से बडे रचनाकार को अपनी ओर आकर्षित किया है। इसके सबसे बडे उदाहरण प्रेमचन्द हैं जिन्होंने तीन नाटकों-’कर्बला‘, ’संग्राम‘ और ’प्रेम की वेदी‘ की रचना की। लोक से गहरी संपृक्तता का ही परिणाम है कि हर भाषा में नाटक की रचना हुई है। बांग्ला के चर्चित रचनाकार एवं लोकप्रिय राजनेता बुद्धदेव भट्टाचार्य का पाँच नाटकों का संग्रह ’विजय की प्रतीक्षा‘ हिन्दी पाठकों को नाट्य-साहित्य के जनवादी तेवर से परिचित कराता है। इस ’संग्रह‘ में ’आजादी के बाद‘, ’इतिहास का फैसला‘, ’राजधर्म‘, ’एक इन्सान की मौत‘ और ’विजय की प्रतीक्षा‘ नाटक संकलित हैं जिनके माध्यम से बांग्ला साहित्य की जीवन्तता की तस्वीर उभर कर सामने आयी है। ’आजादी के बाद‘ नाटक इस संग्रह का कलेवर की दृष्टि से सबसे बडा नाटक है। इस नाटक मे।तीन पीढयाँ हैं। एक वह पीढी है, जिसने स्वतंत्राता के लिए संघर्ष किया; दूसरी, जिसने स्वतंत्राता को भोगा एवं तीसरी, जो इक्कीसवीं सदी की चकाचौंध में नैतिक मूल्यों से रहित है। देश की आजादी के लिए जीवन बाबू एवं अक्षय जैसे स्वतंत्राता सेनानियों ने अनेक यातनाओं को सहते हुए संघर्ष किया, स्वतन्त्राता के पश्चात् भी अपने सामाजिक दायित्वों के प्रति वे सजग हैं; वही सोमनाथ एवं सर्वानी जैसे प्रौढ जिन्होंने स्वतन्त्राता के सुख को भोगा है-व्यक्तिगत हित-साधना में लिप्त हैं, स्वार्थसिद्धि ही उनके लिए सब कुछ है। अलक जैसे किशोर का चरित्रा आने वाली भयावहता की ओर संकेत करता है कि नैतिक मूल्यों का ह्रास होकर उच्छृंखलता का विस्तार हो रहा है। नाटक में जहाँ आजादी से पूर्व देश की दयनीय स्थिति को रेखांकित किया गया है, वहीं नाटककार वर्तमान परिवेश को देखकर विचलित हो उठता है-’’हमने सपने देखे थे-इच्छा-आकांक्षा थी-कोई तो सोच नहीं पाया कि रोटी और कपडे नहीं मिलेंगे-इलाज और दवा के बिना लोग मरेंगे। गरीब बच्चे स्कूल नहीं जाएँगे? किसने सोचा था कि मंदिर-मस्जिद को लेकर लडाई होगी-आग लगेगी-खून बहेगा-घर जलेंगे।‘‘ आजादी के बाद बढती विषमता इस तस्वीर को और भयावह बना देती है-‘‘पचास वर्ष बीत गए हैं-लम्बा समय-कुछ लोगों को रुपये का दंभ है-पैसा है-उल्लास है-दूसरी ओर देह पर कपडे नहीं हैं, खाली पेट घूम रहे ह-आजाद देश आज पराधीन है-पहाड जैसी समस्या है। समस्या परत-दर-परत जमती जा रही है।‘‘ ’इतिहास का फैसला‘ नाटक दर्शाता है कि हिटलर का नाजीवाद पुनः उभर रहा है। फासीवादी ताकतें समूची मानवता के लिए खतरा बनी हुई है। नाटककार ने जर्मनी के माध्यम से इस भयावहता का चित्रा खींचा है, वास्तव में यह चुनौती किसी एक देश के लिए नहंी है, बल्कि पूरी दुनिया में यह खतरा मंडरा रहा है। सत्ता प्रेमी ताकतें अपने तात्कालिक हितों के लिए इन फासीवादी शक्तियों से समझौता कर इन्हें मजबूत बना रही हैं। मानवता की ठेकेदारी करने वाले अमेरिका जैसे साम्राज्यवादी देश इनके साथ सहयोग कर रहे हैं। नाटक में बहुत सटीक टिप्पणी की गई है-’’अमेरिका पर निर्भर रहना विपत्तिजनक है।‘‘ नाटक में सोवियत संघ के विघटन के कारणों की ओर भी संकेत है। स्वार्थी प्रवृत्ति ने दुनिया को असंतुलित कर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप, विषमता की खाई ’दिन दूनी रात चौगुनी‘ होती जा रही है-’’यूरोप, अमेरिका को जो मिलता है-अफ्रीका, एशिया और दक्षिण अमेरिका को वह नहीं मिलता है। हम इन नीतियों के जरिये इस दुनिया की रक्षा नहीं कर सकते हैं। कोई खाते-खाते मरता है, किसी को खाना नहीं मिलता है। यही नीति बन गई है। पृथ्वी का संतुलन नष्ट हो चुका है।‘‘ नाटककार की मानवीय संवेदना और गहरे सामाजिक सरोकारों का ही परिणाम है कि नाटक का एक पात्रा कह उठता है-’’हमने कभी राजनीति नहीं की है। पढे हैं और पढाए हैं। लेकिन अब महसूस होता है कि मानवता के लिए संस्था बनाना जरूरी है। यह बहुत जरूरी है। वैज्ञानिक रहस्यों को उजागर कर रहे हैं और उधर लोगों के दुःख दर्द बढते जा रहे हैं। एक बीमार सभ्यता में हम जी रहे हैं। ध्वंस हो रहा है। ड्रग, एड्स, इलेक्ट्रानिक मीडिया हमें मनुष्य की श्रेणी से नीचे उतार रहे हैं। हम इसका समाधान नहीं कर पा रहे हैं। दरिद्रता को हम फैला रहे हैं।‘‘ ’राजधर्म‘ नाटक में साम्राज्यवादी शक्तियों के विरुद्ध जनसामान्य के संघर्ष की गाथा है। नाटक ब्रिटिशकालीन वातावरण की पृष्ठभूमि लिए हुए है। ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा भारतीय जनता का अमानवीयता की हद तक शोषण किया जाता था। कम्पनी के शासनकाल में मालगुजारी बढाकर तथा अकाल की स्थिति उत्पन्न करके, भारतीय उद्योग धन्धों को नष्ट करके भुखमरी की सी स्थिति पैदा कर दी गई थी। ब्रिटिश सत्ता के इस शोषण के विरुद्ध लोगों ने आवाज बुलन्द की। किसान-मजदूर, हिन्दू-मुसलमान-सभी ने मिलकर संघर्ष किया। इसमें अंग्रेजों द्वारा जन-आन्दोलनों के नृशंसतापूर्वक दमन की करुण तस्वीर है। इनके द्वारा गाँव जला दिए गये और लोगों को फाँसी पर लटका दिया गया। बिडम्बना यह है कि साम्राज्यवादी शक्तियाँ अमानवीयता का यह तांडव सभ्यता और शिष्ट समाज की संरचना के नाम पर करती हैं। अपने आपको शिष्ट कहने वाली अंग्रेज कम्पनी सरकार का मनुष्य विरोधी कृत्य ही राजधर्म था? इस पर नाटककार ने बडा तीखा प्रहार किया है-’’इस देश के सभी लोग शैतान हैं। करोड-करोड लोग शैतान हैं और तुम भगवान हो। यही तुम्हारा राजधर्म है। तुम हमें स्वर्ग ले जाओगे। तुम्हारे स्वर्ग हम नहीं जाएँगे।‘‘ मनुष्य-चरित्रा के पतन की गाथा प्रस्तुत करता नाटक है-’एक इन्सान की मौत।‘ तापस जैसा आदर्शवादी चरित्रा इस पूंजीवादी-सुविधाभोगी संस्कृति का शिकार होकर नैतिक पतन को प्राप्त हो जाता है। नाटक के दूसरे दृश्य में पजीपतियों द्वारा कर्मचारियों के हितों के विरुद्ध किए जा रहे षडयन्त्राों का संकेत है। नाटक में रचनाकार ने नौकरी के लिए किये जाने वाले भाई-भतीजावाद का भी पर्दाफाश किया है। इस पजीवादी-व्यवस्था को आदर्श चरित्राों से परहेज है। इसकी नजर में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है-रुपया। इस व्यवस्था का शिकार हो चुका तापस कहता है-’’मनुष्य की तरह जीने के लिए रुपया चाहिए, रुपया। किसको कितने रुपये की जरूरत है, ले जाओ।..... मेरे पास रुपया चाहिए, रुपया। सभी बदमाशों को अपने घर का नौकर बना लूँगा, सभी को। जिसने मुझे अपमानित किया है। बेच सकता हूँ। सबको चिडयाखाने में बंद कर दूंगा।‘‘ रुपये के दंभ में इस वर्ग के पास सामाजिक सम्बन्धों और नैतिक मूल्यों के लिए कोई स्थान नहीं है। यह रुपये के दम पर सबको नचाने में विश्वास रखता ह। इस संग्रह का अंतिम नाटक ’विजय की प्रतीक्षा‘ पूँजीपतियों द्वारा मजदूरों एवं कामकाजी वर्ग के शोषण की दास्तान है। यह एक ओर पूँजीपतियों के चरित्रा का उद्घाटन करता है कि पूंजीपति अपने लाभ के लिए मानवता के विरुद्ध काम करता है। मानव जीवन से सीधी जुडी दवा जैसी वस्तु में मिलावट करता है। उसके लिए मनुष्य के जीवन की कोई कीमत नहीं है, दूसरी ओर, नाटक में इस कटु सत्य का उद्घाटन किया गया है कि इस पतनशील पूँजीवादी-व्यवस्था में डाक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक जैसी बौद्धिक शक्तियाँ धन की ताकत के आगे लाचार हैं। बुर्जुआ मजदूर यूनियन के नेताओं की तस्वीर भी साफ उभरकर आयी है कि ये कैसे मिल मालिकों के हाथों की कठपुतलियाँ बनकर अपनी स्वार्थसिद्धि में लिप्त हैं। बुद्धदेव भट्टाचार्य के इन नाटकों में उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता के साथ-साथ उनकी जीवन-दृष्टि की स्पष्टता साफ दिखाई पडती है। उनके नाटकों के पात्रा जीवन के विविध क्षेत्राों से आये हैं। इनके नाटकों में संघर्षशील चरित्रा बडी संख्या में दिखाई पडते हैं, जो विपरीत परिस्थितियों में भी संघर्ष के मार्ग से विमुख नहीं होते, पूरे जीवट के साथ डटे रहते हैं। बुद्धदेव भट्टाचार्य के नाटक रंगमंचीयता की दृष्टि से भी सुगठित हैं। नाटककार द्वारा जगह-जगह दिए गए रंगनिर्देश मंचन में बहुत उपयोगी होंगे। पात्रा संख्या एवं दृश्य विधान भी आधुनिक रंगमंच के अनुकूल हैं। बुद्धदेव भट्टाचार्य के नाटकों की भाषा बहुत सहज-सरल एवं सम्प्रेषणीयता में सहायक है। संवाद बहुत जीवन्त हैं। अनुवादक राम आह्लाद चौधरी ने नाटकों की भाषा सजीव बनाये रखने में बहुत ही सजगता का परिचय दिया है। यह मौलिकता का आभास देती है। बुद्धदेव भट्टाचार्य का नाटक-संग्रह ’विजय की प्रतीक्षा‘ निश्चित रूप से हिन्दी के लिए उल्लेखनीय कृति है। आज की मूल्यहीन राजनीति के युग में इसे पढकर सहज विश्वास नहीं होता कि ये साहित्यकार-राजनेता की कलम से निकली रचनाएँ हैं।



Discuss this topic on KhabarExpress Forum  

  Post Your Comments to this Article Posting Rules
Name*:
Comment*:
 


June, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerJune, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
May, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerMay, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
April, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerApril, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
March, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerMarch, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
February, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerFebruary, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
January, 2007 <br>Sponsered by : Decor Home, BikanerJanuary, 2007
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 
October, 2006 <br> Sponsered by : Decor Home, BikanerOctober, 2006
Sponsered by : Decor Home, Bikaner
 

All right reserved by Khabarexpress.com
Contact Us | Archives | Sitemap

Special Edition
:
Lakshchandi Mahayagya, Camel Festival 2007, Vartmaan Sahitya, Bikaner Udyog Craft Mela